Hindi Bible Commentary
येसु जानते थे कि उनकी बढ़ती हुई प्रसिद्धि और लोकप्रियता के कारण, धार्मिक व्यवस्था के अगुवों (जिनमें फरीसी भी शामिल थे) के साथ शीघ्र ही टकराव होगा। फिर भी, येसु जानते थे कि येरूसालेम में टकराव का समय अभी सही नहीं आया था, इसलिए वे गलील लौट गए।
ख. येसु ने योहन से अधिक चेले बनाए और उन्हें बपतिस्मा दिया (यद्यपि येसु स्वयं बपतिस्मा नहीं देते थे, बल्कि उनके चेले देते थे)ःबाइबल के विवरणों के अनुसार, यह विवादित है कि क्या येसु ने व्यक्तिगत रूप से लोगों को बपतिस्मा दिया था; क्योंकि योहन 3ः22-26 यह संकेत देता है कि येसु बपतिस्मा देते थे, जबकि योहन 4ः2 स्पष्ट करता है कि बपतिस्मा देने का कार्य उनके चेले कर रहे थे। यह पश्चाताप का बपतिस्मा था, न कि वह संस्कारात्मक बपतिस्मा जो बाद में स्थापित किया गया, जिसके द्वारा विश्वासियों को येसु की मृत्यु और पुनरुत्थान में सम्मिलित किया जाता है (रोमियों 6ः4)। अधिक संभावना यही है कि बपतिस्मा येसु स्वयं नहीं, बल्कि उनके चेले दे रहे थे।
ग. उसे सामरिया से होकर जाना ही था (4)ःयेरूसालेम से गलील जाने का सबसे छोटा मार्ग सामरिया से होकर जाने वाला रास्ता था। हालांकि, धर्मपरायण यहूदी सामरियों के प्रति अपनी नापसंदगी के कारण इस मार्ग से बचते थे।
इसका कारण इस प्रकार हैः जब अश्शूरियों ने इस्राएल के उत्तरी राज्य पर विजय प्राप्त की (722 ईसा पूर्व), तो उन्होंने लगभग पूरी यहूदी आबादी को निर्वासित कर दिया और उन्हें उस भूमि से हटा दिया। उन्होंने केवल समाज के सबसे निचले वर्गों के लोगों को पीछे छोड़ा। 136 वर्ष बाद, बाबुलियों ने यहूदा के दक्षिणी राज्य पर विजय प्राप्त की और इसी प्रकार की नीति अपनाई। पीछे छोड़े गए ये लोग अन्य गैर-यहूदी लोगों के साथ विवाह करने लगे, जो धीरे-धीरे इस क्षेत्र में आए, और समारी एक जातीय और धार्मिक समूह के रूप में उभरे।
क्योंकि सामरियों का इस्राएल के लोगों के साथ ऐतिहासिक संबंध था, इसलिए उनका विश्वास मूसा की व्यवस्था के आदेशों और रीति-रिवाजों का मिश्रण था, जिसमें विभिन्न मूर्तिपूजक रीति-रिवाज और अंधविश्वास भी शामिल थे। येसु के समय के अधिकांश यहूदी सामरियों से घृणा करते थे और उन्हें अन्यजातियों से भी अधिक नापसंद करते थे। सामरियों ने गरिज्ज़ीम पर्वत पर यहोवा के लिए अपना स्वयं का मंदिर बनाया, लेकिन यहूदियों ने लगभग 128 ईसा पूर्व में उसे जला दिया। इससे यहूदियों और सामरियों के बीच संबंध और भी खराब हो गए।
घ.यह कहा गया है कि येसु को सामरिया से होकर जाना ही थाःयह यात्रा की व्यवस्था या व्यावहारिक आवश्यकता के कारण नहीं था, बल्कि इसलिए क्योंकि येसु पूरी मानवता के लिए आए थे और वे इस समारी स्त्री को बचाना चाहते थे। सुसमाचारों में हम सुनते हैं कि कुछ अवसरों पर येसु केवल एक व्यक्ति के लिए किसी विशेष स्थान पर गए- येसु गलील से सुख़ार (अन्यजातियों के नगरों) में कनानी स्त्री के लिए गए (मत्ती 15ः21); येसु समुद्र के उस पार गेरासेनियों के देश में एक दुष्टात्मा-ग्रस्त व्यक्ति को चंगा करने गए (मरकुस 5ः1); येसु ज़क्क्ेयुस के लिए यरीहो से होकर गए (लूकस 19ः1)।
सुख़ार नगर प्राचीन शक्केम था, और यह सामरियों की राजधानी थी।
यह वह स्थान था जहाँ अब्राम पहली बार बाबुल से कनान में आने के बाद पहुँचे थे। (उत्पत्ति 12ः6)
यह वह स्थान था जहाँ ईश्वर पहली बार कनान में अब्राम पर प्रकट हुए और उन्हें तथा उनके वंशजों को भूमि देने की प्रतिज्ञा को फिर से स्थापित किया। (उत्पत्ति 12ः7)
यह वह स्थान था जहाँ अब्राम ने एक वेदी बनाई और प्रभु के नाम को पुकारा। (उत्पत्ति 12ः8)
यह वह स्थान था जहाँ याकूब लाबान के साथ अपने प्रवास के बाद अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ सुरक्षित लौटे थे। (उत्पत्ति 33ः18)
यह वह स्थान था जहाँ याकूब ने कनानी व्यक्ति हमोर से 100 चाँदी के टुकड़ों में भूमि का एक भाग खरीदा था। (उत्पत्ति 33ः19)
यह वह स्थान था जहाँ याकूब ने प्रभु के लिए एक वेदी बनाई और उसका नाम एल एलोहे इस्राएल रखा। (उत्पत्ति 33ः20) इसने याकूब और उस स्थान पर स्थित उस कुएँ के बीच संबंध स्थापित किया, जिसे बाद में याकूब के कुएँ के नाम से जाना गया।
सुख़ार (शकेम) वह स्थान भी था जहाँ याकूब की बेटी दीना का बलात्कार हुआ था-और बदले में याकूब के पुत्रों ने नगर के पुरुषों का नरसंहार किया था। (उत्पत्ति 34)
यह वही भूमि का भाग था जो याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दिया था, वह भूमि जिसे याकूब ने एक अप्रतिवेदित युद्ध में अपनी तलवार और धनुष से एमोरियों से जीता था। (उत्पत्ति 48ः22)
यहीं पर यूसुफ की हड्डियों को अंततः दफनाया गया, जब उन्हें मिस्र से बाहर लाया गया था। (जोषुआ 24ः32)
यहीं पर जोषुआ ने इस्राएल के साथ वाचा बाँधी, इस्राएल के ईश्वर के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत किया और यह घोषणा की, “जहाँ तक मरियम और मेरे घराने की बात है, हम यहोवा की सेवा करेंगे।” (जोषुआ 24)
लंबे दिन तक चलने के बाद येसु थक गए थे। योहन ने हमें यह दिखाने में सावधानी बरती है कि येसु ईश्वर हैं, लेकिन वह यह भी चाहते थे कि हम जानें कि येसु मनुष्य भी थे। येसु ने वास्तव में हमारी मानवीय सीमाओं को स्वीकार किया। येसु का यह एक विरोधाभास है कि जो विश्राम देता है, वही थका हुआ है (मत्ती 11ः28 “हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ...मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”)
ग. कुएँ के पास बैठना। दोपहर का समय थाःयद्यपि येसु थके हुए थे, फिर भी गर्म धूप में येसु समारी स्त्री की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी कारण उन्होंने सभी शिष्यों को रोटी खरीदने के लिए भेज दिया था।
यह स्त्री असामान्य समय पर पानी लेने आई थी और वह अकेली आई थी। सामान्यतः स्त्रियाँ दिन में पहले, ठंडे समय में पानी भरने आती थीं और वे समूह में आती थीं। संभव है कि अचानक कोई आवश्यकता उत्पन्न हुई हो, या शायद वह समाज से बहिष्कृत थी और समुदाय की अन्य स्त्रियों द्वारा उससे दूरी बनाई जाती थी।
ख. उसके चेले नगर में भोजन खरीदने गए थे (8)ःयह अजीब बात है कि येसु ने सभी शिष्यों को नगर में भोजन खरीदने के लिए भेज दिया। अगर वहाँ शिष्य होते, तो येसु उस समारी महिला के पापों के बारे में बात नहीं कर पाते। यहाँ येसु ने उस पापी महिला की गरिमा का सम्मान किया। येसु इस पापीनि स्त्री की आत्मा के लिए “प्यासे” थे, इसलिए उन्होंने ऐसा अवसर बनाया जहाँ वह अकेले उससे बातचीत कर सकें, जो उसे पश्चाताप की ओर ले जाएगी।
ग. येसु ने उससे कहाःपरंपरा के अनुसार, एक रब्बी सार्वजनिक स्थान पर किसी स्त्री से बात नहीं करता था, यहाँ तक कि अपनी पत्नी, बेटी या बहन से भी सार्वजनिक रूप से बात नहीं करता था। उस समय किसी यहूदी व्यक्ति के लिए किसी समारी से सहायता माँगना या उसके पात्र से पानी स्वीकार करना भी बहुत असामान्य था। येसु के अनुरोध ने वास्तव में उस स्त्री को आश्चर्यचकित कर दिया। शिष्य भी आश्चर्यचकित हुए कि येसु उससे बात कर रहे थे (योहन 4ः27)।” (डेविड गूज़िक)
घ. मुझे पानी पिलाःकुछ लोग सोचते हैं कि ईश्वर की सबसे अधिक महिमा तब होती है जब मानव सहभागिता को पूरी तरह हटा दिया जाता है। लेकिन प्रेम करने वाला ईश्वर इसी प्रकार कार्य करता है। येसु का यह एक विरोधाभास है कि जिसके पास जीवित जल है, वही कुएँ से पानी माँगता है (योहन 7ः37 “यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आए... और पीए... और विश्वास करने वाले के हृदय में से जीवित जल की नदियाँ बह निकलेंगी।”)
इस बातचीत ने सामरियों के लिए येसु को संसार के उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करने का मार्ग खोला (योहन 4ः42)। आइए हम भी ऐसी बातचीत में शामिल हों जहाँ लोग येसु पर विश्वास करने लगें।
ड. तू जो यहूदी है, मुझ समारी स्त्री से पानी कैसे माँगता है?स्त्री येसु की मित्रतापूर्ण भावना से प्रभावित हुई। उसके लिए किसी यहूदी पुरुष से दयालु अभिवादन सुनना असामान्य था, क्योंकि सामान्य रूप से यहूदी सामरियों के साथ कोई व्यवहार नहीं रखते थे। कई कारणों से, येसु के दिनों में अधिकांश धार्मिक नेताओं द्वारा इस स्त्री को तुच्छ समझा जाता। वह एक स्त्री थी, एक समारी थी, और उसका चरित्र भी संदिग्ध था।
येसु परमपिता ईश्वर का वरदान हैं (योहन 3ः16) और येसु त्रिएक ईश्वर के दूसरे व्यक्ति हैं, जो जीवित जल दे सकते हैं। अक्सर परिचय से तिरस्कार उत्पन्न होता है। हम येसु का वास्तविक मूल्य, पवित्र मिस्सा का वास्तविक मूल्य, बाइबल, हमारा जीवन, हमारा परिवार आदि का वास्तविक मूल्य नहीं जानते।
येसु स्वयं कहते हैं- “धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वे देखती हैं, और तुम्हारे कान, क्योंकि वे सुनते हैं। मैं तुमसे सच कहता हूँ, बहुत से नबीयों और धर्मी लोगों ने उन बातों को देखने की इच्छा की जिन्हें तुम देखते हो, पर उन्हें नहीं देखा; और उन बातों को सुनने की इच्छा की जिन्हें तुम सुनते हो, पर उन्हें नहीं सुना।” (मत्ती 13ः16-17)
क्या आप मानते हैं कि आप धन्य हैं क्योंकि आप येसु को जान पाए हैं, और उनका शरीर और लहू ग्रहण करने से अधिक धन्य हैं?
ख. वह तुम्हें जीवित जल देताःप्राचीन समय में झरने के पानी को जीवित जल कहा जाता था क्योंकि वह भूमि से बुलबुलाते हुए ऊपर आता हुआ जीवित सा प्रतीत होता था।
पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि येसु ने इस स्त्री को पास के किसी सक्रिय झरने के बारे में बताया। लेकिन येसु ने “जीवित जल” वाक्यांश के साथ शब्दों का खेल किया, क्योंकि उनका अर्थ वह आत्मिक जल था जो आत्मिक प्यास को बुझाता है और जीवन देता है।
“पुराने नियम में जीवित जल को कभी-कभी यहोवा से जोड़ा गया है। उसे ‘जीवित जल का सोता’ कहा गया है (यिरमियाह 2ः13, 17ः13)।” (मॉरिस)
ग. प्रभु, अपके पास कोई डोल नहीं हैःनगर में जाते समय, संभवतः चेलों ने चमड़े की थैली साथ ले ली थी जिसका उपयोग पानी निकालने के लिए डोल के रूप में किया जाता था। वह यह नहीं जानती थी कि यद्यपि येसु शारीरिक रूप से प्यासे थे, फिर भी उस स्त्री को बचाने के लिए उनकी आत्मिक प्यास अधिक थी।
घ. प्रभु, आपके पास डोल नहीं है और कुआँ गहरा हैःतर्क के दृष्टिकोण से स्त्री बिल्कुल सही थी। बहुत बार हम येसु के पास यह सोचकर नहीं आते कि हमारी समस्याएँ, हमारे अंदर के घाव और कठिनाइयाँ येसु के संभालने के लिए ”बहुत गहरी” हैं। इस प्रकार हम स्वयं को येसु के आशीषों से वंचित कर लेते हैं।
ईश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है (लूकस 1ः37); “क्या मेरा हाथ इतना छोटा हो गया है कि छुड़ा नहीं सकता? या मुझ में छुड़ाने की सामर्थ्य नहीं? मेरी डाँट से मैं समुद्र को सुखा देता हूँ, मैं नदियों को जंगल बना देता हूँ।” (इसायाह 50ः2)। “क्या यहोवा की शक्ति सीमित है?” (गिनती 11ः23)।
ड. क्या आप हमारे पिता याकूब से भी बड़े हैःयह बताना कठिन है कि स्त्री ने यह प्रश्न ईमानदारी से पूछा था या वह व्यंग्यपूर्ण आलोचना कर रही थी। सब कुछ उसकी आवाज़ के लहजे पर निर्भर था। यह तथ्य कि येसु के साथ मुलाकात के अंत में वह विश्वास करने लगी, यह संकेत दे सकता है कि यह एक ईमानदार प्रश्न था।
क्या आप बड़े है...ः येसु याकूब से बड़े हैं (योहन 4ः13-15), योना से बड़े हैं (लूकस 11ः32), सुलैमान से बड़े हैं (लूकस 11ः31), मूसा से बड़े हैं (मत्ती 5) और अब्राहम से बड़े हैं (योहन 8ः58)।
येसु जानते थे कि यह स्त्री - और पूरे गाँव के लोग - अपनी स्वाभाविक प्यास बुझाने के लिए प्रतिदिन इस कुएँ पर आते थे। येसु ने प्यास को उस आत्मिक आवश्यकता और लालसा के चित्र के रूप में उपयोग किया जो हर व्यक्ति में होती है।
ख. जो कोई उस जल को पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह कभी प्यासा न होगाःयेसु ने एक अद्भुत प्रस्ताव दिया। उन्होंने जो दिया वह स्थायी संतुष्टि थी। लोगों के लिए यह सामान्य बात है कि वे ईश्वर द्वारा दी गई अपनी अंदरूनी प्यास को बहुत सी चीज़ों से, या इस अस्थायी संसार की किसी भी वस्तु से, संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं, सिवाय उस चीज़ के जो येसु देते हैं। लोग प्यासे हैं - वे चाहते हैं, वे लालसा करते हैं, वे खोजते हैं, वे प्रयास करते हैं; लेकिन केवल वही जो येसु देते हैं, मनुष्य की आत्मा और प्राण के सबसे गहरे स्तरों को संतुष्ट करता है। इसलिए स्तोत्रकार कहता हैः “यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे किसी बात की कमी नहीं।” (स्तोत्र 23ः1)। “सिंहों को तो घटी होती और वे भूखे रहते हैं, परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होगी” (स्तोत्र 34ः10)। यदि आपके जीवन में येसु हमेशा हैं, तो आपको कभी भी प्यास नहीं लगेगी।
ग. परन्तु जो जल मैं दूँगा वह उसमें जल का ऐसा स्रोत बन जाएगा जो अनन्त जीवन तक उमड़ता रहेगाःयेसु द्वारा दिए गए जल को पीने का प्रभाव अनन्त जीवन है।
घ. प्रभु, मुझे यह जल दे (16)ःसमारी स्त्री की प्रतिक्रिया तर्कसंगत थी, लेकिन आत्मिक नहीं थी। वह प्रतिदिन कुएँ पर आने के परिश्रम से बचना चाहती थी। यहाँ वह सांसारिक जल मांग रही है, आध्यात्मिक जल नहीं।
येसु ने उसे मॉगने से भी तुरंत “जीवन देने वाला जल” नहीं दिया, क्योंकि जीवन देने वाले जल को पीने से पहले उसे अपने पाप से निपटना आवश्यक था। जैसे हम स्वच्छ जल डालने से पहले पात्र को साफ करते हैं; उसी प्रकार हमें अपने हृदय में जीवन देने वाला जल डालने से पहले अपने अंदरूनी मनुष्य को शुद्ध करना आवश्यक है। यह कोई अजीब अनुरोध नहीं था। स्त्री के साथ इस लंबे, सार्वजनिक वार्तालाप में येसु सांस्कृतिक मर्यादा की सीमाओं को पार कर रहे थे। यदि उस स्त्री का पति उपस्थित होता, तो यह बातचीत सांस्कृतिक रूप से अधिक उचित मानी जाती।
ख. मेरा कोई पति नहीं है... तेरे पाँच पति रह चुके हैंःयह कहने में स्त्री ईमानदार थी कि उसका कोई पति नहीं है - जो तकनीकी रूप से सही था, लेकिन येसु अलौकिक रूप से जानते थे कि उसके विवाह के इतिहास की कहानी में इससे कहीं अधिक बातें थीं। यहाँ येसु उस स्त्री के विवेक को जागृत करते हैं।
येसु हमारी समस्या के मूल कारण को जानते हैं। धनी युवा व्यक्ति से येसु ने कहा, “तुम में एक बात की कमी है; जाओ, जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बेचकर गरीबों को दे दो” (मरकुस 10ः21)। लकवे के रोगी से येसु ने कहा, “पुत्र, तेरे पाप क्षमा हुए” (मरकुस 2ः5)। आईए हम येसु के पास जाये, वह हमारे जीवन के समस्याओं का मूल कारण हमें बतायेंगे।
ग. और जिसे अब तुम रखती हो वह तुम्हारा पति नहीं हैःयेसु ने इस लज्जाजनक विषय को इसलिए उठाया क्योंकि उसके पापमय जीवन का सामना करना आवश्यक था। इस स्त्री को निर्णय लेना था कि वह किससे अधिक प्रेम करती हैः अपने पाप से या मसीहा से।
जब येसु ने कहा कि जिस पुरुष के साथ वह रह रही थी वह “तुम्हारा पति नहीं है,” तो येसु ने दिखाया कि साथ रहना (लिव-इन रिलेशनशिप) और विवाह एक समान नहीं हैं। येसु ने यह भी दिखाया कि केवल इसलिए कि कोई किसी संबंध को विवाह कहता है, इसका अर्थ यह नहीं है कि येसु उसे विवाह मानते हैं। विवाह में तीन व्यक्तियों की सहमति आवश्यक हैः दुल्हन, दूल्हा और येसु (और उन माता-पिता की “सहमति” भी जिन्होंने हमारा पालन-पोषण किया)। और यदि हम कैथोलिक कलीसिया से संबंधित हैं, तो हमें कलीसिया की प्रक्रियाओं से भी गुजरना आवश्यक है।
घ. महोदय, मैं देखती हूँ कि आप एक नबी हैंःयह उस स्त्री का एक स्पष्ट निष्कर्ष था। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह आश्चर्यचकित हुई; शायद येसु के द्वारा उसके जीवन का अलौकिक ज्ञान रखने से स्तब्ध रह गई।
यह बहस केवल प्रार्थना के विषय में नहीं, बल्कि बलिदान चढ़ाने के उचित स्थान के विषय में थी।
यहाँ समारी स्त्री येसु से पूछती है कि आराधना गेरिज्जीम पर्वत पर होनी चाहिए या येरूसालेम में। कैथोलिक आन्सर्स द्वारा समझाई गई कैथोलिक व्याख्या येसु के उत्तर (वचन 21-24) पर केंद्रित है, जिसमें पुराने विधान की स्थानीय बलिदान-आधारित आराधना से “आत्मा और सत्य” में सच्ची, सार्वभौमिक आराधना की ओर परिवर्तन दिखाया गया है।
आत्मा और सत्यः इसका अर्थ है कि ईश्वर की आराधना वहाँ की जाए जहाँ पिता उपस्थित हैं, विशेष रूप से नए, सार्वभौमिक बलिदान अर्थात् मिस्सा के माध्यम से, जो आराधना के लिए एक केंद्रीय स्थान की आवश्यकता को पूरा करता है।
कैथोलिक चर्च सिखाता है कि यूकेरिस्ट (मिस्सा) “ईसाई जीवन का स्रोत और शिखर“ है। यह स्रोत इसलिए है क्योंकि सारी कृपा, आध्यात्मिक पोषण और सुसमाचार का प्रचार यहीं से मिलता है; यह शिखर इसलिए है क्योंकि यह पूजा का सर्वोच्च बिंदु और स्वर्ग की एक झलक है (सीसीसी 1324)।
ख. तुम जिसकी आराधना करते हो उसे नहीं जानते; हम जिसकी आराधना करते हैं उसे जानते हैंःयह ईश्वर के सच्चे ज्ञान को दर्शाता है, जो व्यवस्था, नबीयों और अंततः येसु मसीह में प्रकट हुआ, जिसे यहूदी परंपरा जानती थी (सामरियों की भ्रष्ट आराधना के विपरीत)। ईसाई उस ईश्वर की आराधना करते हैं जिसे वे जानते हैं; जबकि गैर-ईसाई ऐसे ईश्वर की आराधना करते हैं जिसे वे नहीं जानते; क्योंकि येसु ईश्वर के प्रकाशन की पूर्णता हैं।
समारी लोग केवल इब्रानी धर्मग्रन्थ के पहले पाँच ग्रंथों को स्वीकार करते थे और बाकी को अस्वीकार करते थे। उनका विश्वास था कि मूसा ने आशीष के पर्वत, गेरिज्जीम पर्वत पर एक वेदी स्थापित करने की आज्ञा दी थी-और यही उस पर्वत पर उनकी आराधना प्रणाली का आधार था। लेकिन जैसे हर वह विश्वास जो विभिन्न धर्मों के तत्वों को मिलाने का प्रयास करता है, वे उस ईश्वर की आराधना करते थे जिसे वे नहीं जानते थे।
पौलुस ने एथेंस में लोगों को एक अज्ञात ईश्वर की आराधना करते हुए देखा (प्रेरित चरित 17ः23)। क्या आप किसी अज्ञात येसु की आराधना कर रहे हैं?
ग. क्योंकि उद्धार यहूदियों में से हैःकैथोलिक व्याख्या इस बात पर जोर देती है कि ईश्वर ने संसार में उद्धार लाने के लिए यहूदी लोगों को चुना, और मसीहा उन्हीं में से आया।
घ. परन्तु वह घड़ी आ रही है, और अब आ पहुँची है, जब सच्चे आराधक आत्मा और सत्य में पिता की आराधना करेंगे, क्योंकि पिता ऐसे ही लोगों को अपनी आराधना करने के लिए खोजता है (23)ःयेसु समारी स्त्री से कहते हैं कि सच्ची आराधना अब किसी भौतिक स्थान (जैसे येरूसालेम या गेरिज्जीम पर्वत) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे “आत्मा और सत्य” में पिता की आराधना करने के द्वारा परिभाषित किया जाता है- पवित्र आत्मा के माध्यम से और मसीह के साथ एकता में। ईश्वर की आराधना जगहों में या केवल बाहरी अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि हमारे दिल में निरंतर होनी चाहिए।
ड. ईश्वर आत्मा है, और जो उसकी आराधना करते हैं उन्हें आत्मा और सच्चाई में आराधना करनी चाहिएःइन शब्दों के द्वारा येसु ने सच्ची आराधना का आधार बतायाः यह स्थानों में नहीं, बल्कि आत्मा और सच्चाई में पाई जाती है।
आत्मा में आराधनाः इसका अर्थ है पवित्र आत्मा द्वारा सामर्थ्य दी गई आराधना। धर्मग्रन्थ हमें कहता है ‘पवित्र आत्मा में प्रार्थना करो’ (एफेसियों 6ः18; यूदस 20)।
सच्चाई में आराधनाः इसका अर्थ है सुसमाचार की सच्चाई और येसु के प्रकाशन के अनुसार आराधना करना, क्योंकि येसु स्वयं “मार्ग, सत्य और जीवन“ हैं। यह आराधक के हृदय की ईमानदारी से भी संबंधित है।
च. मैं जानती हूँ कि मसीहा आने वाला है। जब वह आएगा, तो हमें सब बातें बता देगा (25)ःसमारी स्त्री येसु से कहती है कि वह जानती है कि मसीहा आने वाला है जो सब कुछ समझाएगा। यह महिला अपने पापमय अतीत और समारी व्यक्ति होने की स्थिति के बावजूद, वह उद्धारकर्ता की आवश्यकता को पहचानती है।
छ. मैं, जो तुझ से बातें कर रहा हूँ, वही हूँःयद्यपि यह स्त्री पापिनी थी, येसु ने स्वयं को उसके सामने प्रकट किया।
चेले आश्चर्यचकित थे कि येसु ने समारी स्त्री के साथ लंबे संवाद के द्वारा सांस्कृतिक मर्यादाओं की सीमाओं को पार किया।
फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहाः उनका मौन आदर के कारण था।
ख. तब वह स्त्री अपना पानी का घड़ा छोड़कर नगर को चली गईःशायद चेलों की चुप्पी में छिपी असहजता को महसूस करके, वह स्त्री येसु के साथ अपनी बातचीत छोड़कर सुख़ार नगर लौट गई। उसने येसु के साथ अपने समय से इतनी प्रभावित होकर (और इतनी निश्चित होकर कि वह फिर उसके पास आएगी) अपना पानी का घड़ा कुएँ पर ही छोड़ दिया। वह कुएँ पर आने का उद्देश्य भूल गई, इसलिए उसने घड़ा छोड़ दिया। येसु उद्धारकर्ता से मिलने से वह अभिभूत हो गई थी।
ग. आओ, एक मनुष्य को देखो जिसने मुझे वह सब बता दिया जो मैंने कभी किया है। क्या यही मसीह हो सकता है?येसु ने इस स्त्री पर इतनी गहरी प्रभाव छोड़ी कि वह अपने नगर के लोगों को बताने के लिए विवश हो गई कि वे कुएँ पर आएँ और येसु से मिलें। येसु ने उसे प्रभावित किया और अपनी ओर आकर्षित किया, यद्यपि उन्होंने उसके पापों का सामना उसके सामने रखा (वे सब काम जो मैंने किए)।
समारी स्त्री येसु के प्रेम से इतनी प्रभावित हुई कि अब उसने अपने साथी नगरवासियों को खोजा, जबकि पहले उन्होंने उसके साथ एक बहिष्कृत व्यक्ति जैसा व्यवहार किया था। “यदि वह पहले अपने साथी नागरिकों की संगति से बचती थी, तो अब वह बदली हुई स्त्री थी; उसे उन्हें ढूँढना और अपनी खबर उनके साथ बाँटना आवश्यक था।” (ब्रूस)
येसु ने इतना प्रेम और इतनी सुरक्षा की भावना दिखाई कि वह अपने पाप के प्रकट होने पर भी उसके साथ सुरक्षित महसूस करने लगी। येसु के अनुयायियों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे आज लोगों को अपने पापों को स्वीकार करने, पश्चाताप करने और येसु पर विश्वास रखने के लिए एक सुरक्षित स्थान दें।
येसु के साथ इस पूरे संवाद ने उसे यह महसूस नहीं कराया कि, “वह मुझसे घृणा करता है” या “वह मेरा न्याय करता है,” बल्कि यह कि “वह मुझसे प्रेम करता है,” क्योंकि वह मसीहा है (मैं, जो तुझ से बातें कर रहा हूँ, वही हूँ, योहन 4ः26)।
उसने मुझे वह सब बातें बता दीं जो मैंने कभी की थींः “यहूदियों का विश्वास था कि मसीहा की एक आवश्यक विशेषता यह होगी कि वह सभी हृदयों के रहस्यों को बता सकेगा। उनका विश्वास था कि यह इसायाह 11ः2, 3 में भविष्यवाणी की गई थी।” (क्लार्क)
घ. तब वे नगर से निकलकर उसके पास आएःस्त्री का निमंत्रण प्रभावी हुआ। जब उसने लोगों को बताया कि येसु कौन हैं और कैसे उन्होंने उनके छोटे से संवाद के द्वारा उसके जीवन को प्रभावित किया, तो लोग आए।
समारी स्त्री द्वारा येसु की खोज के चरणः पहले उसने येसु को एक यहूदी के रूप में देखा (योहन 4ः9); फिर उसने महसूस किया कि येसु एक महान व्यक्ति हैं। इसलिए उसने उन्हें ‘प्रभु’ या ‘स्वामी’ कहा (योहन 4ः11)। इसके बाद उसने येसु को एक नबी के रूप में अनुभव किया (योहन 4ः19) और अंत में उसने येसु को मसीहा के रूप में अनुभव किया (योहन 4ः26, 29)। आपके लिए येसु कौन हैं?
शिष्य समारी गाँव में भोजन लेने गए थे, और चाहते थे कि येसु वह भोजन खाएँ जो वे उनके लिए लाए थे। येसु यह नहीं कह रहे थे कि भोजन, पेय और विश्राम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इसके बजाय, वे अपने शिष्यों को यह समझाना चाहते थे कि जीवन केवल इन चीज़ों से बढ़कर है; कि मनुष्य केवल रोटी से जीवित नहीं रहता।
निश्चय ही, येसु भूखे थे, लेकिन आत्माओं के लिए उनकी भूख शारीरिक भूख से कम तीव्र नहीं थी। इसी प्रकार हम देखते हैं कि येसु क्रूस पर अत्यंत पीड़ा में थे, फिर भी उनकी प्यास मनुष्यों की आत्माओं के लिए थी, इसलिए उन्होंने कहा मैं प्यासा हॅू (योहन 19ः28)।
ख. मेरा भोजन यह है कि मैं उसकी इच्छा पूरी करूँ जिसने मुझे भेजा हैःयेसु के पास उस भोजन से भी अधिक बड़ा सामर्थ्य और संतुष्टि का स्रोत था जिसे उन्होंने खाया-अपने ईश्वर और पिता की इच्छा को पूरा करना। सदियों के दौरान अनगिनत लोगों के अनुभव ने इस कथन में येसु को सत्य सिद्ध किया है।
“संसार का मनुष्य सोचता है कि यदि उसे अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ मिल जाए, तो वह पूर्ण रूप से खुश होगा, और इस अवस्था या अगली अवस्था में उसकी खुशी का सपना इस बात में समाया है कि उसकी अपनी इच्छाएँ पूरी होंगी, उसकी अपनी लालसाएँ संतुष्ट होंगी, और उसकी अपनी अभिलाषाएँ उसे प्रदान की जाएँगी। यह सब एक भूल है। मनुष्य इस प्रकार कभी खुश नहीं हो सकता।” (स्पर्जन) “येसु ने ईश्वर की इच्छा पूरी करने में बड़ी संतुष्टि पाई, यहाँ तक कि जब वे थके हुए थे। वास्तव में, ईश्वर की इच्छा को सचेत रूप से पूरा करना थके हुए येसु को ताज़गी देता था।” (डेविड गुज़िक)।
ग. और उसके कार्य को पूरा करनाःयेसु ने केवल ईश्वर के कार्य को आरंभ करने में ही नहीं, बल्कि उसे पूरा करने में भी संतुष्टि पाई। “यह क्रिया उस शब्द से संबंधित है जिसका उपयोग क्रूस पर किया गया था, जब येसु ने पुकारा ‘यह पूरा हुआ’ (योहन 19ः30)।” (मॉरिस)। संत पौलुस भी अपने जीवन के अंत में कहते हैंः मैंने दौड़ पूरी कर ली है (2 तिमथी 4ः7)।
“यह एक कहावत थी जिसका विचार यह था कि किसी कार्य के लिए विशेष जल्दी नहीं है क्योंकि चीज़ों में समय लगता है और प्रतीक्षा से बचा नहीं जा सकता। येसु नहीं चाहते थे कि उनके शिष्यों की ऐसी मानसिकता हो; वे चाहते थे कि वे ऐसा सोचें और कार्य करें जैसे कटनी अभी तैयार है।” (डेविड गुज़िक)
ख. अपनी आँखें उठाकर खेतों को देखो, वे कटनी के लिए पक चुके हैं (35इ)ःयेसु ने आत्मिक बातों को समझाने के लिए भोजन और कटनी के विचार का उपयोग किया। यहाँ येसु विशेष रूप से यह कह रहे थे कि समारी लोग (कटनी) नगर से निकलकर खेतों के पार उनकी ओर आ रहे थे। कटनी का विचार यह दर्शाता था कि बहुत से लोग ईश्वर के राज्य में स्वीकार किए जाने के लिए तैयार थे, और शिष्यों को स्वयं को उस कटनी में काम करने वाले-कटनी काटने वाले-के रूप में देखना चाहिए।
येसु ने अपने शिष्यों को चेतावनी दी कि वे यह न सोचें, “अभी चार महीने हैं और फिर कटनी आएगी।” यदि उनके पास देखने वाली आँखें होतीं, तो वे देखते कि कटनी अभी तैयार है-यहाँ तक कि कटनी के लिए सफेद हो चुकी है, जिसका अर्थ है कि अनाज पूरी तरह पक चुका था या आवश्यकता से अधिक पक चुका था।
ग. काटने वाला पहले ही मजदूरी पा रहा है और अनन्त जीवन के लिए फल इकट्ठा कर रहा है, ताकि बोने वाला और काटने वाला दोनों मिलकर आनंदित हों (36)ःयेसु ने अपने शिष्यों को उनके साथ किए जा रहे कार्य में कम से कम तीन तरीकों से प्रोत्साहित किया।
आत्माओं की कटनी में उनका कार्य प्रतिफल पाएगा (जो काटता है वह मजदूरी पाता है)।
उनके कार्य का भला परिणाम हमेशा बना रहेगा (अनन्त जीवन के लिए फल इकट्ठा करता है)।
कटनी में प्रत्येक कार्यकर्ता उस कार्य में मिलकर आनंदित होगा।
“कटनी तैयार है। मजदूरी वहाँ है। कोई मनुष्य पीछे न हटे। कटनी किसी की प्रतीक्षा नहीं करेगी।” (मॉरिस)
घ. मैंने तुम्हें वह काटने के लिए भेजा जिसके लिए तुमने परिश्रम नहीं किया; दूसरों ने परिश्रम किया, और तुम उनके परिश्रम में सम्मिलित हुएःशिष्य अब तुरंत कटनी काट सकते थे, और वे उस फसल को काट रहे थे जिसके बीज उन्होंने नहीं बोए थे।
येसु ने अपने दुखभोग और क्रूस पर मृत्यु के द्वारा बीज बोए, और उसी समय शिष्यों को कटनी काटने का अवसर मिला। कई बार ईश्वर का कार्य इसी प्रकार होता है-एक बोता है और दूसरा काटता है (1 कुरिन्थियों 3ः6-8)।
उस समय वे येसु और क्रूस पर उनके कार्य पर भरोसा करने के लिए पर्याप्त नहीं जानते थे; लेकिन वे निश्चित रूप से उन्हें ईश्वर के मसीहा के रूप में विश्वास कर सकते थे। उन्होंने विश्वास किया, और उस स्त्री के वचन के कारण विश्वास किया जिसने गवाही दी थी। यह आश्चर्यजनक है कि बहुत से सामरियों ने एक स्त्री की गवाही पर विश्वास किया; जबकि हम देखते हैं कि प्रेरितों ने प्रारंभ में येसु के पुनरुत्थान की स्त्रियों द्वारा दी गई सूचना को “बेकार की बातें” समझकर अस्वीकार कर दिया था (लूका 24ः11)।
ख. उसने मुझे वह सब कुछ बता दिया जो मैंने कभी किया हैःवह स्त्री इस बात से केवल चकित नहीं थी कि येसु उसके जीवन के तथ्यों को जानते थे, बल्कि इस बात से भी कि उसके जीवन के तथ्यों को जानने के बावजूद वह उससे प्रेम करते थे। हम कभी-कभी डरते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मेरे द्वारा किए गए हर काम को जान ले, तो वह मुझसे प्रेम नहीं कर सकेगा, लेकिन येसु इस स्त्री से प्रेम करते थे।
ग. वह वहाँ दो दिन तक ठहरेःयेसु के समय के अधिकांश यहूदी लोगों की सामरियों के प्रति राय को देखते हुए यह एक अद्भुत बात थी। वे सामरिया और सामरियों को ऐसी जगह और ऐसे लोगों के रूप में देखते थे जिनसे संभव हो तो बचना चाहिए, और यदि सामरिया से होकर जाना आवश्यक हो, तो जितनी जल्दी हो सके वहाँ से निकल जाना चाहिए। फिर भी येसु वहाँ दो दिन तक ठहरे।
“सामरियों द्वारा किसी यहूदी शिक्षक को अपने साथ ठहरने के लिए आमंत्रित करना, बिना किसी अस्वीकार किए जाने के डर के, यह दिखाता है कि उसने उनका विश्वास कितनी पूरी तरह से जीत लिया था।” (ब्रूस)
घ. बहुतों ने उसके अपने वचन के कारण विश्वास कियाःयेसु ने सामरियों के बीच जितने दिन बिताए, उन दिनों उन्होंने उन्हें शिक्षा दी, और बहुतों ने विश्वास किया। “हम सोच सकते हैं कि क्या यह वही ‘सामरिया का नगर’ था जिसका कुछ वर्षों बाद फिलिप्प ने सुसमाचार प्रचार किया था (प्रेरित चरित 8ः5)।” (ब्रूस)
ड. उन्होंने उस स्त्री से कहा, “अब हम तेरे कहने से विश्वास नहीं करते, क्योंकि हमने स्वयं सुन लिया है, और जानते हैं कि यह सचमुच संसार का उद्धारकर्ता है” (42)ःप्रारंभ में उन्होंने येसु पर उस स्त्री की गवाही के कारण विश्वास किया था-“विश्वास सुनने से आता है” (रोमियों 10ः17)। लेकिन अब वे येसु के साथ अपने स्वयं के अनुभव के कारण विश्वास करते हैं। इस अनुभव ने उन्हें येसु पर मसीहा और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करने के लिए प्रेरित किया (केवल यहूदियों के नहीं, बल्कि पूरे संसार के)।
हमारे माता-पिता, मित्रों आदि की गवाही के कारण येसु पर विश्वास करना अच्छा है। फिर भी सबसे उत्तम तब होता है जब हम येसु पर मसीहा और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में अपने व्यक्तिगत मिलन के कारण विश्वास करते हैं। संत योहन कहते हैं कि हम उसी की घोषणा करते हैं जिसे हमने सुना, देखा, ध्यान से देखा और स्पर्श किया (1 योहन 1ः1)।
गलील येसु का देश था-जहाँ वह बड़े हुए थे। क्योंकि ये लोग येसु से बहुत परिचित महसूस करते थे, इसलिए उन्होंने उनका वैसा आदर नहीं किया जैसा उन्हें करना चाहिए था। इससे हम समझते हैं कि वे वास्तव में येसु से परिचित नहीं थे; यदि वे होते, तो वे उनका और भी अधिक आदर करते। येसु के साथ झूठी परिचितता जैसी एक बात होती है; यह एक खतरनाक भावना है कि हम उनके बारे में सब कुछ जानते हैं। ऐसी खतरनाक भावना येसु के प्रति आदर की कमी की ओर ले जाती है।
तथाकथित घनिष्ठता से बचने के लिए हमें पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें ईश्वर के प्रति भक्ति और भय प्रदान करे (इसायाह 11ः1-2)। ख. गलीलियों ने उसका स्वागत किया (45)ःयेसु का अपने हृदय में स्वागत करना सबसे अच्छी बात है जो हम कर सकते हैं। मार्था ने येसु का अपने घर में स्वागत किया और समझा कि येसु के चरणों में बैठना ही वह सब है जो येसु चाहते हैं (लूकस 10ः38-42); ज़क्केयुस ने येसु का अपने घर में स्वागत किया और उसके घर में उद्धार आया (लूका 19ः6-10)। येसु के चेलों का स्वागत करना येसु का स्वागत करने के समान है और उन्हें भी प्रतिफल मिलता है (मत्ती 10ः40-42); चेलों का स्वागत करना चंगाई और आशीषें लाएगा (लूकस 10ः8-9), और चेलों का स्वागत न करना उन्हें आशीषों से वंचित करेगा (लूका 10ः10-11)।
ग. पर्व में येरूसालेम में उसके किए हुए सब कामों को देखकरःगलील के यहूदियों के लिए पर्वों के समय येरूसालेम जाना प्रथा थी (निर्गमन 23ः14-17 को पूरा करते हुए)। इस विशेष अवसर पर उन्होंने वह सब याद किया जो येसु ने येरूसालेम में किया था।
शायद उन्हें वह घटना याद थी जब येसु ने मंदिर के बाहरी आंगनों में व्यापारियों की मेज़ें उलट दी थीं (योहन 2ः13-27)। येसु ने अपने पुनरुत्थान की भी भविष्यवाणी की थी (योहन 2ः18-22) और येरूसालेम में रहते हुए कई अन्य अनिर्दिष्ट चिन्ह भी किए थे (योहन 2ः23-25)।
इस समय तक येसु ने कफरनहूम को अपना निवास स्थान बना लिया था (मत्ती 4ः13 और योहन 2ः12)। यद्यपि येसु काना में थे (योहन 4ः46ं), फिर भी वह कुलीन व्यक्ति कफरनहूम से काना तक लगभग 20 मील (32 किलोमीटर) की यात्रा करके आया।
यह शाही व्यक्ति संभवतः हेरोदेस अन्तिपास का एक अधिकारी था। यद्यपि वह ‘शाही’ था, फिर भी वह अपने बीमार पुत्र की सहायता नहीं कर सकता था। कभी-कभी हम संसार की दृष्टि में ‘शाही’ या प्रतिष्ठित हो सकते हैं, फिर भी असहाय होते हैं। शतपति एक बड़ा अधिकारी था, फिर भी वह अपने बीमार दास को बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकता था (मत्ती 8ः5-13)। दाऊद राजा था, फिर भी वह अपने पाप के कलंक को मिटा नहीं सका। इसलिए उसने कहा, ‘मेरा पाप सदैव मेरे सामने रहता है’ (स्तोत्र 51ः3)। “जो मनुष्य से असंभव है, वह ईश्वर से संभव है” (लूकस 18ः27)।
ख. वह उसके पास गया और उससे विनती की कि नीचे आकर उसके पुत्र को चंगा करे, जो मृत्यु के निकट थाःयह कुलीन व्यक्ति उन अनेक माता-पिताओं में से एक था जो अपने पीड़ित बच्चे के लिए येसु के पास आए थे। स्पष्ट रूप से वह एक बीमार बच्चे के पिता की तरह गहरी व्याकुलता और शीघ्रता के साथ आया था-उसका बच्चा मृत्यु के निकट था। धन्यवाद उन असाध्य बीमारियों, पूर्ण असफलताओं आदि के लिए, क्योंकि वे हमें ईश्वर के और निकट लाती हैं।
ग. जब तक तुम लोग चिन्ह और अद्भुत काम न देखोगे, तब तक विश्वास नहीं करोगेःयेसु ने उन लोगों को फटकारा जो विश्वास करने से पहले चिन्हों और अद्भुत कामों पर निर्भर रहते थे। ऐसा लग सकता है कि येसु उस व्यक्ति के प्रति कठोर थे जो अपने पुत्र के चंगाई के लिए आया था, लेकिन गलील में उन्होंने बहुत से ऐसे लोगों का सामना किया था जो केवल उनके चमत्कारों में रुचि रखते थे-इसलिए उन्होंने इस व्यक्ति से भी इसी अनुसार प्रश्न किया।
ईश्वर की ओर से चिन्ह और अद्भुत काम स्पष्ट रूप से अच्छी बातें हैं, लेकिन उन्हें हमारे विश्वास की नींव नहीं बनना चाहिए। हमें ईश्वर को सिद्ध करने के लिए उन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अपने आप में चिन्ह और अद्भुत काम हृदय को नहीं बदल सकते; इस्राएल ने सीनाय पर्वत पर अद्भुत चिन्ह देखे और यहाँ तक कि ईश्वर की अपनी आवाज भी सुनी (निर्गमन 19ः16-20ः1), फिर भी थोड़े समय बाद उन्होंने सोने के बछड़े की पूजा की (निर्गमन 32ः1-6)।
“ये शब्द सामरियों और यहूदियों के बीच के अंतर को दर्शाते हैं; समारी उसके वचन के कारण विश्वास करते थे, जबकि यहूदी तब तक विश्वास नहीं करते थे जब तक वे चिन्ह और चमत्कार न देखते।” (एल्फोर्ड)
यह व्यक्ति एक कुलीन व्यक्ति था, ऊँचे पद और प्रतिष्ठा वाला व्यक्ति। उसकी सारी प्रतिष्ठा और पदवी उसकी बड़ी आवश्यकता के सामने व्यर्थ प्रतीत हुई। उसने दुख और पीड़ा के सामने सबके समान होने का अनुभव किया।
ख. अधिकारी ने उससे कहा, “हे प्रभु, मेरे बालक के मरने से पहले नीचे चल।” (49)ःयेसु के पिछले शब्दों में ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्होंने उस शाही व्यक्ति को चमत्कार माँगने से हतोत्साहित किया। फिर भी यह विनती दिखाती है कि उस व्यक्ति ने सही रूप से समझा कि येसु चमत्कारी सहायता माँगने से नहीं रोक रहे थे, बल्कि केवल ऐसे विश्वास से रोक रहे थे जो केवल चमत्कार की खोज करता है।
उस शाही व्यक्ति ने येसु से अपनी कुलीन स्थिति के आधार पर या अपने पुत्र के शाही जन्म के आधार पर विनती नहीं की, बल्कि अपने पुत्र की बड़ी आवश्यकता के आधार पर की। उसका बच्चा मृत्यु के द्वार पर था; इसलिए वह विनती करता है कि दया का द्वार खुल जाए। एक महान और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में येसु के पास आना उसके लिए कोई लाभ नहीं देता।
ग. जब तक आप चिह्न और अद्भुत चीजें नहीं देखते, आप विश्वास नहीं करेंगेःयह एक आमंत्रण है कि ’दर्शक विश्वास’ से आगे बढ़ें और मसीह के शब्द में गहरी, अंदरूनी विश्वास विकसित करें। येसु का बयान कठोर निंदा के रूप में नहीं, बल्कि मानव स्वभाव पर करुणामय दृष्टि के रूप में देखा जाता है।
घ. जा; तेरा पुत्र जीवित रहेगा। उस मनुष्य ने येसु के वचन पर विश्वास किया... और चला गयाःपिता ने येसु से अपने घर आने के लिए कहा, लेकिन येसु उसके घर नहीं गए, बल्कि केवल एक वचन बोले। इस प्रकार येसु ने उस व्यक्ति के विश्वास की कठोर परीक्षा ली, उसे केवल येसु के वचन पर विश्वास करने के लिए मजबूर किया, न कि किसी बाहरी चमत्कारी प्रदर्शन पर। परीक्षा के बावजूद, उस व्यक्ति ने येसु के वचन को स्वीकार किया और चला गया। कुलीन व्यक्ति ने दिखाया कि सच्चा विश्वास केवल येसु के वचन को मान लेना है।
इस अधिकारी ने शुरू में एक चमत्कार की उम्मीद की क्योंकि उसने सोचा कि येसु को शारीरिक रूप से उसके घर आना पड़ेगा। जब येसु ने बस उसे जाने का आदेश दिया क्योंकि उसका बेटा जिंदा रहेगा, तो उस आदमी ने येसु की बात पर यकीन कर लिया।केवल कल्पना की जा सकती है कि यह समाचार उस कुलीन व्यक्ति के लिए कितना आनंददायक रहा होगा। दासों ने उस शाही व्यक्ति के घर पहुँचने तक प्रतीक्षा नहीं की, बल्कि वे शुभ समाचार सुनाने के लिए उसकी ओर दौड़े। यदि ऐसा है, तो हमें उस सबसे बड़े शुभ समाचार की घोषणा करने के लिए कितना अधिक उत्साह दिखाना चाहिए कि येसु ने मृत्यु पर विजय पाई (रोमियों 6ः9) और जो उस पर विश्वास करते हैं वे सदैव जीवित रहेंगे (प्रेरित चरित 16ः31)?
ख. “कल दोपहर एक बजे बुखार ने उसे छोड़ दिया” (52)ःइसका अर्थ है कि कुलीन व्यक्ति ने काना में येसु से मिलने के बाद अपने घर कफरनहूम लौटने में समय लिया। उसकी धीमी गति विश्वास का प्रमाण थी। भय में वह व्यक्ति कफरनहूम से काना तक दौड़ा; विश्वास में वह काना से कफरनहूम तक चला।
ग. और उसने स्वयं विश्वास किया, और उसका सारा घराना भीःयेसु की चमत्कारी सामर्थ ने कुलीन व्यक्ति और उसके पूरे घराने में और अधिक गहरा विश्वास उत्पन्न किया। उसने पहले भी विश्वास किया था, लेकिन अब उसका विश्वास और बढ़ गया। ईश्वर की सामर्थ के व्यक्तिगत अनुभव से उसका विश्वास गहरा हुआ।
घ. यह दूसरा चिन्ह थाःयोहन के सुसमाचार में चिन्ह पाठक को विश्वास की ओर ले जाने के लिए दिए गए हैं (योहन 20ः29-31)। विश्वास और चिन्हों के बीच संबंध योहन अध्याय 2 और अध्याय 4 में स्पष्ट है।
पहला चिन्ह उसके शिष्यों को विश्वास के लिए प्रेरित करता है।
दूसरा चिन्ह एक यहूदी शाही व्यक्ति और उसके घराने को विश्वास के लिए प्रेरित करता है।
सामरियों ने बिना किसी चिन्ह के विश्वास किया।