हिन्दी बाइबिल व्याख्या

Hindi Bible Commentary

फादर शैलमोन आन्टनी

योहन 7

अ. येसु गुप्त रूप से येरूसालेम जाते हैं।

1. (1-2) गलील में, जब तंबुओं का पर्व निकट आता है।

क. वह यहूदिया में चलना नहीं चाहते थे, क्योंकि यहूदी उन्हें मार डालना चाहते थे:

येसु का गलील में ठहरना साहस की कमी के कारण नहीं था, बल्कि पिता के सिद्ध समय की समझ के कारण था - और अभी उनके पकड़े जाने तथा अन्यजातियों के हाथों सौंपे जाने का समय नहीं आया था।

ख. तंबुओं का पर्व:

यह सितंबर या अक्टूबर में मनाया जाने वाला एक आनंदमय, सप्ताहभर का उत्सव था, जब परिवार अस्थायी झोंपड़ियों में रहते थे, ताकि मिस्र से कनान तक मूसा के नेतृत्व में जंगल के मार्ग में इस्राएल के प्रति ईश्वर की विश्वासयोग्यता को स्मरण कर सकें।

“इब्रानियों ने इसे झोंपड़ियों का पर्व (सुक्कोत) कहा, क्योंकि पूरे सप्ताह लोग डालियों और पत्तों से बनी अस्थायी झोंपड़ियों में रहते थे (लेवि ग्रन्थ 23:40-43 देखें); नगरों में रहने वाले लोग इन्हें अपने आँगनों या समतल छतों पर बनाते थे।” (ब्रूस)

2. (3-5) येसु के भाइयों का अविश्वास और उनका विरोध।

क. इसलिए उसके भाइयों ने उससे कहा:

बाइबल में येसु के जिन “भाइयों“ का उल्लेख है (जैसे, योहन 7:3), वे जैविक भाई-बहन नहीं, बल्कि निकट संबंधी, जैसे चचेरे भाई या सौतेले भाई थे। कैथोलिक धर्मशास्त्र मरियम के आजीवन कुँवारी रहने की शिक्षा को बनाए रखता है और “भाई“ (अडेलफो) शब्द की व्याख्या इब्रानी और अरामी भाषा में प्रचलित व्यापक अर्थ में करता है।

ख. यहूदिया में जाइए, ताकि आपके वहॉ के चेले भी आपके महान कामों को देख सकें:

येसु के भाइयों ने उनसे कहा कि वे बड़े मंच, अर्थात् यहूदी धर्म के केंद्र येरूसालेम में स्वयं को मसीह सिद्ध करें। येरूसालेम के लोग अक्सर गलील के यहूदियों को तुच्छ समझते थे। क्योंकि येसु ने अपने अधिकांश आश्चर्यकर्म वहीं किए थे, इससे येरूसालेम के धार्मिक अगुओं को यह कहने का एक और कारण मिला कि येसु मसीह नहीं हो सकते, क्योंकि उन्होंने अपना अधिकांश कार्य सही श्रोताओं के सामने नहीं किया।

“यह व्यापक विश्वास था कि जब मसीह आएगा, तो वह किसी अद्भुत तरीके से सार्वजनिक रूप से अपने आपको प्रकट करेगा।” (ब्रूस) इसे कहने का मतलब यह है कि: आप इस तरह छिपकर प्रसिद्ध नहीं हो सकते! यदि आप इतने महान हो, तो संसार को सिद्ध करके दिखाइेए!

“उन्होंने समझा कि उसकी महिमा केवल उसके चमत्कारी सामर्थ्य के प्रदर्शन तक सीमित है, जबकि वास्तव में वह अपनी सर्वोच्च महिमा केवल अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने के द्वारा ही प्रकट कर सकता था।” (टास्कर)

ग. क्योंकि उसके भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे:

यहाँ तक कि उसके अपने चचेरे भाइयों ने, जिन्हें उसके चमत्कार देखने का महान अवसर मिला, संभवत: चमत्कारों पर तो विश्वास किया, परन्तु संसार के उद्धारकर्ता के रूप में उस पर विश्वास नहीं किया।

यह उल्लेखनीय है कि येसु के भाई उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान से पहले कभी भी उसकी सेवकाई का समर्थन करते हुए दिखाई नहीं देते (मरकुस 3:21 भी देखें)। उसके पुनरुत्थान के बाद येसु के भाई चेलों में गिने गए (प्रेरित चरित 1:14)।

“उसके भाई सोचते थे कि उसकी सफलता संसार के उसके प्रति दृष्टिकोण पर निर्भर है; दूसरे शब्दों में, वे उस पर नहीं, बल्कि संसार पर विश्वास करते थे।” (ट्रेंच)

संत पौलुस कहते हैं, “क्या मैं इंसानों की मंज़ूरी चाहता हूँ या ईश्वर की? या क्या मैं लोगों को खुश करने की कोशिश कर रहा हूँ? अगर मैं अब भी लोगों को खुश कर रहा होता, तो मैं मसीह का सेवक नहीं होता।“ (गलातियों 1:10) क्या आप ईश्वर को खुश करना चाहते हैं या दुनिया को?

3. (6-9) येसु का उत्तर: हम भिन्न संसारों के हैं।

क. मेरा समय अभी नहीं आया, पर तुम्हारा समय सदा तैयार है (6):

क्योंकि येसु पूरी तरह पिता की इच्छा के अधीन थे, इसलिए परमपिता का समय उनके लिए महत्वपूर्ण था। येसु के भाई उसी प्रकार ईश्वर की इच्छा के अधीन नहीं थे, इसलिए उनके लिए कोई भी समय ठीक था।

जीवन के सभी कार्य ईश्वर के समय के अनुसार करें, क्योंकि वही हमारे लिए सर्वोत्तम है।

ख. संसार तुमसे बैर नहीं कर सकता, पर मुझसे बैर करता है क्योंकि मैं उसके विषय में गवाही देता हूँ कि उसके काम बुरे हैं (7):

येसु के भाई भले और बुरे के विषय में संसार की राय से सहमत थे - इसलिए संसार उनसे बैर नहीं कर सकता था। येसु ने अपने समय के पापों का साहसपूर्वक सामना किया, इसलिए वे बहुत घृणा के लक्ष्य बने।

संत पौलुस कहते हैं: “मेरे लिए दुनिया क्रूस पर चढ़ाई गई है और मैं दुनिया के लिए“ (गलातियों 6:14)। “इस दुनिया के अनुसार न चलें“ (रोमियों 12:2)। इसलिए आइए, हम येसु की तरह पिता की इच्छा के अनुसार चलें।

ग. तुम लोग पर्व पर जाओ। मैं अभी इस पर्व पर नहीं जाता, क्योंकि मेरा समय अभी पूरा नहीं हुआ है (8):

येसु अपने अविश्वासी भाइयों से कहते हैं कि वे उनके बिना तंबुओं के पर्व पर जाएँ, क्योंकि उनका समय अभी पूरा नहीं हुआ है। वे झूठ नहीं बोल रहे थे, बल्कि उनके “सांसारिक“ समय के अनुसार कार्य करने से इनकार कर रहे थे और इसके बजाय बाद में ईश्वर की इच्छा के अनुसार गुप्त रूप से जाने का निर्णय कर रहे थे, ताकि ईश्वर द्वारा नियुक्त समय से पहले उनकी हत्या न हो।

योहन 7:10 में हम पढ़ते हैं- “वह भी पर्व पर गया, परन्तु प्रकट रूप से नहीं, बल्कि मानो गुप्त रूप से।” इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि जब येसु ने कहा, “मैं अभी पर्व पर नहीं जाता,” तो उनका अर्थ था कि वे सार्वजनिक रूप से नहीं जा रहे, जैसा कि उनके भाई चाहते थे ताकि लोगों का ध्यान आकर्षित हो।

4. (10-13) येसु येरूसालेम जाते हैं, जहाँ बहुत से लोग गुप्त रूप से उनके विषय में चर्चा करते हैं।

क. जब उसके भाई ऊपर चले गए, तब वह भी पर्व पर गया, परन्तु प्रकट रूप से नहीं, बल्कि मानो गुप्त रूप से:

येसु अपने भाइयों के साथ गलील से येरूसालेम जाने वाले बड़े यात्रियों के समूह (कारवाँ) के साथ, या सम्भवत: सामान्य मार्ग से नहीं गए। वे उनके बाद अकेले गए - लगभग (मानो) गुप्त रूप से। “अर्थात्, वह गया, परन्तु अपने भाइयों के उकसाने पर नहीं, और न ही उस प्रचार के साथ जिसकी उन्होंने सिफारिश की थी।” (डॉड्स)। येसु ने ईश्वर द्वारा नियुक्त समय का अनुसरण किया।

ख. यहूदी पर्व में उसे ढूँढ़ रहे थे और कह रहे थे, “वह कहाँ है?” (11):

यहाँ “यहूदी” से तात्पर्य धार्मिक अगुओं से है। वे शत्रुतापूर्ण इरादे से येसु को ढूँढ़ रहे थे। क्या आप येसु को बुरी नीयत से खोज रहे हैं या अच्छी नीयत से? क्या आप येसु को सांसारिक उद्देश्यों से खोज रहे हैं या आत्मिक उद्देश्यों से?

ग. कुछ कहते थे, “वह अच्छा है”; और दूसरे कहते थे, “नहीं, वह लोगों को बहकाता है” (12):

येसु के विषय में तब भी दो अलग-अलग मत थे और आज भी हैं। आपके लिए येसु कौन हैं? येसु हममें से प्रत्येक से पूछते हैं- “तुम मेरे बारे में क्या कहते हो?” (मत्ती 16:15)। यह याद रखना- आपके लिए येसु कौन हैं, यही आपके जीवन को बदल देता है।

घ. तौभी यहूदियों (धार्मिक अगुओं) के डर से कोई भी उसके विषय में खुलकर नहीं बोलता था (13):

धार्मिक अगुओं की इच्छा नहीं थी कि लोग येसु के विषय में कोई चर्चा करें। येसु के पुनरुत्थान के बाद भी धार्मिक अगुओं ने चेलों को येसु के नाम में शिक्षा देने से रोका (प्रेरित चरित 4:18; 5:28)। परन्तु पवित्र आत्मा से भरे प्रेरितों ने यह कहते हुए उनकी बात नहीं मानी, “मनुष्यों की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा मानना आवश्यक है” (प्रेरित चरित 4:19; 5:29)। आज भी संसार से विरोध और धमकियाँ मिलती हैं। क्या आप संसार में येसु की घोषणा करने से डरते हैं?

आ. येसु आपत्तियों का उत्तर देते हैं और शिक्षा देते हैं।

1. (14-18) धार्मिक अगुओं की आपत्ति कि येसु शिक्षित नहीं हैं।

क. येसु मन्दिर में गए और शिक्षा देने लगे:

यद्यपि येसु ने भव्य प्रवेश से बचा, परन्तु जब वे पिता के समय के अनुसार येरूसालेम पहुँचे, तो उन्होंने साहसपूर्वक शिक्षा दी। वे सत्य की घोषणा करने से कभी पीछे नहीं हटे।

शिक्षा देना येसु की सेवकाई का मुख्य कार्य था- “वह प्रतिदिन मन्दिर में शिक्षा देता था” (लूकस 21:37), और अंतिम आज्ञा में भी येसु ने हमें वही सब सिखाने को कहा जो उन्होंने सिखाया था (मत्ती 28:20)। यह कहना अधिक उचित है कि येसु एक शिक्षक थे और चंगाई देने वाले भी, बजाय इसके कि वे केवल चंगाई देने वाले थे और साथ ही शिक्षक भी।

क्या आपको येसु की शिक्षाओं पर शर्म आती है? क्या आपको येसु की शिक्षाओं को सिखाने में डर या शर्म आती है? आईए कम से कम रविवार की धार्मिक शिक्षाओं में तो हम बच्चों को इन्हें सिखाएँ।

ख. यहूदी आश्चर्य करते हुए कहने लगे, “यह मनुष्य बिना शिक्षा पाए इतना ज्ञान कैसे रखता है?” (15ं):

यहूदी अगुओं को पता था कि येसु ने किसी प्रसिद्ध रब्बी के अधीन शास्त्रों की औपचारिक शिक्षा नहीं पाई थी (जैसे पौलुस ने गमलीएल के अधीन शिक्षा पाई थी, प्रेरित चरित 22:3)। क्योंकि वे किसी झूठे सिद्धांत या धर्मग्रन्थ की गलत समझ के आधार पर येसु को दोषी नहीं ठहरा सके, इसलिए उन्होंने येसु की योग्यता पर आक्रमण करना शुरू किया।

ग. मेरी शिक्षा मेरी नहीं, बल्कि उसकी है जिसने मुझे भेजा है (16):

येसु ने अपनी योग्यता की ओर नहीं, बल्कि अपनी शिक्षा की ओर संकेत किया। मानो वे कह रहे हों, “मेरे पास किसी धर्मशास्त्र महाविद्यालय की उपाधि नहीं है, परन्तु मेरी शिक्षा के आधार पर मेरा न्याय करो।”

“वे ईश्वर से शिक्षा पाएँगे” (योहन 6:45), यह प्रतिज्ञा इस बात पर बल देती है कि ईश्वर स्वयं उन लोगों को शिक्षा देता है जो उसकी सुनते और उससे सीखते हैं। संत पौलुस कहते हैं कि येसु ने उन्हें प्रकाशना के द्वारा शिक्षा दी (गलातियों 1:12; एफेसियों 3:3-5)। संत पौलुस में येसु को जानने की महान लालसा थी (1 कुरिन्थियों 2:2); और उन्होंने येसु मसीह को जानने के सर्वोच्च मूल्य को समझा (फिलिप्पियों 3:8)।

घ. जो कोई ईश्वर की इच्छा पूरी करने का संकल्प करता है, वह जान जाएगा कि यह शिक्षा ईश्वर की ओर से है या मैं अपनी ओर से बोल रहा हूँ (17):

यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि ईश्वर की इच्छा का पालन करने की आंतरिक इच्छा, येसु की शिक्षा की सत्यता को पहचानने के लिए एक आवश्यक शर्त है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह ईश्वर की ओर से है, न कि स्वयं येसु की ओर से। यह पद इस बात पर बल देता है कि आज्ञाकारिता की इच्छा आध्यात्मिक समझ की ओर ले जाती है।

ड. जो अपनी ओर से बोलता है, वह अपनी ही महिमा चाहता है; परन्तु जो उस की महिमा चाहता है जिसने उसे भेजा है, वही सच्चा है, और उसमें कुछ भी कपट नहीं है (18):

येसु पिता से कहते हैं, “मैंने वह काम पूरा करके जो तूने मुझे करने के लिए दिया था, पृथ्वी पर तेरी महिमा की” (योहन 17:4)। संत पौलुस भी सदा ईश्वर की महिमा चाहते थे (फिलिप्पियों 1:20)। संत पौलुस ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने अपनी महिमा या मनुष्यों की प्रशंसा नहीं चाही, बल्कि अपनी सेवकाई के द्वारा ईश्वर का आदर करना चाहा। उनका ध्यान दूसरों की सेवा करने पर था, न कि अपनी सत्ता स्थापित करने या पहचान प्राप्त करने पर, जैसा कि 1 थेसलनीकियों 2:6 में वे कहते हैं, “और न तो हमने मनुष्यों से महिमा चाही, न तुम से और न दूसरों से।” इसलिए उन्होंने मसीहियों से कहा- “इसलिए चाहे तुम खाओ, चाहे पियो, या जो कुछ भी करो, सब कुछ ईश्वर की महिमा के लिए करो” (1 कुरिन्थियों 11:31); “अपने शरीर में ईश्वर की महिमा करो” (1 कुरिन्थियों 6:20)।

2. (19-24) लोग आपत्ति करते हैं कि येसु पागल है और उसमें दुष्टात्मा है।

क. क्या मूसा ने तुम्हें व्यवस्था नहीं दी? फिर भी तुम में से कोई भी व्यवस्था का पालन नहीं करता। तुम मुझे मारने का अवसर क्यों ढूँढ़ रहे हो? (19):

येसु ने अभी कहा था कि वह पूर्णत: निष्पाप और सच्चे हैं, और सदा ईश्वर की महिमा चाहते हैं (योहन 7:18)। येसु के विपरीत, येसु धार्मिक अगुवों के पाखंड को उजागर करते हैं, जो मूसा की व्यवस्था होने पर घमण्ड करते थे, परन्तु उसी व्यवस्था का उल्लंघन उन्हें मारने की योजना बनाकर करते थे। वह उनके खोखले विधिवाद का सामना करते हुए बताते हैं कि उनकी हत्या की योजना उसी व्यवस्था के विरोध में है जिसकी रक्षा करने का वे दावा करते हैं।

ख. भीड़ ने उत्तर दिया, “तुझ में दुष्टात्मा है! तुझे मारने की कोशिश कौन कर रहा है?” (20):

लोगों को यह पता नहीं था कि शासक येसु को इसलिए मारना चाहते थे क्योंकि उन्होंने विश्राम के दिन एक व्यक्ति को चंगा किया था (योहन 5:16)। उन्हें लगा कि येसु पागल हैं और शायद भ्रमग्रस्त भी।

हमें जल्दबाजी में कोई टिप्पणी करने से बचना चाहिए। हमें तभी बोलना चाहिए जब हमें मामले की जानकारी हो। साथ ही, हमारी टिप्पणियाँ नुकसान पहुँचाने वाली नहीं, बल्कि उपयोगी होनी चाहिए।

ग. येसु ने उन्हें उत्तर दिया, “मैंने एक काम किया, और तुम सब चकित हो” (21):

सु धार्मिक अगुवों का सामना करते हैं क्योंकि वे विश्राम के दिन लकवे के मारे हुए व्यक्ति को चंगा करने (योहन 5) पर प्रश्न उठा रहे थे। वह तर्क देते हैं कि वे असंगत रूप से पूरे मनुष्य को बचाने की अपेक्षा खतना जैसे धार्मिक अनुष्ठानों को प्राथमिकता देते हैं। यह विधिवाद के विरुद्ध और दया पर केन्द्रित एक फटकार है। आइए, परंपराओं को ईश्वर के वचन से ऊपर न रखें।

घ. यदि कोई मनुष्य विश्राम के दिन खतना प्राप्त करता है ताकि मूसा की व्यवस्था न टूटे, तो क्या तुम मुझ पर इसलिए क्रोधित हो कि मैंने विश्राम के दिन एक मनुष्य के पूरे शरीर को चंगा कर दिया?

येसु छोटे से बड़े की ओर तर्क करते हैं। यदि यहूदी व्यवस्था (लेवि ग्रन्थ 12:3) विश्राम के दिन व्यवस्था का पालन करने के लिए “आंशिक” चंगाई (शरीर के एक भाग का खतना) की अनुमति देती है, तो निश्चित ही “पूर्ण” चंगाई (एक मनुष्य को पूरी तरह स्वस्थ करना) की अनुमति भी उचित है (योहन 5:8-9)। धार्मिक अगुवे पाखंडी थे, क्योंकि वे एक धार्मिक रीति (खतना) को बनाए रखते थे, परन्तु करुणा से की गई पुनर्स्थापना के कार्य का विरोध करते थे।

“यदि तुम विश्राम के दिन किसी मनुष्य को घायल (खतना) कर सकते हो, तो क्या मैं किसी को चंगा नहीं कर सकता?” (ट्रैप)

ड. बाहरी रूप देखकर न्याय मत करो, परन्तु धर्मी न्याय करो:

उन्होंने यह ठहरा लिया कि येसु पापी प्रतीत होते हैं, और वे स्वयं धर्मी दिखाई देते हैं। वे दोनों ही बातों में गलत थे, और उन्हें केवल बाहरी रूप देखकर नहीं, बल्कि धर्मी न्याय करना चाहिए था।

3. (25-29) येरूसालेम के लोग आपत्ति करते हैं कि येसु मसीह नहीं हो सकते क्योंकि वे जानते हैं कि वह कहाँ से आए हैं।

क. येरूसालेम के कुछ लोग कह रहे थे, “क्या यह वही नहीं है जिसे वे मारना चाहते हैं?” (25):

येरूसालेम के लोगों को पता था कि धार्मिक अगुवे येसु को मारना चाहते थे। पर्व के लिए आई हुई भीड़ यह नहीं जानती थी (योहन 7:20), परन्तु येरूसालेम के लोग जानते थे।

ख. वह खुलकर बोल रहा है, और वे उससे कुछ नहीं कहते! क्या यह हो सकता है कि अधिकारी वास्तव में जान गए हों कि यही मसीह है? (26):

येसु कभी भी अपने विरुद्ध दी गई धमकियों से न डरे और न ही भयभीत हुए। वह अब भी साहसपूर्वक बोलते रहे, और इतने साहस के साथ कि कोई उन्हें रोक नहीं सका। येरूसालेम के लोग आश्चर्यचकित थे कि शासक येसु को शिक्षा देने से न रोक पाए और न रोक सके।

योहन 7:25-27 में, येरूसालेम के निवासी उलझन और संदेह व्यक्त करते हैं क्योंकि येसु मन्दिर में खुलेआम शिक्षा दे रहे हैं और अधिकारी उन्हें नहीं रोक रहे, जबकि पहले वे उन्हें मारना चाहते थे। यह टिप्पणी बताती है कि इससे येसु की पहचान को लेकर लोगों में बढ़ती हुई और उलझन भरी सार्वजनिक चर्चा दिखाई देती है, जो उनके साहसी प्रचार और अगुवों की रहस्यमय चुप्पी के बीच के विरोधाभास से उत्पन्न हुई।

ग. हम जानते हैं कि यह व्यक्ति कहाँ से है; परन्तु जब मसीह आएगा, तो कोई नहीं जानेगा कि वह कहाँ से है:

उस समय के बहुत से (हालाँकि सभी नहीं) यहूदियों का विश्वास था कि मसीह अचानक प्रकट होगा, मानो कहीं से भी आ गया हो। क्योंकि मलाकी 3:1 कहता है कि ईश्वर का दूत अचानक मन्दिर में आएगा।

हम जानते हैं कि यह व्यक्ति कहाँ से है: उन्हें येसु के बारे में केवल सतही जानकारी थी। सम्भवत: वे येसु को नाज़रेत (नाज़री येसु) या गलील से जोड़ते थे।

घ. तुम मुझे भी जानते हो, और यह भी जानते हो कि मैं कहाँ से हूँ:

येसु के उत्तर का यह पहला वाक्य व्यंग्यात्मक है। वे सोचते थे कि वे उन्हें जानते हैं, परन्तु वे उनके स्वर्गीय मूल से अनजान थे।

ड. “मैं अपनी ओर से नहीं आया हूँ” (दैवीय अधिकार):

येसु स्पष्ट करते हैं कि वे अपनी ओर से कार्य नहीं कर रहे (स्वयं नियुक्त नहीं हैं), अपनी महिमा नहीं चाहते, और अपने विचार नहीं बोलते। योहन के सुसमाचार में बार-बार येसु को पिता द्वारा भेजे गए के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

च. “जिसने मुझे भेजा है वह सच्चा है” (ईश्वर की विश्वसनीयता):

यूनानी शब्द “सच्चा” का अर्थ प्राय: “वास्तविक” या “प्रामाणिक” होता है। येसु कह रहे हैं कि जिस ईश्वर की वे सेवा करते हैं, वही वास्तविक और सच्चा सृष्टिकर्ता है, न कि वह विकृत छवि जिसे धार्मिक अगुवों ने बना रखा था। यद्यपि फरीसी दावा करते थे कि वे ईश्वर को जानते और उसकी सेवा करते हैं, येसु बताते हैं कि उनका उन्हें अस्वीकार करना यह सिद्ध करता है कि वे सच्चे ईश्वर को नहीं जानते।

परमपिता ईश्वर सत्य हैं (योहन 7:28), येसु सत्य हैं (योहन 14:6), पवित्र आत्मा सत्य हैं (योहन 14:17, 15:26, 16:13)। अत: त्रित्व ही सत्य है।

छ. “तुम उसे नहीं जानते, मैं उसे जानता हूँ” (आध्यात्मिक अन्धापन बनाम प्रकाशन):

भीड़ येसु की मानवीय, सांसारिक उत्पत्ति (नाज़रेत/गलील) को जानती थी, परन्तु उनकी स्वर्गीय और अनन्त उत्पत्ति से अनजान थी। पिता के विषय में येसु का ज्ञान केवल बौद्धिक या परोक्ष नहीं है; वह व्यक्तिगत है और अनन्तकाल से है। इसलिए, येसु को जाने बिना ईश्वर को जानना असम्भव है: “जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है” (योहन 14:9)।

“क्योंकि मैं उसी की ओर से हूँ, और उसी ने मुझे भेजा है”: “मैं उसी की ओर से हूँ” येसु की दिव्यता, पूर्व-अस्तित्व और पिता के साथ उनकी एक ही सत्ता (एकत्व) की ओर संकेत करता है। “उसी ने मुझे भेजा है” अवतार की ओर संकेत करता है- ईश्वर का पुत्र मानव बनकर मानवजाति के उद्धार का कार्य पूरा करने आया। शब्द देह बना (योहन 1:14)।

4. (30-36) अधिकारी येसु को पकड़ने का प्रयास करते हैं जबकि बहुत से लोग उन पर विश्वास करते हैं।

क. किसी ने उन पर हाथ नहीं डाला, क्योंकि उनका समय अभी नहीं आया था:

जब तक उचित समय नहीं आया, कोई भी येसु पर हाथ नहीं डाल सका। एक समय ऐसा आएगा जब येसु कहेंगे कि उनका समय आ गया है (योहन 12:23)। उस समय तक येसु सुरक्षित थे। अगले भाग में हम पढ़ते हैं कि येसु को पकड़ने आए मन्दिर के प्रहरी भी उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सके (योहन 7:45)।

ख. बहुत से लोगों ने उन पर विश्वास किया:

जब येसु लोगों से बोल रहे थे, तो वे उन पर विश्वास करने के लिए आकर्षित हुए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि बहुत से लोग उनका विरोध करते थे या उन्हें मारना भी चाहते थे। येसु ने सार्वजनिक रूप से वही प्रकट किया जिस पर वे विश्वास करते थे, और लोग उनके किए हुए अनेक चिन्हों पर चकित हुए।

ग. वे कह रहे थे, “जब मसीह आएगा, तो क्या वह इस व्यक्ति से अधिक चिन्ह दिखाएगा?” (31):

उन्होंने यह प्रश्न स्पष्ट तर्क के साथ पूछा। वास्तव में येसु ने यह सिद्ध करने के लिए कि वे मसीह हैं, महान चिन्ह किए।

येसु ही मसीह है, इसलिए उनसे बढ़कर कोई है नहीं। क्या किसी ने येसु से बढ़कर कुछ किया है? क्या किसी ने दु:ख सहा, पापों का प्रायश्चित किया, क्रूस पर मरा और फिर मृतकों में से जी उठा? कोई भी कभी भी येसु द्वारा किए गए कार्यों से बढ़कर नहीं कर सकता।

घ. फरीसियों ने भीड़ को उसके विषय में ऐसी बातें बड़बड़ाते हुए सुना, और महायाजकों तथा फरीसियों ने मन्दिर के पहरेदारों को उसे गिरफ्तार करने के लिए भेजा (32):

फरीसी व्यवस्था का कठोरता से पालन करने वाले और रोम-विरोधी थे, जबकि महायाजक मुख्यत: सदूकी थे, जो मन्दिर को नियंत्रित करते थे और सामान्यत: रोमी अधिकारियों के साथ सहयोग करते थे। उनका साथ मिलकर कार्य करना यह दर्शाता है कि वे येसु को स्थापित धार्मिक व्यवस्था और अपने अधिकार के लिए एक खतरा मानते थे। वे लोगों की इस लोकप्रिय “फुसफुसाहट” के कारण कि शायद वही मसीह है, उसे गिरफ्तार करने के लिए मन्दिर के पहरेदार भेजते हैं।

ड. मैं थोड़ी देर और तुम्हारे साथ रहूँगा, और फिर उसके पास जाऊँगा जिसने मुझे भेजा है (33):

अधिकारियों के लिए यह कथन उसके विजयी आत्मविश्वास का प्रदर्शन है कि उनकी दुष्टता निष्प्रभावी है और उनके हाथ लकवाग्रस्त हैं; कि जब वह चाहेगा तब वह जाएगा, उन्हें या किसी मनुष्य द्वारा घसीटा नहीं जाएगा।” (माकंलारेन)। यहाँ येसु अपने पिता के पास होने वाले अपने आसन्न स्वर्गारोहण के बारे में भी बोलते हैं। वास्तव में, परिस्थिति पूरी तरह येसु के नियंत्रण में थी।

हमें भी अपने जीवन को इसी नज़रिए से देखना चाहिए। हम यहाँ कुछ समय के लिए आए हैं। इसलिए हमें पवित्र जीवन जीना चाहिए और उस पवित्र ईश्वर के पास वापस जाना चाहिए जिसने हमें इस दुनिया में भेजा है। यह सच है कि इस दुनिया में कोई भी हमेशा के लिए अपना डेरा नहीं जमा सकता।

च. तुम मुझे ढूँढ़ोगे और नहीं पाओगे:

येसु इंसानी रूप में ईश्वर हैं। येसु के समय के लोगों को उनके साथ रहने का सबसे बड़ा सौभाग्य मिला था। लेकिन अपने कठोर दिल के कारण वे लगातार येसु को नकारते रहे। इसलिए येसु ने कहा कि तुम मुझे ढूंढोगे लेकिन मैं तुम्हें नहीं मिलूंगा। इसका मतलब है कि येसु के पास आने में बहुत देर हो जाएगी। यह उन मूर्ख कुंवारियों जैसा होगा जो बहुत देर से आईं और येसु का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन उनके लिए अनंत जीवन का दरवाज़ा नहीं खोला गया (मत्ती 25:1-13)।

छ. तुम मुझे खोजोगे, पर मुझे नहीं पाओगे; और जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते (34 तथा योहन 8:21 और 13:33 में पुन: कहा गया):

“क्योंकि वह कहता है, ’अपनी कृपा के समय मैंने तुम्हारी सुनी, और उद्धार के दिन मैंने तुम्हारी सहायता की।’ मैं तुमसे कहता हूँ, अभी ईश्वर की कृपा का समय है, अभी उद्धार का दिन है।“ (2 कुरिन्थियों 6:2)। आइए, अपने उद्धार के लिए भविष्य का इंतज़ार न करें, बल्कि अभी से शुरुआत करें; क्योंकि हम नहीं जानते कि कल हमारे लिए क्या लेकर आएगा (याकूब 4:14; सूक्ति ग्रन्थ 27:1)।

ज. “तुम मुझे खोजोगे, पर मुझे नहीं पाओगे; और जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते“ यह कथन येसु ने योहन 7:34 (और पुन: योहन 8:21 में) कहा:

यह उन धार्मिक अगुवों और भीड़ के लिए एक कठोर भविष्यवाणी-सदृश चेतावनी है जिन्होंने उन्हें अस्वीकार किया, जो उद्धार के सीमित समय और लगातार अस्वीकार करने के गंभीर तथा अपरिवर्तनीय परिणामों को उजागर करती है (जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते)।

योहन 7:34 और 8:21 में येसु यहूदियों से कहते हैं कि वे अपने अविश्वास के कारण उनका अनुसरण नहीं कर सकते, लेकिन येसु चेलों से कहते हैं कि “जहाँ मैं जाता हूँ वहाँ तुम अब मेरे पीछे नहीं आ सकते; परन्तु बाद में मेरे पीछे आओगे” (योहन 13:36)।

5. (37-39) महान निमंत्रण: यदि किसी को प्यास हो, तो वह मेरे पास आए और पीए।

क. पर्व के अंतिम दिन, जो सबसे बड़ा दिन था:

“झोंपड़ियों का पर्व आठ दिनों तक चलता था। पहले सातों दिनों में शीलोह के कुंड से एक सोने के घड़े में पानी लाकर वेदी पर उंडेला जाता था, ताकि सबको स्मरण रहे कि निर्जन स्थान में ईश्वर ने प्यासे इस्राएल को चमत्कारिक रूप से पानी प्रदान किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि आठवें दिन पानी नहीं उंडेला जाता था- केवल पानी के लिए प्रार्थनाएँ होती थीं -ताकि उन्हें स्मरण रहे कि वे प्रतिज्ञात देश में आ चुके थे।” (डेविड गुज़िक)

यह अंतिम पर्व था जिसे येसु अपनी मृत्यु के पस्का से पहले येरूसालेम में बिताने वाले थे। यह अंतिम पर्व का अंतिम दिन था; और अंतिम बार था जब वे अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले उनमें से बहुतों से बात करेंगे।

ख. जब येसु वहाँ खड़े थे, तो उन्होंने ऊँचे स्वर से पुकारा:

जो बात येसु कहने वाले थे वह अत्यंत महत्वपूर्ण थी:

 क्योंकि उन्होंने यह कहाँ कहा (मंदिर के आँगन में, स्वयं मंदिर के ठीक बाहर खड़े होकर)।

 क्योंकि उन्होंने यह कब कहा (झोंपड़ियों के पर्व के अंतिम दिन, जब पिछले दिनों में पानी उंडेला जा चुका था)।

 क्योंकि उन्होंने यह कैसे कहा (ऊँचे स्वर से पुकारकर, यहाँ तक कि चिल्लाकर-जो इसायाह 42:2 के अनुसार उनकी सामान्य सेवकाई के स्वर से भिन्न था: “वह न चिल्लाएगा, न ऊँचे स्वर से बोलेगा, और न सड़क पर अपनी आवाज़ सुनाएगा।”)

ग. यदि किसी को प्यास हो, तो वह मेरे पास आए, और जो मुझ पर विश्वास करता है वह पीए (37इ-38ं):

झोंपड़ियों के पर्व का उत्सव इस बात पर बल देता था कि ईश्वर ने कनान की ओर जाते समय निर्जन स्थान में इस्राएल को पानी प्रदान किया। येसु ने साहसपूर्वक लोगों को अपने पास आने, पीने और अपनी सबसे गहरी प्यास-अपनी आत्मिक प्यास-को बुझाने के लिए बुलाया।

निमंत्रण व्यापक था क्योंकि उसमें कहा गया, “यदि कोई।” प्यास अपने आप में कोई वस्तु नहीं है; वह किसी चीज़ की कमी है। वह एक खालीपन है, एक गहरी पुकारती हुई आवश्यकता। येसु वही चट्टान हैं जिससे इस्राएलियों ने जंगल में पानी पिया (1 कुरिन्थियों 10:4)। आठवें दिन कोई पानी नहीं उंडेला गया। मंदिर और उस रीति में पानी नहीं था, और इससे येसु का दावा और भी प्रभावशाली बन गया। एक अर्थ में येसु कह रहे थे, “मैं वही जीवित जल हूँ जिसकी तुम्हारी आत्मा प्यास रखती है।”

“आओ, हे सब प्यासों, जल के पास आओ; और जिनके पास पैसा नहीं है, वे भी आओ, मोल लो और खाओ!... तुम अपना धन उस वस्तु पर क्यों खर्च करते हो जो रोटी नहीं है, और अपनी मेहनत उस पर जो तृप्त नहीं करती?” (इसायाह 55:1-20) तथा “उद्धार के सोतों से तुम आनंद के साथ जल भरोगे” (इसायाह 12:3)।

घ. जो मुझ पर विश्वास करता है:

येसु ने समझाया कि पीने के रूपक से उनका क्या अर्थ था। येसु के पास आना और पीना मूलत: उन पर विश्वास करना, उन पर भरोसा रखना, उन पर निर्भर रहना और समय तथा अनन्तकाल दोनों के लिए उनसे लगे रहना था।

ड. विश्वासी के हृदय (उदर) से जीवित जल की नदियाँ बह निकलेंगी:

जो उन पर विश्वास करता है, उसके लिए येसु ने उसके अंतरतम से जीवित जल की निरंतर बहने वाली नदी का वादा किया। झोंपड़ियों का पर्व उन भविष्यवाणियों की ओर भी संकेत करता था जिनमें सिंहासन और येरूसालेम से जल बहने की बात कही गई थी, जहाँ मसीह का राज्य स्थापित होगा। मूल रूप से येसु कह रहे थे, “अपना प्रेमपूर्ण विश्वास मुझ पर रखो, मुझे अपने हृदय के सिंहासन पर बैठाओ, और जीवन तथा बहुतायत तुममें से बह निकलेगी।”

“यूनानी में लिखा है, ‘उसके पेट में से’, अर्थात् ‘उसके अंतरतम अस्तित्व से’।” (डवततपे)

येसु ने केवल किसी व्यक्ति के भीतर आने वाली वस्तु की बात नहीं की, बल्कि उससे बाहर बहने वाली वस्तु की भी बात की। यह केवल प्राप्त किया हुआ आशीष नहीं था, बल्कि दूसरों के लिए भी आशीष का स्रोत बनना था।

जैसा कि धर्मग्रन्थ ने कहा है: “यद्यपि धर्मग्रन्थ का कोई विशिष्ट पद उद्धृत नहीं किया गया, फिर भी यह वास्तव में जकर्याह जैसी भविष्यवाणियों की पूर्ति थी कि एक दिन दाऊद के घराने के लिए एक सोता खोला जाएगा, और जीवित जल येरूसालेम से निकलेगा (जकर्याह 13:1, 14:8); तथा इसायाह की भविष्यवाणी कि ईश्वर प्यासों पर जल उंडेलेगा (इसायाह 44:3, 55:1)।” (टास्कर)

च. यह उन्होंने आत्मा के विषय में कहा, जिसे उन पर विश्वास करने वाले प्राप्त करेंगे:

येसु पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे (लूकस 4:1,14), और सामर्थ्य येसु में से प्रवाहित हो रही थी (लूकस 6:19)। यही बात पेंतेकोस्त के बाद प्रेरितों और चेलों के जीवन में भी हुई।

छ. क्योंकि पवित्र आत्मा अभी तक नहीं दिया गया था:

यह बहता हुआ जीवन और बहुतायत अभी नहीं आ सकती थी, क्योंकि येसु अभी तक महिमान्वित नहीं हुए थे- अर्थात् क्रूस और पुनरुत्थान के द्वारा महिमान्वित नहीं हुए थे। निश्चय ही येसु से पहले भी ऐसे स्त्री-पुरुष (नबी, सिमोन आदि) थे जिनमें पवित्र आत्मा था; फिर भी पवित्र आत्मा का महान उंडेला जाना केवल येसु मसीह के पुनरुत्थान के बाद हुआ। येसु के पुनरुत्थान के बाद पवित्र आत्मा बिना माप के दिया जाता है (योहन 3:34), और पवित्र आत्मा येसु मसीह के द्वारा बहुतायत से उंडेला जाता है (तीतुस 3:6)।

इ. भीड़ प्रश्न करती है, धार्मिक अगुवे अस्वीकार करते हैं।

1. (40-43) येसु भीड़ के बीच विभाजन उत्पन्न करते हैं।

क. कुछ लोगों ने कहा यह वही नबी है... दूसरों ने कहा यह मसीह है (40-41):

उस समय येसु ने अभी तक अपने मसीही कार्यों को पूरा नहीं किया था। इसलिए सब लोग उन्हें मसीह के रूप में स्वीकार नहीं कर सके। परन्तु हम जानते हैं कि येसु ने अपना मसीही कार्य पूरा कर दिया है, इसलिए हमारे पास कोई बहाना नहीं है।

ख. क्या मसीह गलील से आएगा? (41-42):

कुछ लोगों ने अज्ञानता के कारण येसु को अस्वीकार किया, क्योंकि वे उनके विषय में सच्चाई नहीं जानते थे। वे नहीं जानते थे कि येसु वास्तव में बैतलहम में जन्मे थे, जबकि वे इस भविष्यवाणी को जानते थे कि मसीह का जन्म बैतलहम में होगा।

ग. इसलिए उसके कारण लोगों में फूट पड़ गई (43):

यह विभाजन इसलिए नहीं हुआ कि येसु ने मूर्खतापूर्ण बातें कहीं, या किसी विवादास्पद धर्मशास्त्रीय विषय पर बात की। उन्होंने अपने विषय में, अर्थात् मसीह के विषय में, स्पष्ट रूप से बात की; रहस्यमय ढंग से नहीं।

येसु ने यही विचार मत्ती 10:34-36 में दोहराया: “यह मत समझो कि मैं पृथ्वी पर मेल कराने आया हूँ। मैं मेल कराने नहीं, पर तलवार चलाने आया हूँ। क्योंकि मैं आया हूँ कि ‘मनुष्य को उसके पिता के विरुद्ध, बेटी को उसकी माता के विरुद्ध, और बहू को उसकी सास के विरुद्ध कर दूँ’; और ‘मनुष्य के बैरी उसके अपने ही घराने के लोग होंगे।’” यह येसु के आने का मकसद नहीं था, बल्कि उन पर विश्वास करने का नतीजा यह था कि विश्वास करने वाले को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

येसु के अनुयायियों के बीच विभाजन नहीं होना चाहिए। संत पौलुस ने कुरिन्थ की कलीसिया में विभाजनों के विरुद्ध बहुत कठोरता से कहा (1 कुरिन्थियों 1:10-13, 3:3-9)।

2. (44-49) येसु को पकड़ने का प्रयास विफल हो जाता है।

क. उनमें से कुछ उसे पकड़ना चाहते थे, परन्तु किसी ने उस पर हाथ नहीं डाला:

गिरफ्तारी असफल रही, परन्तु इसलिए नहीं कि अधिकारी अयोग्य थे। बल्कि इसलिए कि समय अभी नहीं आया था, और पिता की ठहराई हुई घड़ी आने तक येसु को कोई रोक नहीं सकता था।

ख. कभी किसी मनुष्य ने इस प्रकार बातें नहीं कीं! (47):

मंदिर के इन अधिकारियों ने बहुत से रब्बियों को शिक्षा देते सुना था, परन्तु उन्होंने कभी किसी को येसु के समान बोलते नहीं सुना। वे येसु के संदेश से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पकड़ने और चुप कराने का अपना कार्य ही भूल गया।

क्योंकि वे येसु के मुख से निकले कृपापूर्ण शब्दों से प्रभावित हो गए थे। (पुलिस ने कहा कि आज तक किसी ने भी इस तरह बात नहीं की है (योहन 7:46))।

येसु के वचन अनुग्रह से भरे थे (लूकस 4:22); येसु के वचन सामर्थी- येसु ने केवल एक शांत वाक्य से हिंसक भीड़ को उनके घर लौटा दिया (योहन 8:1-8)। येसु ने क्रूस पर से भी अनुग्रहपूर्ण वचन कहे (लूकस 23:34, 43)। ईश्वर का वचन कहता है कि “तुम्हारी बातें सुनने वालों पर अनुग्रह करें” (इफिसियों 4:29) और “तुम्हारी बातचीत सदा अनुग्रह सहित हो” (कलोसियों 4:6)।

यदि एक मेज़ का उपयोग मछली काटने के लिए किया जाए, तो उसमें मछली की गंध होगी, और यदि उसी का उपयोग चमेली की माला बनाने के लिए किया जाए, तो उसमें चमेली की सुगंध होगी। उसी प्रकार हमारी जीभ; यदि उसका उपयोग केवल ईश्वर के वचन और अच्छे शब्दों के लिए किया जाए, तो वह अनुग्रहपूर्ण होगी।

ग. क्या तुम भी उसके बहकावे में आ गए हो? क्या नेताओं या फरीसियों में से किसी ने उस पर विश्वास किया है? परन्तु यह भीड़ जो व्यवस्था को नहीं जानती, शापित है:

फ़रीसी भीड़ को कानून से अनजान और “शापित“ कहकर तिरस्कार कर देते हैं। वे उन अधिकारियों को लज्जित और भयभीत करना चाहते थे जिन्होंने येसु को नहीं पकड़ा था, यह कहकर कि बुद्धिमान और धार्मिक लोग येसु का अनुसरण नहीं करते-तुम्हें भी नहीं करना चाहिए। यह धार्मिक नेताओं के अभिजात वर्ग वाली सोच, आध्यात्मिक अहंकार और अंधेपन के रूप में देखती है।

आज भी साधारण, गरीब, अशिक्षित लोग विद्वान धार्मिक लोगों की अपेक्षा येसु पर अधिक विश्वास करते हैं।

3. (50-52) येसु के पक्ष में निकुदेमुस के छोटे से समर्थन पर प्रतिक्रिया।

क. क्या हमारी व्यवस्था किसी मनुष्य का न्याय तब तक करती है जब तक पहले उसकी बात न सुन ले और यह न जान ले कि वह क्या कर रहा है?:

निकुदेमुस ने धार्मिक अगुवों के साथ तर्क करने का प्रयास किया, और उन्हें येसु के विषय में जल्दबाज़ी में निर्णय लेने से सावधान किया।

हमें कभी भी तथाकथित “निम्न जाति” के लोगों की गवाही को कम नहीं आँकना चाहिए। किसी गवाही को व्यक्ति की सामाजिक स्थिति देखकर नहीं, बल्कि उसके संदेश की सच्चाई देखकर परखा जाना चाहिए।

ख. क्या तुम भी गलील के हो?:

ग. खोजकर देखो, क्योंकि गलील से कोई नबी नहीं उठा:

वे गलत थे। वास्तव में एक नबी गलील से उठा था। योना (जो येसु मसीह का एक प्रतीक था) गत-हेपेर से था, जो नाज़रेत से तीन मील उत्तर, निचले गलील में स्थित था (2 राजा 14:25), और महान नबीयों में से एलियाह तिश्बी (तिश्बे गिलाद क्षेत्र में स्थित था, जो इस्राएल के उत्तरी राज्य में था); और सम्भवत: नहूम तथा होशे भी गलील से थे। इसलिए गलील के प्रति उनके तिरस्कार ने उन्हें ऐतिहासिक सत्य से अन्धा कर दिया।

मत्ती और लूकस के सुसमाचारों के अनुसार, येसु का जन्म येरूसालेम के दक्षिण में यहूदिया के बैतलहम में हुआ; परन्तु उनका पालन-पोषण उत्तरी इस्राएल के गलील में स्थित नाज़रेत में हुआ, इसलिए वे “नाज़रेत के येसु” कहलाए। सम्भवत: ये धार्मिक अगुवे येसु के जन्मस्थान से अनभिज्ञ थे।

जब हम किसी विषय या व्यक्ति के बारे में उचित अध्ययन किए बिना व्यापक टिप्पणी कर देते हैं, तब हम भी गलती करते हैं।

हमेशा बहुमत का अनुसरण करना निर्णय को सही नहीं बना देता। उदाहरण के लिए, येसु कहते हैं, “क्योंकि वह फाटक चौड़ा है और वह मार्ग आसान है जो विनाश की ओर ले जाता है, और बहुत से लोग उसी से जाते हैं” (मत्ती 7:13-14)।


Praise the Lord!