हिन्दी बाइबिल व्याख्या

Hindi Bible Commentary

फादर शैलमोन आन्टनी

लूकस 15

अ. खोई हुई भेड़, खोया हुआ सिक्का।

1. (1-3) येसु फरीसियों के एक आरोप का उत्तर देते हैं।

क. तब सभी नाकेदार और पापी उनके पास उन्हें सुनने के लिए आएः

बहुत से लोगों से बात करते हुए (लूकस 14ः25), येसु ने उन्हें शिष्यत्व और समर्पण के बारे में दृढ़ता से चुनौती दी। उनकी इस दृढ़ता ने लोगों को दूर नहीं किया; बल्कि उन्हें येसु की ओर आकर्षित किया।

हम समझते हैं कि नाकेदार और पापी उनकी ओर आकर्षित हुए। वे उनके चारों ओर इकट्ठा होकर उनकी शिक्षाओं को सुनने में सहज महसूस करते थे। येसु इन लोगों से दूर नहीं रहे, जिससे खोए हुए और हाशिए पर पड़े लोगों के प्रति उनका प्रेम स्पष्ट होता है।

ख. इसलिए उन्होंने उनसे यह दृष्टांत कहाः

बाइबल के सबसे प्रिय अध्यायों में से एक, यह दृष्टांतों से बना है जो इस आरोप के उत्तर में कहे गए हैं - यह व्यक्ति पापियों को स्वीकार करता है और उनके साथ भोजन करता है।

ये दृष्टांत फरीसियों और शास्त्रियों को सुनाए गए थे, जिन्होंने शिकायत की थी- पापियों ने भी इन्हें सुना। येसु के समय के धार्मिक नेताओं ने मानवता को दो वर्गों में बाँटा थाः अपवित्र और धर्मी। उन्होंने यथासंभव अपवित्रों से पूर्ण रुप में अलग रहने का निर्णय लिया। येसु के समय के कुछ रब्बियों ने इस विचार को इतनी गंभीरता से लिया कि उन्होंने अपवित्रों को ईश्वर का वचन सिखाने से इनकार कर दिया (मॉरिस)।

ग. सुसमाचारों का सुसमाचारः

इस अध्याय को सुसमाचारों का सुसमाचार कहा जाता है; क्योंकि इस अध्याय में येसु ईश्वर के प्रेम की गहराई, लंबाई, चौड़ाई और विस्तार के बारे में बात करते हैं; ताकि हम ईश्वर की परिपूर्णता से भर जाएँ (एफेसियों 3ः18-19)।

2. (4-7) खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ना।

क. यदि वह उनमें से एक को खो देः

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक भेड़ खो जाए या कोई चरवाहा उसे ढूँढ़े। यह आश्चर्य की बात है कि एक चरवाहा सौ में से खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ने जाए।

यदि किसी घर में दस बच्चे हों और शाम को केवल नौ ही मिलें, तो क्या माता-पिता कहेंगे कि ’कोई बात नहीं, केवल एक ही खोई है’? नहीं। बल्कि वे खोए हुए बच्चे को ढूँढ़ने जाएँगे। यदि हमारे पापी माता-पिता ऐसा करते हैं, तो हमारे सच्चे माता-पिता ईश्वर, जो भले और प्रेममय हैं, खोए हुए को ढूँढ़ने के लिए कितना अधिक प्रयास करेंगे।

भेड़ बहुत आसानी से भटक जाती है और एक बार भटक जाने पर वापस झुंड में लौटना उसके लिए मुश्किल हो जाता हैः वह झुंड के लिए मिमियाती है, लेकिन फिर भी झुंड के विपरीत दिशा में भागती रहती है।

खः खोई हुई भेड़ को तब तक खोजो जब तक वह मिल न जाएः

खोई हुई भेड़ न तो खुद को बचा पाएगी और न ही चरवाहे को ढूंढ पाएगी। अगर चरवाहा कुछ नहीं करता, तो भेड़ का मरना तय था।

उस समय के कई रब्बी मानते थे कि ईश्वर सही मार्ग से आने वाले पापी को स्वीकार करता है। लेकिन इस दृष्टांत में, येसु ने सिखाया कि ईश्वर खोए हुए लोगों को सक्रिय रूप से खोजता है। वह अनिच्छा से खोए हुए लोगों को स्वीकार नहीं करता; बल्कि, वह उनकी खोज करता है। ईश्वर पापी को उससे कहीं अधिक पाता है जितना पापी ईश्वर को पाता है।

ग. वह बोझ अपने कंधों पर उठाता हैः

जब येसु अपने लोगों को पाता है, तो वह उन्हें उठाता भी है। क्योंकि जब हम अभी भी शक्तिहीन थे, तब उचित समय पर मसीह अधर्मियों के लिए मर गया। (रोमियों 5ः6)

घ. आनंद... मेरे साथ आनंद करो... स्वर्ग में और अधिक आनंदः

इस दृष्टांत में जोर अनुपात पर नहीं, बल्कि खोए हुए को पाने के आनंद पर है। यही फरीसियों और शास्त्रियों की गलती थी।

ङ. निन्यानवे धर्मी लोगों की अपेक्षा, जिन्हें पश्चाताप की आवश्यकता नहीं है, एक पापी के पश्चाताप करने परः

यद्यपि भेड़ स्वयं को बचाने या पश्चाताप करने के लिए कुछ नहीं करती, येसु ने इस संक्षिप्त कहानी के अंतिम कुछ शब्दों में पश्चाताप की आवश्यकता का उल्लेख किया। भेड़ पश्चाताप नहीं करती, लेकिन जब ईश्वर आपको पा लें तो आपको पश्चाताप करना चाहिए।

यह ध्यान देने योग्य है कि स्वर्ग परीक्षा उत्तीर्ण करने, नौकरी पाने या घर खरीदने पर नहीं, बल्कि पश्चाताप करने पर प्रसन्न होता है। यदि आप चाहते हैं कि स्वर्ग आप पर प्रसन्न हो, तो प्रेम, प्रार्थना और उपदेश के द्वारा लोगों को पश्चाताप की ओर ले आइए। जब आप पापियों के पश्चात्ताप का साधन बनेंगे, तब स्वर्ग आप पर प्रसन्न होगा।

खोई हुई भेड़ का दृष्टांत ईश्वर के अपने प्रत्येक बच्चे के प्रति असीम प्रेम और करुणा को दर्शाता है। यह हमें सशक्त रूप से याद दिलाता है कि हम चाहे कितना भी खोया हुआ या भटका हुआ महसूस करें, ईश्वर का प्रेम अटल और अविचल है। यह हमें दिखाता है कि हमारा सृष्टिकर्ता प्रत्येक व्यक्ति को अत्यंत महत्व देता है और चाहता है कि हम उससे पुनः मिल जाएँ।

3. (8-10) खोया हुआ सिक्का ढूँढ़ना।

क. या वह स्त्री जिसके पास दस चाँदी के सिक्के हों, यदि वह एक सिक्का खो देः

यदि चरवाहा सौ में से एक सिक्के में रुचि रखता था, तो यह स्वाभाविक है कि वह स्त्री दस में से एक सिक्के में रुचि रखेगी।

ब्रूस- यह सिक्का कई अन्य सिक्कों के साथ एक चाँदी की माला में था जिसे विवाहित स्त्री के सिर पर पहना जाता था। यह उस स्त्री के लिए एक अनमोल आभूषण था, और इसी कारण खो जाने का दर्द और भी गहरा हो गया।

खोए हुए लोग ईश्वर के हैं, चाहे वे यह जानते हों या न जानते हों। “चांदी का सिक्का खो गया था, लेकिन फिर भी उस पर दावा किया गया। ध्यान दें कि महिला ने उस पैसे को ‘मेरा खोया हुआ सिक्का’ कहा। जब उसने उसे खो दिया, तो उसने उस पर अपना अधिकार नहीं खोया; उसके हाथ से फिसलने पर वह किसी और का नहीं हो गया।” (स्पर्जन)

(1) मानव आत्मा के प्रतीक के रूप में चांदी के सिक्के (ड्रैक्मा) का उपयोग। यदि सिक्के पर राजा की छवि और शिलालेख है, तो मनुष्य अनमोल है क्योंकि उसमें भी महान राजा ईश्वर की छवि और शिलालेख है। (2) संभवतः इस तथ्य में एक विशेष महत्व है कि सिक्का घर में खो जाता है, जबकि भेड़ बाड़े से भटक जाती है। यहाँ जो बात निहित प्रतीत होती है, वह यह संभावना है कि ईश्वर की दृष्टि में अनमोल आत्मा समाज, इस्राएल या मसीह के चर्च के भीतर भी खो सकती है।

ख. दीपक जलाओ, घर की सफाई करो और ध्यान से खोजोः

स्त्री ने पहले प्रकाश जलाया; फिर घर की सफाई की और लगातार सिक्के को सावधानीपूर्वक और इरादे से खोजती रही। इसी प्रकार पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में चर्च खोई हुई आत्माओं की खोज करेगा। पहले वे ईश्वर के वचन का प्रकाश फैलाएंगे, फिर अपने स्थान की सफाई करेंगे और फिर खोई हुई आत्माओं को ध्यान से खोजेंगे।

सबसे पहले जो बात हमें गहराई से प्रभावित करती है, वह है एक आत्मा का मूल्य। वास्तव में येसु कहते हैं - हम आत्मा के बदले क्या दे सकते हैं? (मत्ती 24ः26); ”मनूष्य न तो अपने भाई का उद्धार कर सकता और न उसके जीवन का मूल्य ईश्वर को दे सकता है। प्राणों का मूल्य इतना ऊॅचा है कि किसी के पास पर्याप्त धन नहीं” (स्तोत्र 49ः7-8)

ग. मेरे साथ आनन्द मनाओः

जब सिक्का अंततः मिल गया, तो वह स्त्री अत्यंत प्रसन्न हुई। उसी प्रकार, जब पापी पश्चाताप करते हैं तो ईश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

हम अक्सर ईश्वर को प्रसन्न होते हुए नहीं देखते, परन्तु यह वचन हमें बताता है कि वे प्रसन्न होते हैं, और किन परिस्थितियों में। जैसे दूल्हा दुल्हन पर आनन्दित होता है, वैसे ही तुम्हारा ईश्वर तुम पर आनन्दित होगा (इसयाह 62ः5)। ”वह विजयी योद्धा है। वह तेरे कारण आनन्द मनायेगा, वह अपने प्रेम से तुझे नवजीवन प्रदान करेगा, वह उत्सव के दिन की तरह तेरे कारण आनन्दविभोर हो जायेगा” (सफनियाह 3ः17)।

बार्कले के अनुसार, येसु के समय के कई धार्मिक लोग अलग-अलग विश्वास रखते थे और यहाँ तक कि उनका एक कथन भी थाः “स्वर्ग में उस एक पापी के लिए आनन्द होगा जो ईश्वर के सामने पूरी तरह से नष्ट हो गया है।”

घ. एक पापी के पश्चाताप के बारे मेंः

खोए हुए सिक्के पश्चाताप नहीं कर सकते, इसलिए येसु ने यह बात इसलिए जोड़ी ताकि धार्मिक नेता और उन्हें सुनने वाले पापी दोनों जान सकें कि खोए हुए लोगों के लिए पश्चाताप महत्वपूर्ण है।

आ. खोए हुए बेटे को ढूँढना।

1. (11-16) पुत्र कैसे खो गया।

क. एक व्यक्ति के दो पुत्र थेः

इस तीसरे दृष्टांत का अधिकांश भाग छोटे पुत्र के बारे में है, लेकिन दृष्टांत के अंत में बड़े भाई को स्पष्ट और महत्वपूर्ण रूप से संबोधित किया गया है।

ख. छोटे पुत्र ने अपने पिता से कहा, ‘पिताजी, मुझे संपत्ति में मेरा हिस्सा दे दीजिए’ः

छोटा पुत्र इसी परिवार में पैदा हुआ था और बचपन में उसे पिता के साथ रहने में कोई समस्या नहीं थी; वह पिता के साथ रहना पसंद करता था। लेकिन जब वह युवा हुआ तो उसे अपने पिता के साथ रहना कठिन लगने लगा क्योंकि धन और अन्य चीजें तो थीं, लेकिन वह उनका उपयोग अपनी मर्जी से नहीं कर पा रहा था। पिता हर चीज पर पूर्ण नियंत्रण रखते थे, यहाँ तक कि समय सारिणी, अनुशासन आदि पर भी। छोटे पुत्र ने परिसर के बाहर देखा और पाया कि वहाँ के युवा स्वतंत्र और सुखी प्रतीत होते हैं। इसलिए उसने सोचा कि वह वास्तव में तभी खुश हो सकता है जब वह बाहर जाए और अपनी इच्छाओं और कल्पनाओं के अनुसार धन-दौलत से जीवन व्यतीत करे।

जो संपत्ति मेरी होगीः

उन दिनों पिता अपनी मृत्यु से पहले या बाद में उत्तराधिकार दे सकते थे, लेकिन आमतौर पर यह बाद में ही दिया जाता था (गेल्डेनहुइस)। यहाँ पुत्र की निर्दयता दिखाई देती है; क्योंकि वह कहता है “यह मेरी होगी“। इसका अर्थ है कि वह पिता से कह रहा है, ’पिताजी, वैसे भी आप मरने वाले हैं और संपत्ति में मेरा हिस्सा तो होगा ही। तो क्यों न आप मुझे वह हिस्सा अभी ही दे दें, ताकि मैं जाकर अपनी इच्छानुसार जीवन जी सकूँ।’

ग. उन्होंने अपनी संपत्ति दोनों के बीच बाँट दीः

पिता स्पष्ट रूप से ईश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं। उनके प्रेम ने विद्रोह की अनुमति दी और एक अर्थ में मानवीय इच्छा का सम्मान किया। पुत्र युवा था (इसलिए पिता खोए हुए पुत्र की खोज में नहीं गए)। पिता जानते थे कि पुत्र ने मूर्खतापूर्ण और लालची विनती की है, फिर भी उन्होंने उसे जाने दिया।

घ. कुछ दिनों बादः

आमतौर पर हम उस जगह से तुरंत चले जाते हैं जहाँ हमें रहना पसंद नहीं होता। अगर ऐसा है तो पुत्र कुछ दिनों बाद क्यों गया? क्योंकि संपत्ति बहुत अधिक थी, इसलिए उसे अपनी संपत्तियां एकत्र करनी पड़ीं - केवल मूर्त संपत्ति। वह जमीन और घर तो नहीं ले जा सका, लेकिन शायद चांदी, सोना, अनाज, भेड़, मवेशी, घोड़ा आदि ही ले जा सका।

ड. दूर देश की यात्राः

वह अपने घर के पास कहीं रह सकता था। लेकिन वह बाज़ारों में या किसी अन्य स्थान पर भी अपने पिता से संयोगवश भी नहीं मिलना चाहता था। वह नहीं चाहता था कि कोई जाकर उसके पिता को उसके रहन-सहन के बारे में बताए। एक तरह से उसने अपने पिता से रिश्ता पूरी तरह तोड़ दिया।

उसके लिए दूर देश की यात्रा करना बहुत आसान था क्योंकि वह स्वस्थ था और उसके पास दूर देश की यात्रा करने के लिए जानवर और धन-दौलत थी। वास्तव में येसु यहाँ बताते हैं कि उसने ’ईश्वर द्वारा निर्धारित यहूदी जीवन शैली’ को त्याग दिया और गैर-यहूदियों की पापी जीवन शैली अपना ली।

हम भी ऐसे ही हैं कि ईश्वर से जितना हो सके, उतना दूर चले जाते हैं।

च. वहाँ उसने अपनी संपत्ति भोगविलास में लुटा दीः

याद रखें कि जिस क्षण हम ईश्वर से दूर होते हैं, हमारे जीवन में फिजूलखर्ची, लापरवाही आदि शुरू हो जाता है। घर पर उसके पास यह सारी संपत्ति थी लेकिन वह उसे लुटा नहीं सका क्योंकि पिता उस पर नियंत्रण रखते थे। यह सच है कि जब हम ईश्वर से दूर होते हैं तो हम अपनी संपत्ति, प्रतिभा, समय और संसाधनों को लुटाते और उनका दुरुपयोग करते हैं।

छ. जब उसने सब कुछ खर्च कर दिया, तो उस देश में भयंकर अकाल पड़ गया, और उसे धन की आवश्यकता होने लगीः

जब हम ईश्वर के बिना जीते हैं तो हमारी गणनाएँ गलत हो जाती हैं। पुत्र ने सोचा कि उसके पास जो धन है वह उसके शेष जीवन के लिए पर्याप्त होगा। उसका अपनी इच्छाओं पर कोई नियंत्रण नहीं था और इसके अलावा उसने भयंकर अकाल का अनुमान भी नहीं लगाया था।

हम ईश्वर के बिना कुछ नहीं कर सकतेः

बाबेल का मीनार (उत्पत्ति 11); येसु के बिना मछली पकड़ने वाले शिष्यों को कुछ नहीं मिला (योहन 21); मेरे बिना तुम कुछ नहीं कर सकते (योहन 15ः5); जब तक प्रभु घर नहीं बनाता, उसे बनाने वालों का परिश्रम व्यर्थ है (स्तोत्र 127ः1)। मैं उस ईश्वर के साथ सब कुछ कर सकता हूँ जो मुझे शक्ति देता है (फिलिप्पियों 4ः13)। अपने आप से यह मत कहो कि मेरी शक्ति और मेरे बल ने मुझे यह धन दिलाया है। परन्तु ईश्वर को याद रखो, क्योंकि उसी ने तुम्हें धन प्राप्त करने की शक्ति दी है (विधि विवरण 8ः17-18)।

उसे धन की आवश्यकता होने लगीः सांसारिक वस्तुएँ तुम्हारी आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकतीं, जबकि केवल ईश्वर ही कर सकता है। इसलिए स्तोत्रकार कहता है- प्रभु मेरा चरवाहा है, मुझे किसी चीज की कमी नहीं (स्तोत्र 23ः1); हे युवा शेरों, तुम अभाव और भूख से पीड़ित हो, परन्तु जो प्रभु की खोज करते हैं, उन्हें किसी अच्छी चीज की कमी नहीं होती (स्तोत्र 34ः10)। संत थेरेसा ऑफ अविला कहती हैं- मेरे लिए मसीह ही काफी हैं। उपदेशक ग्रन्थ कहता है- जब हम ईश्वर को अपने से दूर रखते हैं, तो सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।

ज. पद 15 इसलिए वह गया और उस देश के एक नागरिक के यहाँ काम करने लगा... उसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिए भेज दिया।

भूख और ज़रूरत से मजबूर होकर, बेटे ने ऐसा काम स्वीकार किया जो किसी भी धर्मी यहूदी व्यक्ति के लिए अस्वीकार्य और अपमानजनक था, क्योंकि यहूदियों के लिए सूअर एक अशुद्ध जानवर था (लेवी 11ः7)। जब आप घोर अभाव में होते हैं, तो आप कुछ भी कर सकते हैं।

नागरिक के पास सूअर थेः यहाँ से यह स्पष्ट है कि बेटा सामरिया में था क्योंकि यहूदी सूअर नहीं पालते, जबकि सामरिया के लोग पालते हैं।

झ. पद 16 वह सूअरों द्वारा खाए जा रहे फलियों से अपना पेट भर लेता; और किसी ने उसे कुछ नहीं दियाः

बेटे को अपने काम के लिए मजदूरी मिलनी चाहिए थी, लेकिन इसका यहाँ उल्लेख नहीं है। इसका समाधान बहुत सरल हैः बेटे ने काम के लिए कुछ पैसे मांगे होंगे, जिसे नागरिक ने दो कारणों से मना कर दिया होगा - वह एक यहूदी था, इसलिए शत्रु था, और उस समय भयंकर अकाल पड़ा हुआ था। फिर सौदेबाजी की शक्ति कम होने पर बेटे ने अपनी मजदूरी के बदले भोजन मांगा होगा, भले ही नागरिक ने यह कहकर मना कर दिया हो कि भयंकर अकाल के कारण उसके परिवार के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है। इसलिए बेटे ने कम से कम मजदूरी के रूप में फली देने की मांग की होगी। नागरिक शायद मान गया होगा क्योंकि इसमें उसका कोई नुकसान नहीं था।

ञ. उसे किसी ने कुछ नहीं दियाः

सूअरों ने भी उसे फली देने से इनकार कर दिया। घर पर वह बढ़िया चावल खाता था, लेकिन यहाँ उसे भूसा भी नहीं मिल रहा। सब कुछ एक ही कारण से - पिता से दूर होना। हमें यह भी समझना चाहिए कि जो पिता से दूर हो जाता है, उसे थोड़ी सी भी संतुष्टि नहीं मिलती।

यहाँ येसु एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन कर रहे हैं जो ईश्वर से सबसे दूर चला गया है और कोई भी उससे आगे नहीं जा सकता। यदि इस पुत्र का पिता ने स्वागत किया, तो वह हम पापियों का स्वागत क्यों नहीं करेंगे?

मान लीजिए कि यदि पुत्र को फली मिल जाती, तो वह पिता के पास वापस जाने के बारे में सोचता ही नहीं। हमारे जीवन में कभी-कभी इस तरह की घटनाएँ घटित होती हैं जो हमें ईश्वर के पास वापस ले जाती हैं।

प्रकृति और प्राणियों का सहाराः

कुछ हद तक हम कह सकते हैं कि प्रकृति और जीव-जंतु उन लोगों का साथ नहीं देते जो ईश्वर से दूर हैं। नूह के समय के लोग अपने पापों के कारण बाढ़ से नष्ट हो गए (उत्पत्ति 7), सदोम और गोमोरा गंधक और आग से नष्ट हो गए (उत्पत्ति 19ः24); फ़िराउन को आज्ञा उल्लंघन के कारण कई विपत्तियाँ झेलनी पड़ीं (निर्गमन 7ः14); लोगों ने पाप किया और विषैले साँप ने उन्हें डंक मारा (गणना 21); बिलआम इस्राएल को शाप देना चाहता था और गधे ने उससे बात की (गणना 22ः21-39); योना ने ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया और तार्शीश चला गया और समुद्र में तूफान आ गया। येसु के बिना कुशल शिष्य मछली नहीं पकड़ सके (योहन 21)।

प्रकृति और जीव-जंतु ईश्वर के मार्ग पर चलने वालों का सहारा बनते हैंः

मूसा के समय समुद्र में मार्ग बन गया (निर्गमन 14), आकाश से मन्ना बरसा (निर्गमन 16), चट्टान से जल निकला (गणना 20), दिन में बादल छाए रहे ताकि वे चिलचिलाती धूप से सुरक्षित रहें और रात में आग की रोशनी मिले (निर्गमन 13ः21-22)। योषुआ ने सूर्य को स्थिर रहने का आदेश दिया और दिन लंबा हो गया (योषुआ 10)। एलियाह ने आदेश दिया और साढ़े तीन साल तक अकाल पड़ा रहा और एक कौवे ने एलियाह को भोजन दिया (1राजा 17-18; याकूब 5ः17)। ईश्वर कहते हैं कि यदि हम दशांश देंगे तो वह टिड्डियों को डांटेंगे; ताकि वे मिट्टी की उपज को नष्ट न करें और हमारा खेत बंजर न हो (मलाकी 3ः11)। समुद्र में तूफान (मत्ती 8ः23-27), मछली ने मंदिर कर चुकाने के लिए सिक्का दिया (मत्ती 17ः24-27), मुर्गे की बांग (मत्ती 26ः34), यदि वे चुप रहें तो पत्थर भी चिल्ला उठेंगे (लूकस19ः40)। जब येसु क्रूस पर मरे, तब प्रकृति दुखी थी।

2. (17-19) खोए हुए बेटे का अपने पिता के पास लौटने का निर्णय।

क. परन्तु जब उसे होश आयाः

जब वह पिता से दूर गया तो वह अपने आप में नहीं था। उसका निर्णय संसार के आकर्षणों से प्रभावित था। इसलिए उसने गलत निर्णय लिया। अब अपनी विपत्ति में वह भटका हुआ बेटा अंततः स्पष्ट रूप से सोचने में सक्षम हुआ। यह हमें याद दिलाता है कि हमें कोई भी निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए; विशेषकर जब हम क्रोधित हों, आसक्ति में हों, उदास हों, निराश हों आदि।

स्पष्ट चिंतन में उसने सूअरबाड़े की स्थिति सुधारने के बारे में नहीं सोचा। उसने अपने पिता, अपने भाई, अपने दोस्तों, अपने मालिक या सूअरों को दोष नहीं दिया। उसने अपनी विपत्ति को पहचाना लेकिन उस पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, बल्कि अपने पिता पर ध्यान केंद्रित किया।

ख. मेरे पिता के कितने नौकरों के पास खाने के लिए पर्याप्त है और बचत भी होती हैः

बेटे को एहसास होता है कि उसके पिता के घर में सबसे छोटे नौकरों के पास खाने के लिए पर्याप्त है और बचत भी होती है, परन्तु वह इस परदेस में भूख से मर रहा है।

“स्वादिष्ट भोजन करने वाले सड़कों पर मरते हैं; जो लोग शाही वस्त्रों में पले-बढ़े, वे राख के ढेरों से चिपके रहते हैं” (शोकगीत 4ः5)। “सोना कैसे धुंधला हो गया है, शुद्ध सोना कैसे बदल गया है! पवित्र पत्थर हर गली के मुहाने पर बिखरे पड़े हैं” (षोकगीत 4ः1)।

ईश्वर की उपस्थिति में सभी को प्रचुर मात्रा में सब कुछ मिलेगाः

येसु कहते हैं कि वह जीवन की परिपूर्णता देने आए हैं (योहन 10ः10); “उनकी परिपूर्णता से हम सब ने अनुग्रह पर अनुग्रह पाया है” (योहन 1ः16); ईश्वर की परिपूर्णता उनमें वास करना चाहती थी (कलोसियों 1ः15,19)। ईश्वर भरपूर देते हैं (उत्पत्ति 27ः28); वह उत्तम गेहूँ से खिलाते हैं (स्तोत्र 81ः16); यदि हम दशमांश देते हैं तो ईश्वर स्वर्ग के द्वार खोल देंगे और भरपूर आशीष बरसाएँगे (मलाकी 3ः10)। ईश्वर अपनी संपत्ति के अनुसार हमारी हर आवश्यकता को पूरा करते हैं (फिलिप्पियों 4ः19)। ईश्वर हमें भरपूर मात्रा में सब कुछ देते हैं ताकि हम उसका आनंद ले सकें (1तिमथी 6ः17)। ईश्वर पवित्र आत्मा को असीमित रूप से देते हैं (योहन 3ः34; तीतुस 3ः6); यदि आप ईश्वर के साथ हैं, तो वह भरपूर मात्रा में, दबा हुआ, हिलाया हुआ, उमड़ता हुआ आशीष हम पर बरसाते हैं (लूकस 6ः38)।

ग. पद 18 मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊँगाः

येसु ने यह नहीं कहा कि वह व्यक्ति अपने गाँव या घर के बारे में सोच रहा था, बल्कि अपने पिता के बारे में सोच रहा था। जब पुत्र पिता के पास लौटा, तो वह गाँव और घर में भी लौट आया; परन्तु उसका ध्यान अपने पिता के पास लौटने पर था। हमें भी इसी प्रकार ईश्वर के पास लौटना चाहिए - सबसे पहले और सर्वप्रथम, चर्च या मसीही मित्रों के पास लौटने से पहले। क्योंकि जब आप पिता के पास लौट आते हैं, तो आप स्वतः ही अपने परिवार, चर्च, मसीही मित्रों और समाज के पास लौट आते हैं।

घ. पद 18-19 हे पिता, मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आप के समक्ष पाप किया है, और मैं आप का पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा। मुझे अपने एक सबसे छोटा सेवक के समान बना दीजिएः

अपने पिता से किए जाने वाले अपने तैयार भाषण में पुत्र ने अपनी अयोग्यता का पूर्ण बोध और पाप की सच्ची स्वीकारोक्ति दिखाई। यह सच्ची स्वीकारोक्ति फरीसी और नाकेदार के दृष्टांत (लूकस 18ः9-14) में नाकेदार द्वारा की गई थी। यदि हम ईमानदारी से अपने पापों को स्वीकार करते हैं, तो ईश्वर हमारे सभी पापों को क्षमा कर देगा (1योहन 1ः9), परन्तु यदि हम अपने पापों को छुपाते हैं, तो हम समृद्ध नहीं होंगे (सूक्ति 28ः13)।

“साधारण दास किसी न किसी रूप में परिवार का सदस्य होता था, परन्तु वेतनभोगी सेवक को एक दिन के नोटिस पर ही बर्खास्त किया जा सकता था। वह परिवार का सदस्य बिल्कुल नहीं होता था।” (बार्कले)

पुत्र ने दो बातें माँगींः पहली, “पिताजी, मुझे मेरी संपत्ति का हिस्सा दे दीजिए”; दूसरी, “पिताजी, मुझे नौकर बना दीजिए।” केवल दूसरी विनती से ही पिता को प्रसन्नता हुई।

3. (20-24) पिता ने बिछड़े हुए पुत्र का प्रसन्नतापूर्वक स्वागत किया।

क. और वह उठा और अपने पिता के पास आयाः

शारीरिक रूप से देखा जाए तो पुत्र के लिए दूर स्थित अपने पिता तक पैदल जाना असंभव था; क्योंकि उसकी स्वास्थ्य स्थिति (उसे कुछ खाने-पीने को नहीं मिल रहा था) इसकी अनुमति नहीं दे रही थी।

मैंने अपने शहर कोचीन से वेलंकन्नी (लगभग 550 किमी) के एक राष्ट्रीय तीर्थस्थल तक पैदल जा रहे एक व्यक्ति से पूछा कि वह एक दिन में कितने किलोमीटर चल सकता है? उसने कहा कि लगभग 30 किलोमीटर प्रतिदिन; पहुँचने में लगभग 16 दिन लगेंगे। यदि एक स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन केवल 30 किमी चल सकता है, तो उस कमजोर बिछड़े हुए पुत्र का क्या होगा? फिर मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि वह अपने भोजन के लिए कितने पैसे साथ रखता है? उसने बताया कि उसके पास पैसे नहीं थे। जब भी उसे भूख-प्यास लगती, वह किसी दूकान या होटेल में जाकर कहता कि वह वेलंकन्नी जा रहा है और उसे भूख-प्यास लगी है। वहाँ के लोग उसे भरपूर खाना-पानी देते और रास्ते में उसके लिए कुछ खाना पैक करके भी दे देते। शायद यही हाल उसके बेटे के साथ भी हुआ होगा जो अपने पिता की ओर जा रहा था।

कभी-कभी हम पाप में इतने डूब जाते हैं कि ईश्वर तक पहुँचना असंभव सा लगने लगता है। लेकिन यदि हम पिता की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं (बाइबल पढ़कर, पवित्र मास में भाग लेकर, पाप स्वीकार करके, रोज़री माला जपकर, क्रूस रास्ता करके, दया की माला जपकर आदि), तो स्वर्ग और पृथ्वी आपकी सहायता के लिए आगे आएंगे और आपको अपने पिता तक पहुँचाएंगे।

याद रखिए, पुत्र के लिए पिता से दूर जाना बहुत आसान था क्योंकि वह स्वस्थ था, उसके पास यात्रा के लिए पशु और धन था; लेकिन उसके लिए पिता के पास लौटना बहुत कठिन था क्योंकि वह शारीरिक रूप से बहुत कमजोर था और उस पर पाप का बोझ भी था। वास्तव में येसु ने स्वयं कहा है कि पिता तक पहुँचने का मार्ग कठिन है - द्वार संकरा है और मार्ग कठिन है (मत्ती 7ः13-14)। ईश्वर का वचन कहता है, “जिस प्रकार तुम ईश्वर से भटकने के लिए तैयार थे, उसी प्रकार दस गुना उत्साह से उसकी खोज में लौट आओ” (बारूक 4ः28)।

इसलिए आइए हम पिता से दूर न जाने की कोशिश करें।

ख. परन्तु जब वह अभी दूर ही था, तब उसके पिता ने उसे देखाः

येसु कहते हैं कि पिता ने पुत्र को दूर से ही पहचान लिया। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि पुत्र वैसे नहीं लौट रहा था जैसे वह गया था। जब वह गया था तब वह स्वस्थ, सुंदर, अच्छे वस्त्र, जूते, अंगूठियाँ आदि पहने हुए था, लेकिन आते समय उसने ये सब खो दिया था। पास से भी उसे पहचानना असंभव था। पिता ने अपने पुत्र को दूर से ही पहचान लिया क्योंकि वह उससे प्रेम करता था। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ पहचान होती है। यूसुफ ने अपने भाई को इसलिए पहचाना क्योंकि वह उनसे प्रेम करता था (उत्पत्ति 42ः7) और योहन, जो उससे भी अधिक प्रेम करता था, ने येसु को तट पर खड़े देखकर पहचाना और कहा, “यही प्रभु है“ (योहन 21ः7)। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ लोग एक-दूसरे को और एक-दूसरे की ज़रूरतों को पहचानते हैं।

“पुत्र के पश्चाताप की गहराई की तुलना केवल पिता के प्रेम की गहराई से ही की जा सकती है।” (पेट)

ग. करुणा से भर उठेः

अपने पुत्र को धन, स्वास्थ्य, जीवन और रिश्तों को नष्ट करते देख भी पिता को उस पर दया आई। ईश्वर प्रेम है (1योहन 4ः8), इसलिए वह करुणा से परिपूर्ण है (स्तोत्र 86ः15; 103ः8)। वह क्रोध से नहीं, करुणा से प्रेरित होते हैं। भीड़ को देखकर येसु को उन पर दया आई (मत्ती 14ः14-21; मरकुस 1ः41, 6ः34; लूकस 7ः13), और क्रूस से भी येसु ने करुणा दिखाई। क्या आप कभी इस पिता की तरह करुणा से प्रेरित हुए हैं? संत पौलुस कहते हैं, “क्योंकि मसीह का प्रेम हमें प्रेरित करता है” (2 कुरिन्थियों 5ः14)।

घ. वह दौड़ेः

पिता ने पुत्र के आने का इंतज़ार नहीं किया, बल्कि वह अपने पुत्र की ओर दौड़े। पिता के दौड़कर आने से ही उनके स्वागत की तीव्रता का पता चलता है। यहूदी पितृसत्तात्मक समाज में पिता का दौड़ना वर्जित था। यहूदियों का वस्त्र लंबा होता था और दौड़ने के लिए उसे उठाना पड़ता था। घर के मुखिया के लिए दौड़ना शर्मिंदगी की बात मानी जाती थी; ठीक वैसे ही जैसे हम अपने धर्मगुरु से दौड़ने की उम्मीद नहीं करते।

पिता को अपने बेटे से गहरा प्रेम था। इसलिए प्रेम जितना अधिक होता था, दौड़ उतनी ही तेज़ होती थी और दौड़ जितनी तेज़ होती थी, वस्त्र उतना ही ऊँचा होता था। यह वैसा ही है जैसे हम कुत्ते के पीछे भागने पर और तेज़ दौड़ते हैं। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह दौड़ कैसी रही होगी। जब तक बेटे ने एक कदम उठाया, पिता निन्यानवे कदम चल चुके थे।

हमें नहीं पता कि बेटे ने पिता को दूर से पहचाना या नहीं, लेकिन पिता ने अपने बेटे को पहचान लिया।

उन्होंने उसे गले लगाया और चूमाः

मॉरिस कहते हैं कि मूल व्याकरण के अनुसार पिता ने उसे बार-बार चूमा। वास्तव में पिता को उसे गले नहीं लगाना चाहिए था। इसके बजाय उन्हें बेटे को स्नान करने के लिए कहना चाहिए था क्योंकि वह बदबूदार था। मुझे बताइए, अगर कोई बच्चा सेप्टिक टैंक में गिर जाए और बच जाए, तो क्या माँ बच्चे को तुरंत चूमेगी या स्नान कराने के बाद? वह तुरंत चूमेगी क्योंकि वह बच्चे से प्यार करती है। उसी तरह, जो पिता अपने बेटे से बहुत प्यार करता है, उसे उसकी बदबू और गंदगी की परवाह नहीं होती। आमतौर पर चूमना क्षमा का प्रतीक होता है। एसाव ने याकूब को चूमा जिसने उसे धोखा दिया था (उत्पत्ति 33ः4) और दाऊद ने अपने विद्रोही बेटे अबसालोम को चूमा (2सामूएल 14ः33)।

ड. पिता, मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके सामने पाप किया हैः

बेटे ने अपना तैयार भाषण सुनाना शुरू किया; लेकिन ऐसा लगा मानो पिता ने सुना ही न हो और तीसरा वाक्य बोलने की अनुमति भी न दी-मुझे अपने नौकरों में से एक समझो। क्योंकि पिता अपने बेटे को कभी नौकर के रूप में नहीं देख सकता।

च. लेकिन पिता ने अपने नौकरों से कहाः

अब वे अपने परिसर से दूर खड़े हैं। तो गुलाम वहाँ कैसे पहुँचे? क्योंकि पिता को दौड़ते देख वहाँ काम करने वाले गुलाम भी उनके साथ दौड़ पड़े।

छ. सबसे उत्तम वस्त्र निकाल कर उसे पहनाओ, उसके हाथ में अंगूठी और पैरों में चप्पल पहनाओ। और मोटा-ताज़ा बछड़ा यहाँ लाओ और उसे मार डालोः

पुत्र कम से कम अपेक्षा (किराए के मजदूरों) के साथ आया था, परन्तु पिता उसे सर्वोत्तम देता है; क्योंकि सर्वोत्तम देना पिता का स्वभाव है। वस्त्र अधिकार, धार्मिकता, ईश्वरीय कृपा आदि का प्रतीक है। उदाहरण के लिए, यूसुफ का ‘बारह रंगों का वस्त्र’ (उत्पत्ति 37ः3); विवाह वस्त्र के बिना मनुष्य को बाहर निकाल दिया गया था (मत्ती 22ः11-13)। अंगूठी भी अधिकार का प्रतीक है (उत्पत्ति 41ः42)। चप्पल भी अधिकार का प्रतीक हैं। चप्पल सिर्फ़ बच्चे पहनते थे, गुलाम नहीं। यहाँ पिता पुत्र को सर्वोत्तम देकर उसकी खोई हुई महिमा लौटा रहा है।

ज. मोटा-ताज़ा बछड़ाः

यहूदी अपने पर्वों को मनाने के लिए एक बछड़े को कुछ महीनों के लिए अलग रखते थे और उसे अच्छी तरह खिलाते थे। ताकि पर्व आने पर बछड़ा मोटा-ताज़ा हो जाए। यहूदी पर्व के दिनों के अलावा मोटे-ताज़े बछड़े को नहीं मारते। मान लीजिए कि अगर हम क्रिसमस के लिए उस तरह का एक बछड़ा रखते हैं और क्रिसमस के पहले कोई मेहमान हमारे घर भोजन के लिए आते हैं, तो हम उस मोटे बछड़े को नही मारेंगे; जबकि यहाँ पिता उस मोटे बछड़े को लाने पर जोर दे रहे हैं।

यह आश्चर्य की बात है कि पुत्र अपने पिता के पास न्यूनतम अपेक्षा के साथ गया, लेकिन पिता ने उसे फिर से अपना पुत्र बनाकर उसे सब कुछ सर्वोत्तम दिया।

पिता के पास अपने वास्तविक स्वरूप में आना बहुत महत्वपूर्ण है। कभी मुखौटा न पहनें; पाखंडी न बनें। जैसे हो वैसे ही रहो - यदि तुम पापी हो तो पिता के समक्ष पापी के रूप में ही जाओ।

बेटा अपनी पाप भरी ज़िंदगी को बदल नहीं सका, लेकिन जब वह पिता के पास आया, तो पिता उसकी मदद कर सके। “जैसे पूरब पश्चिम से दूर है, वैसे ही वह हमारे पापों को हमसे दूर कर देता है” (स्तोत्र 103ः12); “वह हम पर फिर दया करेगा; वह हमारे अधर्मों को पैरों तले रौंद देगा। तू हमारे सभी पापों को समुद्र की गहराई में डाल देगा” (मीका 7ः19)।

झ. और वे आनंदित होने लगेः

खोई हुई भेड़ और खोया हुआ सिक्का मिलना एक सुखद बात थी। खोए हुए पुत्र का मिलना उससे भी कहीं अधिक सुखद था। उन्होंने विशेष वस्त्र, आभूषण और भोजन के साथ एक शानदार उत्सव मनाया। यह केवल एक खोए हुए पुत्र का मिलना ही नहीं था; ऐसा लग रहा था मानो वह मौत के मुंह से वापस लौट आया हो।

ञ. वह मरा हुआ था और फिर जीवित हो उठा; वह खो गया था और फिर मिल गयाः

जब तुम अपराध और पाप करते हो तो तुम मरे हुए के समान हो (एफेसियों 2ः1; रोमियों 6ः11)। ईश्वर की उपस्थिति से दूर जाना खो जाने के समान है।

4. (25-32) बड़े बेटे की कड़वाहट और नाराजगी।

क. उसका बड़ा बेटा खेत में थाः

बड़ा बेटा कभी भी फिजूलखर्ची वाला जीवन नहीं जीता था, और जब छोटा बेटा घर आया तब भी वह खेत में कड़ी मेहनत कर रहा था।

ख. जैसे ही वह घर के पास पहुँचा, उसने संगीत और नाच-गाना सुनाः

बड़ा बेटा असामान्य संगीत और नाच-गाना सुनकर आश्चर्यचकित रह गया। इसका अर्थ है कि यह एक बड़ा उत्सव था।

ग. उसने एक दास को बुलाया और पूछा कि क्या हो रहा हैः

शायद बड़ा बेटा छोटे बेटे को पहचान नहीं पाया या हो सकता है कि उसके चारों ओर नाच रहे सभी लोग उसे देख ही न पाए हों।

घ. तुम्हारा भाई आ गया है और तुम्हारे पिता ने मोटा बछड़ा मारा हैः

बड़ा बेटा ये दो बातें सुनकर क्रोधित हो गया - छोटा भाई लौट आया है और पिता ने मोटा बछड़ा मारकर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की है। मोटा बछड़ा मारना एक असाधारण घटना थी। इसीलिए दास ने इसका उल्लेख किया। वास्तव में दास को मोटा बछड़ा के बारे में बोलने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि प्रश्न प्रसन्नता के कारण के बारे में था।

ड. लेकिन वह क्रोधित था और अंदर नहीं गयाः

बड़ा बेटा इस बात से प्रसन्न नहीं था कि भाई का इतना हर्षोल्लास से स्वागत किया गया। उसने शिकायत की और इसे अपनी आज्ञाकारिता और निष्ठा का अपमान समझा।

च. इसलिए उसके पिता बाहर आए और उससे विनती की... पुत्र, तुम सदा मेरे साथ होः

पिता भी बड़े बेटे से प्रेम करते थे और उन्होंने उससे विनम्रतापूर्वक विनती की। उन्होंने सभी शिष्टाचारों को त्याग दिया और घर से बाहर आकर बड़े बेटे से विनती की।

छ. मैंने कभी कोई अपराध नहीं किया... तुमने कभी कुछ नहीं दियाः

ये अतिशयोक्तियाँ उन लोगों में आम हैं जो कड़वाहट को अपने भीतर संजोए रखते हैं। बड़े बेटे ने अंततः अपने पिता के प्रति यह कड़वाहट प्रकट की, लेकिन तब तक यह कड़वाहट उसके हृदय में वर्षों से गहरा घाव कर चुकी थी।

बड़ा भाई अपने पास जो कुछ भी था, उसकी कद्र नहीं करता था। उसे अपने पिता का साथ और सुखमय घर प्राप्त था। उसके पिता का प्रेम उसके चारों ओर निरंतर बना रहता था, और पिता के पास जो कुछ भी था, वह उसका था। फिर भी, अभिमानी और आत्म-धर्मी लोग हमेशा महसूस करते हैं कि उनके साथ उतना अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता जितना वे हकदार हैं। छोटे बेटे ने जो कहा था, उसे याद रखो - “मेरे पिता के कितने मजदूरों के पास पर्याप्त रोटी है और कुछ बच भी जाती है“।

बड़े बेटे के पास पिता की सारी संपत्ति थी, सिवाय पिता के दिल के। कभी-कभी हम पानी में पड़े कंकड़ की तरह होते हैं। चाहे कितने ही साल पानी में रहें, उन्हें बाहर निकाल कर तोड़कर देखें, तो अंदर पानी की एक बूँद भी नहीं मिलती। बड़ा बेटा ’मेरा भाई आया’ कहने के बजाय कहता है, ’आपका बेटा आया’। उसने छोटे भाई पर उस पाप का आरोप भी लगाया जिसका उसे शक था (वेश्यावृत्ति)।

ज. तुम्हारा भाई आयाः

पिता बड़े बेटे को बड़े ही प्यार से समझाते हुए कहते हैं, “तुम्हारा भाई आया।“

झ. हमें आनंद मनाना और खुश रहना चाहिए थाः

इससे अध्याय की शुरुआत में मौजूद धार्मिक नेताओं की शिकायत का जवाब मिल गया। उनके पास शिकायत करने का कोई कारण नहीं था, बल्कि खुश रहने के सारे कारण थे।

ञ. ’प्रेम-उदार पिता’ का दृष्टांतः

तीसरे दृष्टांत का शीर्षक ’प्रेम-उदार पिता’ माना जाता है; क्योंकि दृष्टांत में यह नहीं बताया गया है कि छोटा बेटा हमेशा घर में रहा या नहीं और बड़ा बेटा घर में आया या नहीं। लेकिन दृष्टांत में यह जरूर कहा गया है कि पिता अपने दोनों बेटों को घर में आमंत्रित करने के लिए घर से बाहर आया था।

निष्कर्षः

इन तीनों दृष्टांतों का संदर्भ यह है कि येसु नाकेदारों और पापियों के साथ बैठे थे, और फरीसी और शास्त्री इस पर बड़बड़ा रहे थे। इसलिए येसु ने दोनों समूहों के लिए ये दृष्टांत कहेः पहले दृष्टांत में बाहर खोई हुई भेड़ नाकेदारों और पापियों का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरे दृष्टांत में घर के अंदर खोया हुआ सिक्का फरीसियों और शास्त्रियों का प्रतिनिधित्व करता है, और तीसरे दृष्टांत में बाहर खोया हुआ छोटा बेटा नाकेदारों और पापियों का प्रतिनिधित्व करता है, और घर के अंदर खोया हुआ बड़ा बेटा फरीसियों और शास्त्रियों का प्रतिनिधित्व करता है।

पहली कहानी में सौ में से एक खो गया था। दूसरी कहानी में दस में से एक खो गया था और तीसरी कहानी में दो में से दोनों ही खो गए थे।

ये तीनों दृष्टांत हमें बताते हैं कि एक चर्च या परिवार में, आत्माएँ तीन तरीकों से खो सकती हैं। यह अपनी गलती के कारण खो सकती है, जैसे खोई हुई भेड़। यह हमारी अपनी चरवाही की लापरवाही के कारण खो सकती है, जैसे खोए हुए सिक्के के मामले में। यह अपने मूर्खतापूर्ण निर्णयों और कठोर हृदयता के कारण भी खो सकती है, जैसे क्रमशः छोटे बेटे और बड़े बेटे के मामले में।


Praise the Lord!