हिन्दी बाइबिल व्याख्या

Hindi Bible Commentary

फादर शैलमोन आन्टनी

लूकस 5

।. चार मछुआरों को बुलाया जाना।

1. (1-3) येसु नाव से उपदेश देते हैं।

इस अनुच्छेद में (लूकस 5ः1-11; मरकुस 1ः16-20; मत्ती 4ः18-22) लूकस मरकुस के कालक्रम का अनुसरण नहीं करते, जैसा कि वे आमतौर पर करते हैं। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चार मछुआरों को दोबारा बुलाया जाना लूकस 4ः42-44 में वर्णित गलीलिया की पहली यात्रा से पहले हुआ था। यहाँ यह माना जाता है कि लूकस मरकुस और मत्ती में ऊपर दी गई घटना का अपने तरीके से वर्णन कर रहे हैं।

येसु ने नाव को उपदेश मंच के रूप में इस्तेमाल किया। ईश्वर के वचन का प्रचार केवल कलीसिया तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। संत पौलुस कहते हैं कि हर समय- चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल- ईश्वर के वचन का प्रचार करो (2 तिमथी 4ः2)।

क. ईश्वर का वचन सुनने के लिए भीड़ उनके चारों ओर उमड़ पड़ीः

विशाल भीड़ ने एक शिक्षक के रूप में येसु की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाया। भीड़ इतनी बड़ी थी कि येसु को नाव में बैठना पड़ा।

इतनी असुविधाओं के बावजूद भी भीड़ ने ईश्वर का वचन सुनने की इतनी उत्सुकता दिखाई। क्या हमारे भीतर ईश्वर के वचन को सुनने की यह उत्सुकता है? क्या आपके पास बाइबल है? अगर है, तो क्या आपके अंदर उसे पढ़ने का जुनून है?

ख. गेनेसेरेट झीलः

यह गलीलिया सागर का दूसरा नाम है, जिसे तिबेरियास सागर भी कहा जाता है।

ग. सिमोन की नावों में से एकः

जब येसु हमसे अपने उपयोग के लिए हमारी वस्तुएँ माँगते हैं, तो हमें उन्हें पूरे मन से दे देना चाहिए।

2. (4-5) येसु के निर्देशानुसार पेत्रुस सेवा ग्रहण करता है।

क. येसु सिमोन की नाव में चढ़े और उसे किनारे से थोड़ी दूर जाने को कहा। फिर वे बैठ गए और सिखाने लगेः

पेत्रुस बहुत निराश था क्योंकि पूरी रात काम करने के बाद भी उसे एक भी मछली नहीं मिली थी। इस संकट की घड़ी में पेत्रुस आसानी से येसु के नाव देने के अनुरोध को अस्वीकार कर सकता था। ईश्वर का धन्यवाद कि पेत्रुस को कोई मछली नहीं मिली, क्योंकि इसी कारण पेत्रुस का येसु से सामना हुआ जिसने उसके पूरे जीवन को बदल दिया। इसी प्रकार, हमारे जीवन की सभी असफलताएँ हमें ईश्वर की ओर ले जाती हैं।

ख. उन्होंने सिमोन से कहा, “गहरे पानी में जाओ और अपने जाल डालो”ः

येसु पेत्रुस की स्थिति को जानते थे। लेकिन, ईश्वर का कार्य करने का यही तरीका हैः पहले वह हमारी असफलताओं और संकटों में हमारी सहायता माँगते हैं; और यदि उस स्थिति में हम ईश्वर की आज्ञा मानते हैं, तो वह हमें भरपूर आशीष देते हैं।

अगर येसु ने पहले पेत्रुस को मछली पकड़ने में मदद की होती, तो पेत्रुस के लिए येसु को प्रचार करने के लिए अपनी नाव खुशी-खुशी दे देना बहुत आसान होता।

ग. हे प्रभु, हमने रात भर परिश्रम किया हैः

लूकस द्वारा प्रभु के लिए प्रयुक्त प्राचीन यूनानी शब्द (एपिसटा) लूकस के सुसमाचार में ही पाया जाता है। इस शब्द में “कमांडर,” “नेतृत्वकर्ता,” या शायद “मालिक” जैसे भाव निहित हैं।

घ. हमने रात भर परिश्रम किया और कुछ नहीं पकड़ा; फिर भी आपके वचन पर मैं जाल डालूँगाः

पेत्रुस कई बहाने बना सकता थाः मैंने रात भर काम किया और थक गया हूँ। मैं मछली पकड़ने के बारे में एक बढ़ई से भी अधिक जानता हूँ। सबसे अच्छी मछली पकड़ने का समय रात में होता है, दिन में नहीं। इस भीड़ और ज़ोरदार उपदेश ने मछलियों को डराकर भगा दिया है। हमने अपने जाल धो लिए हैं, इत्यादि।

ड. आपके वचन पर मैं जाल डालूँगाः

यह पेत्रुस के विश्वास का महान कथन थाः आपके वचन से प्रकाश हुआ। आपके वचन से सूर्य, चंद्रमा, तारे और ग्रह सृजित हुए; इस पृथ्वी पर जीवन आया।

इस समय पेत्रुस को पानी में मछलियाँ दिखाई नहीं दे रही थीं, फिर भी वह जाल डालने को तैयार था। अतः पेत्रुस के लिए यह दृष्टि से नहीं, बल्कि विश्वास से चलने वाला मार्ग था (2 कुरिन्थियों 5ः7)।

3. (6-7) मछलियों का चमत्कारिक ढंग से पकड़ा जाना।

क. उन्होंने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ींः

पेत्रुस ने कोई बहाना नहीं बनाया, और उसके विश्वास का भरपूर फल मिला।

“यहाँ मूक मछलियाँ स्पष्ट रूप से मसीह को ईश्वर का पुत्र बता रही हैं।” (ट्रैप)

ख. इसलिए उन्होंने दूसरी नाव में अपने साथियों को इशारा किया कि वे आकर उनकी मदद करेंः

पेत्रुस को मदद की ज़रूरत थी। क्योंकि येसु लूकस 6ः38 में कहते हैं, “दो, और तुम्हें दिया जाएगा। भरपूर मात्रा में, दबा हुआ, हिलाया हुआ, उमड़ता हुआ, तुम्हारी गोद में डाला जाएगा; क्योंकि जिस माप से तुम देते हो, उसी माप से तुम्हें वापस मिलेगा।” यदि पृथ्वी पर हमें इस प्रकार आशीष मिलती है, तो स्वर्ग में क्या होगा? ईश्वर हमारी हर प्रार्थना और कल्पना से कहीं अधिक पूरा करने में सक्षम है (एफ़ेसियों 3ः20)।

नबी एलियाह ने ज़ारेफ़थ की विधवा से पूछा, “क्या तुम मेरे लिए एक बर्तन में थोड़ा पानी और रोटी का एक टुकड़ा ला सकती हो?“ उसने जवाब दिया, “मेरे पास रोटी नहीं है- बस एक बर्तन में मुट्ठी भर आटा और एक जग में थोड़ा जैतून का तेल है। मैं घर ले जाने के लिए कुछ लकड़ियाँ इकट्ठा कर रही हूँ ताकि अपने और अपने बेटे के लिए खाना बना सकूँ- जिसे खाकर हम मर जाएँगे।“ एलियाह ने उससे कहा, “डरो मत। घर जाओ और वैसा ही करो जैसा तुमने कहा है। लेकिन पहले जो तुम्हारे पास है, उससे मेरे लिए रोटी का एक छोटा टुकड़ा बनाओ और मेरे पास लाओ, और फिर अपने और अपने बेटे के लिए कुछ बनाना।“ वह चली गई और उसने वैसा ही किया जैसा एलियाह ने उससे कहा था। इस तरह एलियाह, उस औरत और उसके परिवार के लिए रोज़ाना खाना मिलता रहा। क्योंकि आटे का बर्तन खाली नहीं हुआ और तेल का जग सूखा नहीं। इसके अलावा, बाद में जब उसका बेटा मर गया, तो एलियाह ने ईश्वर से प्रार्थना की और उसे जीवन वापस दिलाया (1 राजा 17)।

4. (8-11) पेत्रुस की प्रतिक्रिया और चार शिष्यों का आह्वान।

क. वह येसु के घुटनों पर गिर पड़ाः

येसु पहले ही पेत्रुस की सास को चंगा कर चुके थे (लूकस 4ः38-39)। फिर भी, इस चमत्कार में कुछ ऐसा था जिसने पेत्रुस को येसु की आराधना करने और स्वयं को उनके प्रति समर्पित करने के लिए प्रेरित किया।

ख. मुझसे दूर हो जाओ, क्योंकि मैं पापी हूँ!

येसु की शक्ति ने उसे अपनी आध्यात्मिक गरीबी का एहसास कराया।

जीवन में ईश्वर का अनुभव लोगों को बदल देता हैः ईश्वर का अनुभव करने के बाद इसायाह ने कहा कि वह अशुद्ध होंठों वाला मनुष्य है (इसायाह 6ः5)। येसु का अनुभव करने के बाद पौलुस ने कहा कि वह सबसे बड़ा पापी है (1 तिमथी 1ः15)।

ग. डरो मतः

प्राचीन यूनानी व्याकरण में, इसका शाब्दिक अर्थ है डरना बंद करो; पूरी बाइबल में लगभग 365 बार ईश्वर ने हमसे कहा है ’डरो मत’।

घ. अब से तुम मनुष्यों को पकड़ोगेः

इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति की ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक भूमिका है। जैसे कुछ लोग जानवरों, प्राकृतिक संसाधनों, पेड़ पौधों, नदियों वगैरह की रक्षा करते हैं। लेकिन येसु ने अपने शिष्यों को जो बुलावा दिया, वह इंसानों की आत्माओं की देखभाल करने का था। हॉ येसु के शिष्य गण आत्माओं का रखवाले है (इब्रानियों 13ः17) जैसे स्वयं येसु है (1 पेत्रुस 2ः25)।

पकड़ना शब्द का अर्थ है लोगों को ज़िंदा पकड़ना। यही सच्चा सुसमाचार प्रचार है। सुसमाचार लोगों को मारता नहीं, मरे हुओं को ज़िंदा करना है।

ड. उन्होंने सब कुछ त्याग दिया और उसका अनुसरण कियाः

उन्होंने मछलियों का चमत्कारिक शिकार पीछे छोड़ दिया और उसका अनुसरण किया। ”लूकस में ‘अनुसरण करना’ शब्द शिष्यत्व के लिए एक तकनीकी शब्द है (9ः23, 49, 57, 59, 61; विशेष रूप से 18ः22, 28)। यह प्रेरितों के कार्य में मसीह का अनुसरण करने के लिए प्रयुक्त शब्द, ‘मार्ग’, के समान है (प्रेरितों के कार्य 9ः2, 19ः9, 23; 22ः4; 24ः14, 22)।” (पेट)

शिष्यों ने तुरंत सब कुछ छोड़ दिया। हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि प्रभु हमसे जो कुछ छोड़ने के लिए कहें, तो उसे हमें तुरंत छोड़ना हैं। अगर छोड़ नहीं पा रहे हैं तो येसु की मदद लेनी है।

येसु का अनुसरण करने के लिए हमें न केवल पापपूर्ण कार्यां का त्याग करना होगा, बल्कि कभी-कभी अच्छी चीजों का भी त्याग करना पड़ सकता है। यहाँ मछली पकड़ना एक अच्छा काम था, परिवार अच्छा था। लेकिन पेत्रुस को येसु का अनुसरण करने के लिए इन दोनों का त्याग करना पड़ा।

आ. येसु एक कुष्ठ रोगी को चंगा करते हैं।

1. (12) कुष्ठ रोगी येसु से सहायता की याचना करता है।

क. एक कुष्ठ रोगी ने येसु को देखाः

प्राचीन काल में कुष्ठ रोग इतना लाइलाज था कि कुष्ठ रोगी को ठीक करना मुर्दों को जीवित करने के समान माना जाता था।

“फिलिस्तीन में दो प्रकार के कुष्ठ रोग होते थे। एक बहुत ही गंभीर त्वचा रोग जैसा था, और यह कम गंभीर था। दूसरा वह था जिसमें रोग एक छोटे से धब्बे से शुरू होकर मांस को तब तक खा जाता था जब तक कि पीड़ित के पास केवल हाथ या पैर का ठूंठ ही न बच जाए। यह सचमुच एक जीवित मृत्यु थी।” (बारक्ले)

कुष्ठ रोग से संबंधित नियम लेवी 13ः1-59 और लेवी 14ः1-57 में दिए गए हैं। इस रोग की सबसे भयानक बात इससे होने वाला अलगाव था। कुष्ठ रोगी को जहाँ भी जाता, “अशुद्ध! अशुद्ध!“ चिल्लाना पड़ता था; उसे अकेले रहना पड़ता था; “शिविर के बाहर किसी आवास में“ (लेवी 13ः45-46)। उसे मनुष्यों के समाज से बहिष्कृत और घर से निर्वासित कर दिया जाता था। इसका परिणाम यह था, कि कुष्ठ रोग के मनोवैज्ञानिक परिणाम शारीरिक परिणामों जितने ही गंभीर थे।

कुष्ठ रोगी जानता था कि उसकी समस्या कितनी भयानक है; कि किसी को उस पर दया नहीं आती। उसके पास कोई ऐसा नहीं था जो उसे येसु के पास ले जा सके। उसके पास येसु द्वारा किसी कुष्ठ रोगी को चंगा करने का कोई पिछला उदाहरण नहीं था जिससे उसे आशा मिल सके। उसे येसु या शिष्यों की ओर से कोई निमंत्रण नहीं मिला था। भीड़ में उसे शर्मिंदगी और अकेलापन महसूस हुआ होगा।

”कोढ़ को पाप और उसके असर का प्रतीक माना जाता था। यह एक छूत वाली और शरीर को कमज़ोर करने वाली बीमारी है, जो मरीज़ को अंदर से खोखला कर देती है और उसे जीते-जी मुर्दे जैसा बना देती है। इसलिए समाज और धार्मिक लोग कोढ़ियों को घृणा से देखते थे। खासकर रब्बी उनसे नफ़रत करते थे और मानते थे कि कोढ़ी ईश्वर के विशेष दंड के भागी हैं, इसलिए वे किसी भी तरह की दया या सहानुभूति के लायक नहीं हैं।” (ड़ेकिड़ गुज़िक)

ख. उसने अपना चेहरा ज़मीन पर झुकाकर येसु से विनती कीः

हमें भी इसी नम्रता के साथ येसु के पास जाना चाहिए। इससे ठीक पहले पेत्रुस भी येसु के चरणों में गिर पड़ा (लूकस 5ः8)। जैरुस भी येसु के चरणों में गिर पड़ा और उनसे विनती की (लूकस 8ः41)। हमें भी इसी प्रकार येसु के पास जाना चाहिए, तभी हमें अपनी समस्याओं का समाधान मिलेगा।

ग. हे प्रभु, यदि आप चाहेंः

कुष्ठ रोगी को येसु की चंगाई की क्षमता पर कोई संदेह नहीं था। इसलिए वह कहता है, ’यदि आप चाहें।’ येसु हमारी सहायता करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं, परन्तु प्रश्न यह हैः क्या आप येसु के सामने स्वयं को नम्र करने के लिए तत्पर हैं?

घ. हे प्रभु, यदि आप चाहें, तो आप मुझे शुद्ध कर सकते हैंः

इस कुष्ठ रोगी को चंगाई से कहीं अधिक चाहिए था। वह न केवल कुष्ठ रोग से, बल्कि अपने जीवन और आत्मा पर इसके सभी दुर्बल करने वाले प्रभावों से भी शुद्धि चाहता था।

2. (13) येसु कुष्ठ रोगी को स्पर्श करते हैं और वह शुद्ध हो जाता है।

क. उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और उसे स्पर्श कियाः

येसु उस व्यक्ति को एक शब्द या यहाँ तक कि एक विचार से भी चंगा कर सकते थे। फिर भी उन्होंने करुणा दिखाने के लिए अछूत कुष्ठ रोगी को स्पर्श से चंगा किया। यहाँ येसु ने वह किया जो निषिद्ध था - एक कुष्ठ रोगी को स्पर्श करना।

ख. मैं तत्पर हूँः

अपने शब्दों और अपने स्पर्श दोनों से, येसु ने दिखाया कि वे वास्तव में तत्पर थे। उन्होंने कुष्ठ रोगी को चंगा करने की अपनी शक्ति से कहीं अधिक दिखाया; उन्होंने चंगा करने के लिए अपना तत्पर और करुणामय हृदय भी दिखाया। ग. तुरंत ही उसका कुष्ठ रोग दूर हो गयाः

उस पूर्व कुष्ठ रोगी का जीवन पल भर में हमेशा के लिए बदल गया। येसु आपके पापी जीवन को बदलने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। बस इतना ही करना है कि आप उनके पास जाएँ।

“इसलिए यदि कोई मसीह में है, तो वह नई सृष्टि हैः पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब कुछ नया हो गया है!“ (2 कुरिन्थियों 5ः17)

3. (14) येसु चंगे हुए व्यक्ति को आज्ञा देते हैं कि वह अपने चंगाई की गवाही केवल पुरोहितों को दे।

क. उन्होंने उसे किसी को न बताने का आदेश दियाः

उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे इस्राएल को अपने औपचारिक प्रकटीकरण के उचित समय तक भीड़ के उत्साह को शांत रखना चाहते थे।

ख. जाओ और अपने आप को पुरोहित को दिखाओः

पुरोहित के पास जाओ और अपनी चंगाई का प्रमाण पत्र प्राप्त करो, जैसे हमें संगरोध से मुक्ति मिलती है। यहाँ येसु ने प्रचलित प्रथा का सम्मान किया। येसु ने कुष्ठ रोगी से यह नहीं कहा कि ’मैंने तुम्हें चंगा कर दिया है और तुम्हें पुरोहित के पास जाने की आवश्यकता नहीं है।’ येसु पुरोहितों का आदर करता था।

मूसा की व्यवस्था में कुष्ठ रोगी के ठीक होने पर कुछ विशेष बलिदान करने का आदेश था, और जब वह व्यक्ति पुरोहितों को इसकी सूचना देता था, तो उन्हें कुछ अनुष्ठान (लेवी 14) करने पड़ते थे जो शायद ही कभी किए जाते थे; क्योंकि कुष्ठ रोग से ठीक होने वाले लोग बहुत कम ही होते थे।

पाप-स्वीकार के संस्कार के मामले में भी ऐसा ही है। हालाँकि येसु ही हमारे पापों को क्षमा करते हैं, फिर भी वे हमेशा हमसे पापों की क्षमा के लिए पुरोहितों के पास जाने को कहेंगे, क्योंकि उन्होंने अपने शिष्यों को पाप क्षमा करने का अधिकार दिया है (योहन 20ः23)।

4. (15-16) येसु की चंगाई देने वाले के रूप में बढ़ती प्रसिद्धि।

क. उनके बारे में खबर और भी फैल गईः

कुष्ठ रोगी के चंगाई की खबर दूर-दूर तक फैल गई। लूकस हमें यह नहीं बताता कि इसके लिए कुष्ठ रोगी जिम्मेदार था, लेकिन मरकुस (1ः44) हमें बताता है।

ख. बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने और अपनी बीमारियों से चंगा होने के लिए इकट्ठा हुएः

मसीहा की चंगाई देने वाली सेवा की भविष्यवाणी की गई थीः तब अंधों की आंखें खुल जाएंगी, और बहरों के कान खुल जाएंगे। तब लंगड़े हिरण की तरह उछलेंगे, और गूंगे गाएंगे। क्योंकि निर्जन प्रदेश में जल फूट निकलेगा, और रेगिस्तान में नदियां बहेंगी। (इसायाह 35ः5-6)

इस्राएल में इतनी अधिक बीमारी और रोग की उपस्थिति सिनाई विधान के प्रति उनकी अवज्ञा का प्रमाण थी। ईश्वर ने कहा था कि यदि वे अवज्ञाकारी होंगे तो उन पर ऐसे श्राप आएंगे (विधि विवरण 28)।

ग. बहुत से लोग उन्हें सुनने और अपनी बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए इकट्ठा होते थे। लेकिन वे सुनसान जगहों पर जाकर प्रार्थना करते थेः

बढ़ती लोकप्रियता और प्रचार के इस दौर में भी, येसु ने कभी भी अपनी प्रार्थना से समझौता नहीं किया। यह वाक्य येसु की (यहाँ ‘जगहें’ शब्द बहुवचन है) व्यस्त दिनचर्या में भी प्रार्थना करने की आदत को दर्शाता है। जब हम बहुत व्यस्त होते हैं तो हम क्या करते हैं? क्या हम प्रार्थना से समझौता कर लेते हैं?

इ. येसु की क्षमा करने और चंगा करने की शक्ति।

1. (17-19) येसु का उपदेश बाधित हुआ।

क. जब वे उपदेश दे रहे थे, तब वहाँ फरीसी और शास्त्री बैठे थेः

कफरनाउम (मरकुस 2ः1) में येसु ने अपना उपदेश जारी रखा और उनके श्रोताओं में धार्मिक और आध्यात्मिक नेता (फरीसी, शास्त्री) थे। उनमें से कुछ दूर-दूर से (यहूदिया और येरुसालेम से) आए थे। फरीसी व्यवस्था के प्रति कठोर थे और उनका मानना था कि ईश्वर केवल उन्हीं से प्रेम करता है जो उनके समान करते हैं। फरीसी का अर्थ है अलग किए गए लोग। उन्होंने अपने आप को हर उस चीज़ से अलग कर लिया था जिसे वे अपवित्र समझते थे, और उनका मानना था कि ईश्वर के प्रेम से हर कोई अलग है, सिवाय उनके। ये लोग आलोचनात्मक दृष्टियों और हृदयों से बैठे थे, येसु के किसी भी वचन को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के लिए तैयार थे।

उस समय प्रभु की प्रसिद्धि बहुत अधिक रही होगी तभी इतनी बड़ी और प्रतिनिधि भीड़ एकत्रित हुई थी। यहूदी इतिहासकार यूसुफ के अनुसार, अकेले गलीलिया में दो सौ से अधिक गाँव थे, और हम मान सकते हैं कि यहूदिया में कम से कम आधे गाँव रहे होंगे। यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि उन्होंने यहूदिया में उस प्रकार भ्रमण नहीं किया जैसा उन्होंने गलीलिया में किया था, फिर भी यहूदी लोग उनके पास आए।

ख. और प्रभु की सामर्थ्य उन्हें चंगा करने के लिए उपस्थित थीः

चंगा करने की सामर्थ्य येसु में थी। परन्तु यदि हमारा विश्वास न हो तो येसु चंगा नहीं कर सकते (मत्ती 13ः58)। ठीक वैसे ही जैसे बिजली तो है, पर उसे चलाने के लिए हमें उसे प्लग में लगाना पड़ता है।

ग. कुछ लोग एक लकवाग्रस्त व्यक्ति को पलंग पर लेकर आए, परन्तु भीड़ के कारण वे येसु के पास नहीं पहुँच सकेः

इन लोगों ने यह नहीं कहा कि “भीड़ इतनी अधिक है कि हम येसु के पास नहीं पहुँच सकते, इसलिए घर वापस चलते हैं और अगली बार देखेंगे”। परन्तु वे इस बीमार व्यक्ति को येसु के पास ले जाने के लिए दृढ़ थे, इसलिए उन्होंने एक मार्ग खोज निकाला। जहाँ चाह होती है, वहाँ राह होती है। यह कठिनाइयों पर विजय का क्षण था।

घ. वे छत पर चढ़े और उसे पलंग सहित छत की टाइलों के बीच से नीचे येसु के सामने उतार दियाः

यह निश्चित रूप से, उपदेश में एक असामान्य व्यवधान था।

यह सच है कि बीमार व्यक्ति का बोझ उसके दोस्तों के लिए भारी था, फिर भी उनका विश्वास उस बीमार व्यक्ति और उसके खाट के भारीपन से कहीं ज़्यादा मज़बूत था।

टाइलिंग के माध्यम सेः फ़िलिस्तीनी घर समतल छत वाले होते थे। छत तक आमतौर पर बाहर की सीढ़ियों से पहुँचा जा सकता था। छत में बहुत कम झुकाव होता था, जो बारिश के पानी को बहने के लिए पर्याप्त था। यह दीवार से दीवार तक और काफी कम दूरी पर रखी हुई बीमों से बनी थी। बीमों के बीच की जगह को घनी टहनियों से भरा जाता था, जिन्हें गारे से दबाकर फिर ऊपर से प्लास्टर किया जाता था। दो बीमों के बीच की भराई को निकालना दुनिया का सबसे आसान काम था। वास्तव में, मृतकों को अक्सर छत के रास्ते घर के अंदर और बाहर ले जाया जाता था, क्योंकि उनमें एक मृत व्यक्ति को दरवाजे से ले जाने का अंधविश्वासपूर्ण डर था। इसके अधार पर हम कह सकते हैं कि लकवाग्रस्त व्यक्ति को छत के रास्ते लाया गया क्योंकि वह पाप में ’मृत’ था (एफ़ेसियों 2ः1; लूकस 15ः24)। येसु ने उसके पापों को क्षमा किया और वह जीवित हो उठा और दरवाजे से होकर चला गया।

2. (20-22) येसु लकवाग्रस्त व्यक्ति के पापों को क्षमा को करते हैं।

क. जब उन्होंने उनका विश्वास देखाः

एक स्वस्थ व्यक्ति भी इतनी भीड़ में प्रभु के समक्ष कैसे प्रवेश कर पाता, तो एक बेचारा लकवाग्रस्त व्यक्ति क्या कर सकता था? परन्तु मित्रों का विश्वास बिल्कुल भी कमज़ोर नहीं था। वास्तव में, वह बहुत प्रबल था। यह उनके कार्य से प्रकट हुआ। और रोगी के दयनीय लकवे के बजाय, उनका यही विश्वास था जिसने प्रभु का ध्यान आकर्षित किया।

सबसे अद्भुत बात यह है कि यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जिसे उसके मित्रों के विश्वास से मुक्ति मिली। यह स्पष्ट रूप से मध्यस्थता की प्रार्थना को बढ़ावा देता है।

ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें संत पॉल ईसाइयों से अपने लिए प्रार्थना करने को कहते हैं (रोमियों 15ः30-32; इफिसियों 6ः18-20) और अपने लिए प्रार्थना करने के लिए उनका धन्यवाद करते हैं (2 कुरिन्थियों 1ः11; फिलिप्पियों 1ः3-4; 1 थेसलनीकियों 1ः2-3)। येसु ने मोनिका की प्रार्थना देखकर ऑगस्टीन को परिवर्तित किया। येसु ने जॉन मैरी वियने की प्रार्थना देखकर उनके गिरजाघर को आशीर्वाद दिया।

ख. भाई, तुम्हारे पाप क्षमा हो गए हैंः

हम कल्पना कर सकते हैं कि छत पर बैठे मित्रों को कैसा लगा होगा। उन्होंने अपने मित्र को लकवे से ठीक करने के लिए बहुत कष्ट सहा था, और अब येसु केवल उसकी आध्यात्मिक समस्याओं को लेकर चिंतित प्रतीत हो रहे थे। येसु हमारी समस्याओं को हमसे बेहतर जानते हैं। येसु हमें स्वर्ग के लिए तैयार करते हैं। येसु जानते थे कि उस व्यक्ति की वास्तविक आवश्यकता क्या थी, और उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता क्या थी। अगर उस व्यक्ति के दो पैर होते और वह उन्हीं के साथ सीधे नरक में चला जाता, तो इसका क्या लाभ था?

ग. केवल ईश्वर ही पापों को क्षमा कर सकता है?

धार्मिक नेता सही थे। लेकिन उनकी गलती यह थी कि उन्होंने यह देखने से इनकार कर दिया कि येसु वास्तव में कौन थेः ईश्वर पुत्र, जिन्हें पापों को क्षमा करने का अधिकार है।

3. (23-26) येसु केवल ईश्वर की शक्ति और अधिकार को प्रदर्शित करते हैं।

क. यह कहना आसान है किः

मनुष्यों के लिए, वास्तविक क्षमा और चंगा करने की शक्ति दोनों ही असंभव हैं; परन्तु ईश्वर के लिए, दोनों ही सरल हैं। एक तरह से, मनुष्य को चंगा करना उसके पापों को क्षमा करने से अधिक “कठिन“ था, क्योंकि क्षमा अदृश्य है - उस समय कोई भी ईश्वर के समक्ष यह सत्यापित नहीं कर सकता था कि मनुष्य को क्षमा किया गया था। फिर भी यह तुरंत सत्यापित किया जा सकता था कि मनुष्य चल सकता है या नहीं।

ख. परन्तु ताकि तुम जान सको कि मानव पुत्रः

येसु अक्सर स्वयं को मनुष्य का पुत्र कहते थे। यह विचार दानियेल 7ः13-14 का संदर्भ था, जहाँ आने वाले महिमा के राजा, जो संसार का न्याय करने आ रहे हैं, को मनुष्य का पुत्र कहा गया है। येसु ने इस उपाधि का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि उनके समय में, यह एक मसीहाई उपाधि थी जो राजनीतिक और राष्ट्रवादी भावनाओं से मुक्त थी। येसु अधिक सामान्यतः स्वयं को “राजा“ या “मसीह“ कह सकते थे, परन्तु उनके श्रोताओं के कानों में वे उपाधियाँ “रोमियों को पराजित करने वाला“ जैसी लगती थीं।

ग. वह तुरंत उठ खड़ा हुआः

”इस दृश्य में व्याप्त तनाव की कल्पना कीजिए। शास्त्री तनाव में थे, क्योंकि येसु ने उन्हें चुनौती दी थी और कहा था कि वह स्वयं को ईश्वर का पुत्र सिद्ध करके दिखाएंगे। लकवाग्रस्त व्यक्ति तनाव में था क्योंकि उसे संदेह था कि क्या येसु सचमुच उसे चंगा करेंगे। भीड़ तनाव में थी क्योंकि उन्होंने सभी के तनाव को भांप लिया था। घर का मालिक तनाव में था क्योंकि उसे चिंता थी कि छत की मरम्मत में कितना खर्च आएगा। और चारों मित्र तनाव में थे, क्योंकि वे अब तक थक चुके थे। केवल येसु ही तनावमुक्त थे, शांति से उन्होंने कहा, “उठो, अपना पलंग उठाओ और अपने घर जाओ।” इन शब्दों को सुनते ही वह तुरंत उठ खड़ा हुआ। येसु की चंगा करने की शक्ति और पापों को क्षमा करने का अधिकार तत्काल प्रकट हुआ।” (ड़ेविड़ गुज़िक)

कल्पना कीजिए यदि येसु असफल हो जाते। उनका सेवकाई कार्य बिखर जाता। शास्त्री हंसते। चारों व्यक्ति निराश और लज्जित होते। घर का मालिक अपनी छत को देखता और सोचता कि सब व्यर्थ हो गया।

घ. वे सब चकित थे, और उन्होंने ईश्वर की महिमा की और भय से भर गएः

सब इस पर चकित थे।

ई. लेवी का बुलावा (मत्ती)।

1. (27-28) एक नाकेदार को येसु के पीछे चलने के लिए बुलाया गया।

क. इन बातों के बादः

लूकस के वृत्तांत में इस बिंदु तक येसु एक लकवाग्रस्त, एक कुष्ठ रोगी और एक अपदूतग्रस्त व्यक्ति से निपट चुके थे। अब वे एक कर नाकेदार के लिए तैयार थे।

ख. लेवी नाम का एक नाकेदार... कर कार्यालय में बैठा थाः

उस समय, नाकेदारों को देशद्रोही और जबरन वसूली करने वाला माना जाता था; देशद्रोही इसलिए क्योंकि वे रोमन सरकार के लिए काम करते थे और लोगों से कर वसूलने के लिए उनके पीछे रोमन सैनिकों की शक्ति होती थी; जबरन वसूली करने वाले इसलिए क्योंकि वे अतिरिक्त वसूली की गई राशि को अपने पास रख सकते थे। कर संग्रहकर्ता कर संग्रह अनुबंध के लिए दूसरों के साथ बोली लगाते थे। रोमन सरकार अनुबंध सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को देती थी।

नाकेदार को समाज से बहिष्कृत माना जाता थाः वह न्यायालय में न्यायाधीश या गवाह के रूप में अयोग्य था, और सभागृह से बहिष्कृत था।

ग. और उसने उससे कहा, “मेरे पीछे आओ”ः

यह समझते हुए कि लगभग सभी लोग नाकेदारों से घृणा करते थे, यह देखना आश्चर्यजनक है कि येसु ने लेवी से कितना प्रेम किया और उसे अपने पास बुलाया। लेवी ने येसु के निमंत्रण का उत्तर दिया।

एक तरह से, यह अन्य शिष्यों की तुलना में कहीं अधिक बड़ा बलिदान था। पेत्रुस, याकूब और योहन आसानी से अपने मछली पकड़ने के काम पर लौट सकते थे, लेकिन लेवी के लिए कर वसूलने के काम पर लौटना कठिन था। पुरातात्विक प्रमाण हैं कि गलीलिया सागर से पकड़ी गई मछलियों पर कर लगता था। इसलिए येसु ने उस कर वसूलने वाले को अपना शिष्य बनाया जो पेत्रुस, याकूब, योहन और अन्य मछुआरों से कर वसूलता था।

लेवी ने येसु से यह नहीं कहा, “येसु, मुझे यह धन बैंक में जमा करने दो और दो दिन बाद मैं आपके पीछे आऊंगा।” बल्कि वह तुरंत चला गया। येसु ने यह नहीं कहा कि ‘एक सप्ताह बाद मेरे पीछे आओ’।

घ. उसने सब कुछ छोड़ दियाः

मत्ती प्रेरितों में सबसे धनी रहा होगा। लेकिन उसने ‘अपनी कलम को छोड़कर’ सब कुछ छोड़ दिया। (बारक्ले)

2. (29-32) येसु पर पापियों के साथ संगति करने का आरोप लगाया गया है।

क. तब लेवी ने अपने घर में येसु के लिए एक भव्य भोज दियाः

लेवी (मत्ती) ने येसु का अनुसरण करने के लिए बहुत कुछ त्याग दिया, परन्तु वह दुखी नहीं था क्योंकि उसे अनमोल खजाना (मत्ती 13ः44-46) और येसु मसीह का असीम धन (एफ़ेसियों 3ः8) प्राप्त हुआ था। वह येसु के लिए भोज देने से इतना प्रसन्न था। मत्ती द्वारा भोज देने का एक कारण यह भी था कि वह अपने मित्रों को येसु से मिलवाना चाहता था। उद्धार पाया हुआ व्यक्ति अकेले स्वर्ग नहीं जाना चाहता।

ख. और उनके शास्त्रियों और फरीसियों ने उनके शिष्यों के विरुद्ध शिकायत कीः

यह आरोप अप्रत्यक्ष रूप से येसु पर, उनके शिष्यों के माध्यम से लगाया गया था - उनके कुख्यात पापियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध थे।

ग. जो स्वस्थ हैं उन्हें चिकित्सक की आवश्यकता नहीं हैः

येसु का उत्तर सरल और गहरा दोनों था। येसु आत्मा के चिकित्सक हैं, और उनके लिए पाप से बीमार लोगों के साथ रहना स्वाभाविक है।

उनके आलोचकों ने स्वयं को पाप से बीमार मानने से इनकार कर दिया। वे सोचते थे कि पाप से बीमार दूसरे हैं, वे नहीं।

एक बीमार व्यक्ति के डॉक्टर की सेवाएं लेने से इनकार करने के कई संभावित कारण हो सकते हैंः शायद आपको पता ही न हो कि आप बीमार हैं। शायद आपको पता हो कि आप बीमार हैं, लेकिन आपको लगता है कि आप खुद ही ठीक हो जाएंगे - आपको यह नहीं पता कि आपको डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत है। शायद आपको पता हो कि आप बीमार हैं, और आपको डॉक्टर की ज़रूरत है, लेकिन आपको यह नहीं पता कि आपकी मदद करने के लिए कोई डॉक्टर है, और न ही यह पता हो कि डॉक्टर आपकी मदद करना चाहता है। आप डॉक्टर की सलाह मानने को तैयार नहीं हैं।

येसु ही परिपूर्ण डॉक्टर हैं - हमेशा उपलब्ध; सटीक निदान, पूर्ण उपचार, कोई डॉक्टर शुल्क नहीं!

क्या हम हमेशा अपने दोस्तों के दायरे में ही रहते हैं? या फिर हम पापियों तक भी पहुँचते हैं ताकि उन्हें यीशु के पास ला सकें?

घ. पद 32 मैं धर्मियों को नहीं, बल्कि पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँः

ईश्वर चाहता है कि हर कोई उद्धार पाए (1 तिमथी 2ः4)। अभी पश्चाताप करो, क्योंकि अपने दूसरे आगमन में येसु केवल धर्मियों को ही बुलाने आएगा।

3. (33-39) येसु घोषणा करते हैं कि उनके अधीन, चीजें अलग हैं।

क. योहन के शिष्य और फरीसियों के शिष्य अक्सर उपवास और प्रार्थना करते थेः

उपवास और प्रार्थना करने में कोई बुराई नहीं है। येसु कभी इसके विरुद्ध नहीं थे। उन्होंने स्वयं इसका समर्थन किया (मत्ती 6ः5-6, 16-18) बशर्ते कि ये ईश्वर को प्रकट करने के लिए किए जाएँ।

ख. क्या आप दूल्हे के मित्रों को उसके साथ रहते हुए उपवास करवा सकते हैं?

यह सब निस्संदेह लेवी के स्वागत समारोह में दावत और आनंद का बचाव करने और उस निराशा को दूर करने के लिए कहा गया था जो वे उस पर थोपना चाहते थे।

येसु ने अपने समय की विवाह प्रथाओं का उल्लेख करते हुए उनके प्रश्न का उत्तर दिया। उस संस्कृति में विवाह भोज आनंद और प्रसन्नता का सबसे जीवंत प्रतीक था। सप्ताह भर चलने वाले विवाह भोज के दौरान, यह माना जाता था कि धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने से अधिक आनंद महत्वपूर्ण था। यदि कोई भी धार्मिक अनुष्ठान विवाह भोज के आनंद को कम करता, तो वह आवश्यक नहीं था। येसु ने कहा कि उनके अनुयायियों को इसी प्रकार का आनंद प्राप्त करना चाहिए।

ग. लेकिन वो दिन ज़रूर आएगाः

एक दिन ऐसा आएगा जब येसु के अनुयायियों के लिए उपवास करना उचित होगा। लेकिन अभी, जब येसु उनके बीच थे, तब वो दिन नहीं आया था। प्रेरितों के कार्यों में हम देखते हैं कि प्रेरित प्रार्थना कर रहे थे (प्रेरित चरित 1ः14; 2ः42, 46) और उपवास कर रहे थे (प्रेरित चरित 13ः2; 14ः23)।

“वो दिन आएंगे जब दूल्हा उनसे छीन लिया जाएगा“ इन शब्दों में एक हल्का सा निराशा का भाव है। मानो येसु कह रहे हों, “वे मुझे छीन लेंगे; मैं उनकी व्यवस्था को चुनौती देता हूँ।“ यह उनके आने वाले तिरस्कार का पहला हल्का सा संकेत है।

घ. लेकिन नई अंगुरी को नई मशकों में ही भरना चाहिए, और दोनों ही सुरक्षित रहती हैंः

फिलिस्तीन में बोतलें चमड़े की बनी होती थीं। जब उनमें नई अंगुरी डाली जाती थी, तो वह किण्वित होकर गैस छोड़ती थी। अगर बोतल नई होती थी, तो चमड़े में एक निश्चित लचीलापन होता था और वह दबाव से दब जाती थी; लेकिन अगर वह पुरानी होती थी, तो चमड़ा सूखा और कठोर होता था और फट जाता था। येसु कहते हैं, “अपने मन को पुरानी मशक के समान मत होने दो।“

येसु का कहना स्पष्ट है। आप उनके नए जीवन को पुराने स्वरूपों में नहीं ढाल सकते। यही कारण है कि येसु ने यहूदी धर्म के भीतर कोई सुधार आंदोलन शुरू नहीं किया, न ही रब्बी स्कूलों आदि के साथ काम किया। येसु कहते हैं, “मैं तुम्हारी पुरानी प्रथाओं को सुधारने नहीं आया हूँ। मैं तुम्हारे लिए बिल्कुल नए वस्त्र लेकर आया हूँ, जो कि कलीसिया है।” (एफ़ेसियों 2ः16)

ड. कोई भी नए वस्त्र का टुकड़ा पुराने वस्त्र पर नहीं लगाताः

पुराने वस्त्र पर नए वस्त्र का टुकड़ा लगाने से नया वस्त्र बदसूरत हो जाता है, और पुराना वस्त्र पहले से भी अधिक फटा हुआ हो जाता है।

च. और कोई भी पुरानी अंगुरी पीकर तुरंत नई अंगुरी नहीं चाहता; क्योंकि वह कहता है, “पुरानी अंगुरी बेहतर है”ः

येसु ही वह हैं जो ‘नई अंगुरी’ देते हैं। येसु द्वारा दी गई ‘नई अंगुरी’ पुरानी अंगुरी से कहीं बेहतर है। एक बार जब आप इसे चख लेंगे तो आप पुरानी अंगुरी को तुच्छ समझेंगे। काना में विवाह के दौरान यही हुआ था। येसु की ‘नई अंगुरी’ चखने के बाद प्रबंधक ने दूल्हे से कहा, “हर कोई पहले अच्छी अंगुरी परोसता है, और फिर घटिया आगुरी...परन्तु तुमने अच्छी अंगुरी अब तक बचाकर रखी है” (योहन 2ः10)।

यह एक पुरानी कहानी है और इसके प्रतीकात्मक अर्थ को समझना आसान नहीं है। वास्तव में, अधिकतर मामलों में नई अंगुरी की तुलना में पुरानी अंगुरी को ही बेहतर माना जाता है क्योंकि वह बेहतर होती है। फरीसियों की पुरानी परंपराओं के साथ यह तुलना नहीं की जा सकती। विद्वानों का मानना है कि यहाँ ज़ोर अंगुरी पर नहीं, बल्कि पीने वाले पर है। यानी, जो लोग पुरानी परंपराओं के आदी हैं, उन्हें येसु के नए तरीके स्वीकार करना बहुत मुश्किल लगेगा। शुरुआती चर्च में भी यही स्थिति थी, जब यहूदी मसीहियों को उन गैर-यहूदियों के साथ मेलजोल रखने में कठिनाई हुई जो मसीह का अनुसरण तो करते थे, लेकिन पुराने नियम के कानूनों से बंधे नहीं थे (प्रेरित चरित 15)।

येसु कुछ नया लाने आए थे, पुरानी व्यवस्था को सुधारने नहीं। उद्धार का यही सार है। ऐसा करके, येसु पुराने (कानून) को नष्ट नहीं करते, बल्कि उसे पूरा करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक छोटा सा बीज जब बड़ा होकर बलूत का पेड़ बनता है तो उसका उद्देश्य पूरा हो जाता है। एक अर्थ में, बीज तो चला जाता है, लेकिन उसका उद्देश्य महानता में पूरा हो जाता है।


Praise the Lord!