हिन्दी बाइबिल व्याख्या

Hindi Bible Commentary

फादर शैलमोन आन्टनी

योहन 17

अ. (1ं) परिचय।

कैथोलिक चर्च की शिक्षाओं (कैटेकिज़्म) में कहा गया हैः “ईसाई परंपरा सही मायने में इस प्रार्थना (योहन 17ः1-26) को येसु की ‘याजकीय’ (पुरोहिताई) प्रार्थना कहती है। यह हमारे महायाजक की प्रार्थना है, जो उनके बलिदान और पिता के पास उनके ‘गुज़रने’ (पास्का) से अलग नहीं की जा सकती; पिता, जिनके लिए वे पूरी तरह से ‘समर्पित’ हैं” (2747)।

1.येसु ने ये बातें कहीं, अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाईं, और कहाः

क. येसु ने ये बातें कहींः

बाइबल महान प्रार्थनाओं से भरी हुई है- सुलैमान (1 राजा 8), इब्राहीम (उत्पत्ति 18) और मूसा (निर्गमन 32) की प्रार्थनाएँ। लेकिन येसु की प्रार्थना सबसे महान है। यह सुसमाचारों में येसु की एकमात्र लंबी प्रार्थना है। वाक्य सरल हैं, लेकिन विचार गहरे, हृदयस्पर्शी और अर्थपूर्ण हैं।

“स्वर्ग या पृथ्वी पर कभी भी ऐसी कोई आवाज़ नहीं सुनी गई, जो स्वयं ईश्वर से पुत्र द्वारा की गई इस प्रार्थना से अधिक ऊँची, अधिक पवित्र, अधिक फलदायी और अधिक महान हो।”(मेलानकथोन)

”सच्ची प्रार्थना अक्सर व्यक्ति के अंतरतम स्वरूप को प्रकट करती है। योहन 17 हमें येसु के स्वभाव और हृदय को देखने का एक अनोखा अवसर देता है। इस प्रार्थना में येसु इस सुसमाचार में विकसित किए गए कई विषयों को छुएंगेः महिमा, महिमामंडित करना, भेजा जाना, विश्वास करना, संसार, प्रेम।” (ड़ेविड़ गुज़िक)

जिन्हें सामान्यतः प्रभु की प्रार्थना कहा जाता है (मत्ती 6ः9-13), उसकी कई समान चिंताएँ इस प्रार्थना में भी हैं।

”प्रार्थना बार-बार ईश्वर पिता की ओर निर्देशित है। ईश्वर के राज्य के कार्य के लिए चिंता है। बुराई से बचाए रखने की चिंता है। फिर भी इस प्रार्थना में कुछ अलग है; येसु ने केवल वैसे प्रार्थना नहीं की जैसे उन्होंने अपने चेलों को प्रार्थना करने के लिए कहा था।” (ड़ेविड़ गुज़िक)

“योहन के सत्रहवें अध्याय में हमारे प्रभु द्वारा की गई यह विनती स्पष्ट रूप से किसी निम्न व्यक्ति की किसी उच्च व्यक्ति से की गई प्रार्थना नहीं हैः इसमें निरंतर वक्ता की पिता के साथ समानता दिखाई देती है। दोनों का एक ही मन है... जहाँ पुत्र बोलता है, वहाँ वह पिता को अपनी इच्छा के अनुसार झुकाने का प्रयास नहीं कर रहा है; बल्कि वह ईश्वरत्व के उद्देश्य को व्यक्त कर रहा है।” (ट्रेनज)

ख. स्वर्ग की ओर अपनी आँखें उठाईंः

यह उस शारीरिक मुद्रा को दर्शाता है जिसमें येसु ने प्रार्थना की। यह ऐसी मुद्रा है जिसे हम सामान्यतः गहरी प्रार्थना से नहीं जोड़ते। जब हम प्रार्थना करते हैं, तो आमतौर पर अपनी आँखें बंद करके नीचे की ओर देखते हुए प्रार्थना करते हैं। येसु ने अपने समय की सामान्य प्रार्थना की रीति के अनुसार प्रार्थना की (योहन 11ः41, मरकुस 7ः34, स्तोत्र 123ः1)।

”अंतिम भोजन के बाद, उनकी सार्वजनिक प्रचार सेवा समाप्त हो चुकी थी, और मृत्यु के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं था, इसलिए उन्होंने स्वयं को पूरी तरह प्रार्थना के लिए समर्पित कर दिया। अब उन्हें भीड़ को फिर से शिक्षा नहीं देनी थी, न बीमारों को चंगा करना था; अपना जीवन देने से पहले उन्होंने विशेष मध्यस्थता के लिए स्वयं को तैयार किया।” (स्पेर्जन)

2. (1इ) येसु महिमामंडित होने की प्रार्थना करते हैं।

क. पिता, वह घड़ी आ गई हैः

पहले येसु के महिमामंडन की घड़ी (जो उनकी मृत्यु से आरंभ होती है) नहीं आई थी (योहन 2ः4; 7ः8; 7ः30; 8ः20)। अब वह घड़ी आ गई है (जैसा येसु ने पहले योहन 12ः23 में कहा था)।

ख. इन शब्दों पर ध्यान दें- पिता... आपका पुत्र... आपका पुत्र... आपः

यह एक ऐसी प्रार्थना है जो संबंध से गहरी और समृद्ध है। येसु ने पिता ईश्वर और पुत्र ईश्वर के बीच मौजूद पारिवारिक संबंध और स्वाभाविक क्रम या व्यवस्था की पूर्ण और गहरी समझ के साथ प्रार्थना की।

“और इसमें वह हमारे लिए एक उदाहरण स्थापित करते हैंः हर क्लेश के समय हमें अपने पुत्रत्व, अपने गोद लिए जाने और हमारे महान ईश्वर के पितृत्व पर लौटना चाहिए। हमें अपने पिता के पास जाना चाहिए।” (स्पेर्जन)

ग. घड़ीः

उसका विश्वास इसे केवल एक घड़ी समझता हैः गेथसेमनी की आधी रात, कोड़े खाने की सुबह, क्रूस पर चढ़ाए जाने का दिन- ये सब केवल एक घड़ी, एक छोटा समय हैं। अब वह संकट में है, क्योंकि उसकी पीड़ा का समय आ गया है; लेकिन वह इसे एक घड़ी मानता है, क्योंकि वह उस आनंद को देखता है जो उसके दुखद कष्टों द्वारा संसार में जन्म लेने वाला है। “येसु ने उस आनंद के लिए, जो उनके सामने था, क्रूस का दुख सहा और उसकी अपमान की परवाह नहीं की...“ (इब्रानियों 12ः2)

घ. अपने पुत्र की महिमा करः

येसु ने महिमा पाने की प्रार्थना की क्योंकि वह और पिता एक ही दिव्य स्वभाव साझा करते हैं। हालाँकि येसु ने स्वयं को इस महिमा से “त्याग“ दिया था - “यद्यपि येसु वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें, फिर भी अन्होंने दास का रुप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रुप धारण किया।“ (फिलिप्पियों 2ः6-7)। इसलिए येसु ने प्रार्थना की ”संसार की सृष्टि से पहले मुझे तेरे यहॉ जो महिमा प्राप्त थी, अब उस से मुझे विभूषित कर।” (योहन 17ः5)

“यदि क्रूस पर येसु का बलिदान स्वीकार्य न हो, या यदि पुत्र पिता की अप्रतिबंधित महिमा की उपस्थिति में अपने उचित स्थान पर पुनः स्थापित न हो, तो इससे पिता की कोई महिमा नहीं होगी। इसका अर्थ होगा कि दिव्य मिशन असफल हो गया, अनुग्रह के उद्देश्य सदा के लिए पराजित हो गए।” (कारसन)

क्योंकि घड़ी आ गई है (पद 1); पिता की महिमा होगी (पद 1); अनन्त जीवन देने का अधिकार पहले ही दिया गया था (पद 2); येसु जीवन का एकमात्र मार्ग है (पद 3); यह उस कार्य को पूरा करता है जिसे करने के लिए पिता ने पुत्र को भेजा था (पद 3)।

ड. घड़ी आ गई है... अपने पुत्र की महिमा करः

यह क्रूस है (योहन 12ः27-33, 13ः30-33, 21ः18-19) जो पुत्र की महिमा करेगा। संसार की दृष्टि में क्रूस अपमान था, लेकिन ईश्वर की दृष्टि में यह महिमा का साधन था। यह क्रूस की मूर्खता और दुर्बलता का एक पहलू है (1 कुरिन्थियों 1ः18, 1ः23-25)।

हमारी ज़्यादातर प्रार्थनाएँ हमारी अपनी महिमा के लिए होती हैंः हम प्रार्थना करते हैं कि प्रभु हमें आध्यात्मिक आशीषें दें ताकि लोग हमें खोजें, और भौतिक आशीषें दें ताकि हम आपकी प्रशंसा कर सकें। इसके विपरीत, येसु ने प्रार्थना की कि उन्हें क्रूस और दुख सहने का अनुग्रह मिले, ताकि क्रूस पर अपने दुख और मृत्यु के द्वारा वे पिता कि महिमा कर सकें।

पिता ईश्वर ने यह प्रार्थना सुनि इसलिए पवित्र आत्मा की सहायता से येसु क्रूस पर दुख सह सके (इब्रानियों 9ः14)।

संत पौलूस ने ईश्वर की महिमा के लिए जीवन जियाः “चाहे तुम खाओ या पियो, या जो कुछ भी करो, सब कुछ ईश्वर की महिमा के लिए करो“ (1 कुरिन्थियों 10ः31)। “मसीह की महिमा अब भी मेरे शरीर में वैसे ही होगी, जैसे हमेशा होती रही है, चाहे जीवन के द्वारा हो या मृत्यु के द्वारा“ (फिलिप्पियों 1ः20)। “अपने शरीर में ईश्वर की महिमा करो“ (1 कुरिन्थियों 6ः20)।

च. कि आपका पुत्र भी आपकी महिमा करेः

अपने उलटे दिखाई देने वाले कार्य में, क्रूस ने येसु पुत्र की महिमा की और ईश्वर की बुद्धि और सामर्थ्य को प्रकट किया (1 कुरिन्थियों 1ः23-25)। फिर भी उसने पिता ईश्वर की भी महिमा की, क्योंकि उसने अपने बुद्धिमान उद्देश्य और महान बलिदान को प्रकट किया, जिसमें उसने पुत्र को ऐसा कार्य करने के लिए दिया।

येसु ने क्रूस पर मरकर पिता की महिमा की। पिता ने येसु को मरे हुओं में से जी उठाकर येसु की महिमा की और उसने येसु को बहुत ऊँचा उठाया और उसे वह नाम दिया जो हर नाम से ऊपर है (फिलिप्पियों 2ः9)। इसी तरह माता मरियम, संत यूसुफ़, प्रेरित और सभी संत ईश्वर की महिमा के लिए जिए, इसलिए ईश्वर ने उन सभी को महिमा प्रदान की।

3. (2-3) येसु अनन्त जीवन के स्रोत और स्वरूप के विषय में बोलते हैं।

क. आपने उन्हें सभी लोगों पर अधिकार दिया हैः

यहाँ येसु ने एक इंसान के तौर पर प्रार्थना की। भले ही उन्होंने मानव रूप लिया और खुद को ईश्वर के बराबर नहीं माना (फिलिप्पियों 2ः6), फिर भी ईश्वर पिता ने येसु को सभी इंसानों पर अधिकार दिया। ऐसा नहीं है कि येसु के पास पहले यह अधिकार नहीं था, बल्कि यह दिखाता है कि मानव रूप में भी उनको यह अधिकार दिया गाया था।

ख. उन सभी को अनंत जीवन देने के लिए जिन्हें आपने उन्हें सौंपा हैः

यह ईश्वर होने का एक साफ़ और चौंकाने वाला दावा है; ईश्वर के अलावा कोई और ऐसा दावा नहीं कर सकता; “इंसानों की आखिरी मंज़िल तय करने का अधिकार।“ उदाहरण के लिए, माता मरियम या प्रेरित गण हमें अनंत जीवन नहीं दे सकते क्योंकि वे इंसान हैं; जबकि येसु ऐसा कर सकते हैं क्योंकि वे खुद ईश्वर हैं। पिता ईश्वर चाहते हैं कि हर कोई येसु मसीह के ज़रिए बचाया जाए (1 तिमथी 2ः3-4), इसलिए येसु को ब्रह्मांड के सभी लोगों पर अधिकार दिया गया है।

ग. और अनंत जीवन यही है कि वे आपको, एकमात्र सच्चे ईश्वर को, और येसु मसीह को, जिसे आपने भेजा है, जानेंः

कैथोलिक चर्च इस आयत को उन वचनों के साथ पढ़ता है जिनमें येसु पिता के साथ अपनी एकता का दावा करते हैं (जैसे योहन 10ः30 और योहन 14ः9) और जिनमें वे “संसार के अस्तित्व में आने से पहले“ की दिव्य महिमा रखते हैं (योहन 17ः5)।

अनंत जीवन तब शुरू होता है जब हम ईश्वर की इच्छा के अनुसार जीते हैं। क्योंकि येसु कहते हैं, “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, जो कोई मेरे वचन का पालन करेगा, वह कभी मृत्यु नहीं देखेगा“ (योहन 8ः51) - इसमें त्रित्व को स्वीकार करना शामिल है।

4. (4-5) विनती फिर से कही जाती है, विश्वास से भरी हुईः मेरी महिमा कर।

क. मैंने पृथ्वी पर आपकी महिमा की हैः

येसु ने पिता की महिमा करने के लिए क्रूस पर अपने काम का इंतज़ार नहीं किया। उनके पूरे जीवन ने पृथ्वी पर ईश्वर की महिमा की। क्योंकि उनका भोजन पिता की इच्छा को पूरा करना था (योहन 4ः34)।

ख. मैंने काम पूरा कर लिया हैः

येसु पृथ्वी पर हर कदम पिता की इच्छा के अनुसार उठा रहे थे और अब वह अपने दुख और क्रूस पर मृत्यु के समय के करीब थे, जिसकी उन्हें चाहत थी - येसु वह मेमना हैं जो दुनिया की नींव रखे जाने के समय से ही बलिदान के लिए ठहराए गए थे (प्रकाशना 13ः8); इसलिए दिव्य भरोसे और यकीन के साथ, वह जो जीवन के रचयिता हैं (प्रेरित चरित 3ः15), कह सके कि ’मैंने काम पूरा कर लिया है’। येसु ने क्रूस पर से भी कहा ”सब पूरा हो चुका है” (योहन 19ः30)। संत पौलूस भी यही कहते हैं, “मैंने अच्छी लड़ाई लड़ी है, मैंने दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास बनाए रखा है“ (2 निमथी 4ः7)। हमें भी ईश्वर द्वारा सौंपे गए कार्य को पूरा करके ही इस संसार से विदा लेना चाहिए हैं।

ग. मुझे अपने साथ महिमा देंः

येसु ने पिता से अपनी महिमा करने को कहा, लेकिन उसी महिमा के साथ जो पिता के पास खुद है। येसु की प्रार्थना किसी भी तरह से आज़ादी का इज़हार नहीं थी, बल्कि ईश्वर पिता पर पूरी और लगातार निर्भरता थी।

घ. उस महिमा के साथ जो दुनिया के बनने से पहले आपके साथ थीः

येसु को अपने पहले के अस्तित्व के बारे में पता था। येसु जानते थे कि वह पिता के साथ अनंत काल से एक जैसी महिमा का आनंद लेते थे। इसायाह 42ः8 और 48ः11 में, यहोवा ने घोषणा की कि वह अपनी महिमा किसी के साथ नहीं बांटते। अगर ईश्वर पिता और ईश्वर पुत्र अपनी महिमा बांटते हैं, तो वे दोनों ही यहोवा होने चाहिए (योहन 10ः30)। येसु ने पूरी मानवता के लिए काम पूरा करने के लिए स्वेच्छा से इस महिमा को छोड़ दिया (फिलिप्पियों 2ः5-6)। येसु का जीवन ईश्वर की महिमा का प्रकटीकरण थाः चेलों ने इस महिमा को देखा (योहन 1ः14)। चमत्कारों ने उनकी महिमा को प्रकट किया (योहन 2ः11)। येसु ने केवल अपने पिता की महिमा चाही (योहन 7ः18, 8ः50)। महिमा का प्रकटीकरण विश्वास का प्रतिफल है (योहन 11ः40)। कई बार येसु ने अपने आने वाले दुख और क्रूस पर चढ़ने को अपनी आने वाली महिमा के रूप में बताया (योहन 7ः39, 12ः16, 12ः23, 13ः31)। ईश्वर पुत्र पिता ईश्वर की महिमा करना चाहते हैं (योहन 12ः28) पिता ईश्वर पुत्र की महिमा करते हैं (योहन 13ः31-32)।

आ. येसु शिष्यों के लिए प्रार्थना करते हैं।

निराशा की पूर्व संध्या पर शिष्यों को जितना संभव था उतना सिखाने और प्रोत्साहित करने के बाद, येसु ने अब उन्हें प्रार्थना में पिता को सौंप दिया।

1. (6-8) येसु शिष्यों के बीच अपनी सेवा और उनके द्वारा उसे स्वीकार किए जाने के विषय में बोलते हैं।

क. “मैंने उन लोगों पर तेरा नाम ज़ाहिर किया है जो तूने मुझे दिए हैं“ः

येसु ने अपनी सार्वजनिक सेवा के दौरान न केवल ईश्वर के नाम के बारे में सिखाया, बल्कि ईश्वर के स्वभाव को भी प्रकट किया। येसु अदृष्य ईश्वर के दृष्य रुप है (कलोसियों1ः15)।

ख. “वे लोग जो तूने मुझे दुनिया में से दिए हैं“ः

येसु ने रात भर प्रार्थना करने के बाद अपने चेलों को चुना, और उन्हें चुनने में पिता पर अपनी निर्भरता ज़ाहिर की (लूका 6ः12-16)। उस शाम कुछ समय पहले ही यूदस चेलों के इस समूह से अलग हो गया था (योहन 13ः26-30)। यूदस के चले जाने के बाद, येसु सचमुच कह सकते थे, “वे लोग जो तूने मुझे दुनिया में से दिए हैं।“ येसु ने दुनिया के इन लोगों को ईश्वर के लोग बना दिया।

ग. वे आपके थे, आपने उन्हें मुझे दियाः

चेले पिता के थे, लेकिन उसकी बात न मानने के कारण वे दुनिया के बन गए थे। इसलिए पिता ने उन्हें येसु को सौंप दिया ताकि वे उनकी बात मान सकें और पिता के पास वापस आ सकें।

घ. उन्होंने आपकी बात मानी हैः

कोई कह सकता है कि येसु ने अपने चेलों को बहुत उदारता से परखा; लेकिन उन्होंने उनमें ईश्वर का सच्चा काम देखा। अपनी सभी मानव दुर्बलताओं और नाकामियों के बावजूद, उन्होंने ईश्वर की बात मानी थी।

ड. अब वे जान गए हैं कि जो कुछ भी आपने मुझे दिया है, वह आपकी ओर से हैः

येसु ने अपने चेलों को यह बात कुछ समय पहले (योहन 14ः10-11) और उससे भी पहले (योहन 8ः28-29) साफ-साफ बताई थी। येसु ने जो कुछ भी किया या कहा, वह पूरी तरह से अपने ईश्वर और पिता पर निर्भर रहकर किया।

च. वे पक्का जान गए हैं कि मैं आपकी ओर से आया हूँः

ज़ाहिर है कि चेले येसु और उनके काम के बारे में सब कुछ नहीं समझते थे, लेकिन इस समय तक उन्हें येसु और उनकी शिक्षाओं के दैवीय मूल (ईश्वर से होने) का यकीन हो गया था (मत्ती 16ः16; योहन 6ः68)।

छ. उन्होंने विश्वास किया है कि आपने मुझे भेजा हैः

येसु के साथ रहने और उनकी शिक्षाओं, उपदेशों, चमत्कारों और चंगाई के कामों को देखने-सुनने से चेलों को यह विश्वास करने में मदद मिली कि येसु को पिता ने भेजा था।

2. (9-10) येसु अपनी प्रार्थना को निर्देशित करते हैं।

क. मैं उनकी ओर से प्रार्थना कर रहा हूँ; मैं दुनिया की ओर से प्रार्थना नहीं कर रहा हूँः

इस खास मौके पर येसु अपने उन चेलों के लिए प्रार्थना कर रहे थे जो उनके प्यार और उद्धार के संदेश को दुनिया तक पहुँचाएँगे।

“मैं दुनिया के लिए प्रार्थना नहीं करता“ का मतलब यह नहीं है कि येसु को खोई हुई और गिरी हुई दुनिया की परवाह नहीं थी। असल में, वही दुनिया के उद्धारकर्ता हैं (योहन 4ः42; तुलना करें 3ः17; 12ः47; 1 योहन 2ः2)। लेकिन दुनिया का उद्धार उन लोगों की गवाही पर निर्भर करता है जिन्हें पिता ने उन्हें ’दुनिया में से’ दिया है (पद 21, 23 देखें), और इस मोड़ पर उन्हीं को उनकी मध्यस्थता की ज़रूरत है।

ख. लेकिन उनके लिए जिन्हें आपने मुझे दिया हैः

येसु ने न केवल ग्यारह चेलों के लिए प्रार्थना की, बल्कि उनके लिए भी प्रार्थना की जो उनकी गवाही पर विश्वास करेंगे (योहन 17ः20)।

ग. जो कुछ मेरा है वह आपका है, और जो आपका है वह मेरा हैः

हमारे पास जो कुछ भी है वह पिता ईश्वर का है, लेकिन उनके पास जो कुछ भी है वह सब हमारा नहीं है। कोई भी पिता ईश्वर से कह सकता है “जो कुछ मेरा है वह आपका है“; लेकिन केवल येसु ही कह सकते थे “और जो आपका है वह मेरा है।“

घ. मैं उनमें महिमा पाता हूँः

एक तरह से, विश्वासी होने, नया जन्म पाने और येसु मसीह का सच्चा अनुयायी होने का यही मतलब है - कि हमारे जीवन और मृत्यु के ज़रिए हममें केवल उन्हीं की महिमा हो। संत पौलुस ने इस विचार का प्रचार किया- “हम न तो अपने लिए जीते हैं और न ही अपने लिए मरते हैं। यदि हम जीते हैं, तो प्रभु के लिए जीते हैं, और यदि हम मरते हैं, तो प्रभु के लिए मरते हैं; इसलिए, चाहे हम जिएँ या मरें, हम प्रभु के ही हैं“ (रोमियों 14ः7-8)।

3. (11-12) चेलों के लिए येसु की पहली प्रार्थनाः पिता, उनकी रक्षा कर।

क. अब मैं दुनिया में नहीं हूँ, लेकिन ये दुनिया में हैंः

येसु ने यह पूरी प्रार्थना अपने जल्द जाने की बात को ध्यान में रखकर की। उन्हें एहसास था कि वे अब शारीरिक रूप से दुनिया में नहीं रहेंगे, लेकिन उनके चेले रहेंगे। इसलिए उन्हें खास प्रार्थना की ज़रूरत थी।

ख. और मैं तेरे पास आ रहा हूँः

धरती पर येसु का काम लगभग पूरा हो चुका था, और वे स्वर्ग जा रहे थे। येसु को पूरा भरोसा था कि वे पिता के पास जा रहे हैं।

ग. पवित्र पिता, उन्हें अपने नाम से सुरक्षित रख जो तूने मुझे दिया हैः

चेलों को सुरक्षित रहने के लिए येसु की प्रार्थना और पिता ईश्वर की शक्ति की ज़रूरत थी; उन्हें सुरक्षित रहना था, येसु के चेलों और उद्धार पाए हुए लोगों के तौर पर बने रहना था। जल्द ही उन्हें ईश्वर की जगह लेनी थी और उनकी सेवा को आगे बढ़ाना था।

हमें अपने लिए प्रार्थना करने वाले येसु की ज़रूरत है (रोमियों 8ः34, इब्रानियों 7ः25), जो पिता ईश्वर से हमें सुरक्षित रखने के लिए कहें। हम सिर्फ़ अपनी कोशिशों से येसु के साथ बने नहीं रह सकते; क्योंकि दुनिया, शरीर और शैतान इतने ताकतवर और लुभावने हैं कि हमें येसु की मध्यस्थता की ज़रूरत है- “पिता, उन्हें सुरक्षित रख“; उन्हें फूट, गलती, पाप, पाखंड वगैरह से बचाकर रख।

घ. ताकि वे एक हो जाएँ जैसे हम हैंः

एकता के लिए दुनिया में सबसे अच्छा उदाहरण त्रित्व ईश्वर है। इसलिए यहाँ येसु अपने मानने वालों के बीच वैसी ही एकता चाहते हैं। येसु आयतों 21-23 में भी इसी एकता के बारे में दोहराते हैं। यह एकता की अहमियत को दिखाता है। शुरुआती ईसाई समुदाय के बारे में कहा गया था कि “अब विश्वास करने वालों का पूरा समूह एक मन और एक प्राण का था“ (प्रेरित चरित 4ः32) क्योंकि उनको आत्मा की एकता, मन की एकता, मकसद की एकता और मंज़िल की एकता प्राप्त हूई थी (प्रेरित चरित 2ः42)। प्यार से ही पूरी तरह तालमेल बनता है (कलोसियों 3ः14)।

ड. जब मैं संसार में उनके साथ था, तब मैंने आपके नाम से उनकी रक्षा कीः

येसु अपने तीन वर्षों में शिष्यों की रक्षा केवल पिता के नाम से ही कर सके। विश्वासी केवल ईश्वर में ही हमेशा के लिए एक होकर रह सकते हैं।

स्तोत्र 91 में ईश्वर को एक सुरक्षित आश्रय, एक गढ़ और एक रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है जो लोगों को छिपे हुए जालों, घातक बीमारियों और दिन-रात के खतरों से बचाता है।

च. उनमें से कोई भी नहीं खोया, सिवाय विनाश के पुत्र केः

मसीह ने यूदस को नहीं खोया, क्योंकि येसु ने उसे बचाने का हर संभव प्रयास किया- येसु ने यूदस को ’लास्ट सपर’ (आखिरी भोज) के लिए बुलाया, जबकि वे जानते थे कि यूदा ने उन्हें धोखा दिया है; येसु ने उनके पैर धोए और उसे पहली परमप्रसद (प्रभु-भोज) दी। , लेकिन यूदस ने स्वयं को खो दिया। “‘विनाश का पुत्र’ नियति के बजाय चरित्र की ओर इशारा करता है। इस अभिव्यक्ति का अर्थ है कि वह ‘खोया हुआ’ था, न कि वह ‘खोया हुआ’ होने के लिए पूर्वनियोजित था।” (मॉरिस)

छ. ताकि धर्मग्रन्थ पूरा होः

यूदस के विश्वासघात द्वारा पूर्ण किए गए धर्मग्रन्थ विशेष रूप से स्तोत्र 41ः9 और स्तोत्र 109ः8 थे, जिनका विशेष रूप से प्रेरित चरित 1ः20 में उल्लेख किया गया है।

4. (13-16) येसु पहले अनुरोध को विस्तार से बताते हैंः उन्हें मेरे आनंद में बनाए रखो और दुष्ट से बचाओ।

क. परन्तु अब मैं तेरे पास आता हूँः

येसु ने फिर से इस वाक्यांश का उपयोग किया, जिसका पहला उल्लेख योहन 17ः11 में हुआ था।

ख. ताकि उनमें मेरा आनंद पूरा हो जाएः

येसु ने न केवल अपने शिष्यों की सुरक्षा और एकता के लिए प्रार्थना की, बल्कि उन्होंने उनके जीवन में अपने आनंद के पूरा होने की भी गहरी चिंता की और उसके लिए प्रार्थना की। येसु हमसे इतना प्यार करते हैं कि वे चाहते हैं कि हममें त्रित्व (पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा) जैसी एकता हो और वह भरपूर आनंद भी हो जो येसु में है। येसु दिल से चाहते हैं कि उनके शिष्य भी उस खुशी का अनुभव करें, जिसका अनुभव वे खुद करते हैं।

ग. मैंने उन्हें तेरा वचन दिया हैः

येसु ने पिता का वचन अपने शिष्यों तक पहुँचाया। येसु ने पिता का वचन दिया। इससे पता चलता है कि दूसरों को ईश्वर का वचन देना हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है।

घ. मैं यह प्रार्थना नहीं करता कि तू उन्हें दुनिया से बाहर निकाल लेः

हमारा लक्ष्य दुनिया में रहना है, लेकिन दुनिया का हिस्सा नहीं बनना है; ठीक वैसे ही जैसे एक जहाज समुद्र में तो होता है, लेकिन समुद्र के पानी को जहाज के अंदर नहीं आने देता। इसी तरह, शिष्यों दुनिया में रहना है, ताकि वे उन लोगों को बचा सकें जो दुनिया और अन्य पापों में डूबे हुए हैं।

ड. मैं यह प्रार्थना नहीं करता कि तू उन्हें दुनिया से बाहर निकाल ले, बल्कि यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रखेः

येसु ने यह प्रार्थना नहीं की कि हमें दुनिया के साथ होने वाली लड़ाई से बाहर निकाल लिया जाए, बल्कि यह कि हमें उसमें मजबूती और सुरक्षा मिले। दुष्ट से बचाए रखने का अर्थ है धर्मत्याग, सांसारिकता, अपवित्रता आदि से दूर रहना; इसका अर्थ मुसीबतों या कठिनाइयों से बचाए रखना नहीं है।

धर्मग्रन्थ हमें साफ बताता है कि दुनिया में शैतान की उपस्थिति है (मत्ती 6ः13; 12ः43-47; 1 पेत्रुस 5ः8; एफेसियों 6ः11-12 आदि)।

च. वे दुनिया के नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे मैं दुनिया का नहीं हूँः

येसु अपने स्वभाव, अपनी भूमिका और अपने चरित्र में दुनिया के नहीं थे। येसु स्वर्गीय मूल्यों के साथ इस दुनिया में जिए और पिता की इच्छा का पालन किया। इसलिए उनके विश्वासियों को भी इसका अनुकरण करना चाहिए। येसु में विश्वास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को बचाने के लिए ही इस दुनिया में है।

“खुद को दुनिया की बुराइयों से दूर रखो” (याकूब 1ः27); “क्या तुम नहीं जानते कि दुनिया से दोस्ती करने का अर्थ है ईश्वर से बैर करना? इसलिए जो कोई दुनिया का दोस्त बनना चाहता है, वह ईश्वर का दुश्मन बन जाता है” (याकूब 4ः4); “आप संसार के अनुकूल न बने” (रोमियों 12ः2); “दुनिया या दुनिया की चीज़ों से प्यार न करो। जो लोग दुनिया से प्यार करते हैं, उनमें पिता का प्यार नहीं होता” (1 योहन 2ः15)।

“इस दुनिया से चले जाने से पहले ही, आओ हम इससे बाहर आ जाएँ” - संत बेसिल और संत ग्रेगरी।

5. (17-19) चेलों के लिए येसु की दूसरी विनतीः उन्हें पवित्र करो।

क. उन्हें सत्य में पवित्र करेंः

पवित्र करने का मतलब है ईश्वर की खास कार्य और इस्तेमाल के लिए अलग किया जाना। इसका अर्थ है पवित्रता, दुनिया की बुराइयों से अलग होना और ईश्वर की सेवा के लिए अलग होना।

ख. आपका वचन ही सत्य हैः

हमें ईश्वर के वचन को पढ़ना, सुनना, समझना और उस पर अमल करना चाहिए। ईश्वर का वचन हमें पवित्र करता है (योहन 15ः3)। येसु कलीसिया को वचन के द्वारा पानी से धोकर पवित्र बनाते हैं (एफेसियों 5ः26)। “आप जितना ज़्यादा सच्चाई पर विश्वास करेंगे, उतने ही ज़्यादा पवित्र होंगे। मन पर सच्चाई का असर यह होता है कि वह इंसान को दुनिया से अलग करके ईश्वर की सेवा के लिए तैयार करती है।” (स्पर्जन)

ग. जैसे आपने मुझे दुनिया में भेजा, वैसे ही मैंने भी उन्हें दुनिया में भेजा हैः

येसु ने षिष्यों को इस दुनिया से चुना है (योहन 15ः19) और वे चाहते हैं कि षिष्य ईश्वर की सेवा और मिशन के लिए अलग किए जाएँ। येसु उन्हें बस दुनिया में अकेला छोड़ नहीं देते, बल्कि उन्हें दुनिया में भेजते हैं ताकि वे ईश्वर की इसी सच्चाई की गवाही दे सकें।

घ. और उनकी खातिर मैं खुद को पवित्र करता हूँ, ताकि वे भी सच्चाई में पवित्र हो सकेंः

ऐसा नहीं है कि येसु अब तक पवित्र नहीं थे। येसु ईश्वर के पाप-रहित पुत्र हैं (1 योहन 3ः5; इब्रानियों 4ः15), उन्हें व्यक्तिगत शुद्धि या नैतिक सुधार की कोई ज़रूरत नहीं है। इसका मतलब है कि वह खुद को अलग कर रहे हैं और क्रूस पर ईश्वर के लिए एक पवित्र और बेदाग़ बलिदान के तौर पर खुद को समर्पित कर रहे हैं, ताकि उनके मानने वाले सच्चाई के ज़रिए साफ़ और पवित्र बन सकें। येसु ने हमें पवित्र करने के लिए हमारे लिए प्राण दिए (इब्रानियों 13ः12; तीतुस 2ः14)।

इ. येसु सभी विश्वासियों के लिए प्रार्थना करते हैं।

1. (20) येसु अपनी प्रार्थना का विस्तार बढ़ाते हैं।

क. मैं सिर्फ़ इनके लिए ही नहीं, बल्कि उनके लिए भी प्रार्थना करता हूँ जो इनकी बातों से मुझ पर विश्वास करेंगेः

इसका मतलब है कि येसु यह जानते हुए क्रूस पर गए कि उनका काम आगे भी चलता रहेगा। उन्हें यह भी उम्मीद थी कि चेले प्रचार करेंगे। हम ईसाई इसलिए हैं क्योंकि किसी ने हमें या हमारे माता-पिता को सुसमाचार सुनाया था। अब हमारी बारी है कि हम अपने जीवन, काम और बातों से दूसरों को सुसमाचार सुनाएँ। एक और बात याद रखने वाली है कि येसु हमारे लिए भी प्रार्थना कर रहे हैं। ईश्वर का वचन कहता है कि वे पिता के दाहिने हाथ बैठे हैं और हमारे लिए विनती कर रहे हैं (रोमियों 8ः34; इब्रानियों 7ः25)।

2. (21) येसु सभी विश्वासियों के बीच एकता के लिए प्रार्थना करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे शुरुआती चेलों के बीच थी।

क. कि वे सब एक होंः

येसु ने ईश्वर के सिंहासन के सामने हर देश, जाति, भाषा, वर्ग और सामाजिक स्तर के लोगों की एक बड़ी भीड़ की कल्पना की थी (प्रकाशना 7ः9-10)। येसु ने प्रार्थना की कि वे अपनी अलग-अलग पृष्ठभूमियों से ऊपर उठें और अपनी एकता को समझें; कि वे सब एक हों।

ख. कि वे सब एक हों, जैसे हे पिता, तू मुझमें है और मैं तुझमें हूँः

येसु त्रित्व की एकता से कम कुछ नहीं चाहते। इस प्रार्थना में पहले येसु ने खास तौर पर वहाँ मौजूद 11 चेलों के लिए प्रार्थना की थी कि वे एकजुट रहें (कि वे वैसे ही एक हों जैसे हम हैं, योहन 17ः11)। यहाँ येसु ने उस प्रार्थना का विस्तार सभी विश्वासियों तक बढ़ा दिया, कि वे सब एक हों।

“जैसे हे पिता, तू मुझमें है और मैं तुझमें हूँ“ - यह इस सच्चाई को भी बताता है कि हमारी एकता की नींव वही है जो पिता और पुत्र के बीच की एकता की नींव हैः व्यक्तियों की समानता।

ग. कि वे भी हममें एक होंः

येसु जिस एकता की बात कर रहे थे, वह एकता पिता और पुत्र के साथ साझे जीवन से आती है। “यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे, ठीक वैसे ही जैसे मैंने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है और उसके प्रेम में बना हुआ हूँ“ (योहन 15ः10)। इसलिए ईश्वर में बने रहने के लिए हमें ईश्वर की प्रेम की आज्ञाओं का पालन करना होगा।

घ. ताकि दुनिया विश्वास करे कि आपने मुझे भेजा हैः

अपने शिष्यों को प्रेम में एक-दूसरे से जुड़े हुए देखकर ही दुनिया यह विश्वास कर सकती है कि येसु को पिता ने भेजा है (योहन 17ः23)। “...जैसे मैंने तुमसे प्रेम किया है, वैसे ही तुम भी एक-दूसरे से प्रेम करो। इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो...“ (योहन 13ः34-35)

3. (22) येसु प्रार्थना करते हैं कि कलीसिया महिमा से पहचानी जाए।

क. जो महिमा आपने मुझे दी, वह मैंने उन्हें दी हैः

जैसे पिता ने अपनी महिमा पुत्र के साथ बांटी (योहन 17ः5), वैसे ही येसु ने अपने लोगों को महिमा दी। संत योहन कहते हैं, “हमने उसकी महिमा देखी, पिता के एकलौते पुत्र की महिमा, जो अनुग्रह और सच्चाई से भरपूर है“ (योहन 1ः14)। बेशक, पिता चाहते हैं कि हम येसु की महिमा में भागीदार बनें (रोमियों 8ः17)। येसु कई तरीकों से अपने लोगों को अपनी महिमा देते हैंः अपनी उपस्थिति की महिमा, अपने वचन की महिमा, अपनी आत्मा, अपनी शक्ति, अपनी कृपा, अपनी अगुवाई आदि की महिमा।

ख. जो महिमा आपने मुझे दीः

यह याद रखना ज़रूरी है कि जो महिमा पिता ने पुत्र को दी, वह अक्सर विनम्रता, कमजोरी, दुख और बड़े बलिदान के रूप में दिखाई दी (येसु ने अक्सर इसे अपनी महिमा पाए जाने के रूप में बताया है - योहन 7ः39, 12ः16, 12ः23)। येसु की महिमा मनुष्य की अपनी बड़ाई और व्यर्थ की महिमा के बिल्कुल विपरीत है।

ग. ताकि वे एक होंः

महिमा की उपस्थिति - ईश्वरत्व के व्यक्तियों और कलीसिया के सदस्यों के बीच - एकता में योगदान देती है। जहाँ ईश्वर की महिमा का एहसास होता है, वहाँ एकता बहुत आसान हो जाती है।

4. (23) येसु प्यार पर आधारित एकता के लिए प्रार्थना करते हैं।

क. मैं उनमें हूँ, और आप मुझमें हैं; ताकि वे सब एक होकर सिद्ध हो जाएँः

येसु ने प्यार की एकता के लिए प्रार्थना की।

ख. ताकि दुनिया जान सके कि आपने मुझे भेजा है, और उनसे भी वैसा ही प्यार किया है जैसा मुझसे किया हैः

यहाँ येसु ने उस बात को आगे बढ़ाया जो उन्होंने योहन 17ः21 में कही थी (कि दुनिया विश्वास करे कि आपने मुझे भेजा है)। यह दोहराव और उसका विस्तार, दोनों ही ध्यान देने लायक हैं। यह हमें ईसाइयों के बीच एकता और प्यार के महत्व की याद दिलाता है। ऐसा लगता है जैसे येसु ने दुनिया को अपने मिशन और अपने प्यार पर शक करने की इजाज़त दे दी हो, अगर दुनिया मानने वालों के बीच एकता और प्यार न देखे। ईसाइयों की यह बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वे अपने प्यार और एकता के ज़रिए दुनिया को येसु के बारे में दिखाएँ।

हम देखते हैं कि संत पौलूस ने चर्च में मौजूद मतभेदों की बहुत कड़े शब्दों में निंदा की।(1 कुरिन्थियों 1ः10-13; 3ः1-9; 11ः18)।

ग. और उनसे भी वैसा ही प्यार किया है जैसा मुझसे किया हैः

यहाँ हमें पता चलता है कि पिता हमसे भी वैसा ही प्यार करते हैं जैसा वे येसु से करते हैं (योहन 17ः23, 26); येसु कहते है कि जैसे पिता ने मुझसे प्यार किया है, वैसे ही मैंने तुमसे प्यार किया है (योहन 15ः9)।

5. (24) येसु अपने लोगों के साथ रहने और उन्हें अपनी महिमा दिखाने के लिए प्रार्थना करते हैं।

क. मेरी इच्छा है कि जिन्हें आपने मुझे दिया है, वे भी मेरे साथ हों जहाँ मैं हूँः

येसु सब चीज़ों के पूरे होने का इंतज़ार कर रहे हैं, और उनकी बहुत इच्छा है कि उनके लोग स्वर्ग में उनके साथ इकट्ठा हों। येसु अभी स्वर्ग में नहीं थे, फिर भी वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे वे पहले से ही वहाँ हों। हमें भी ऐसा ही करने के लिए बुलाया गया है, यह समझते हुए कि हम धरती पर रहते हुए भी येसु के साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठे हैं (एफेसियों 1ः3, 2ः6)। येसु की आपसे भी ज़्यादा इच्छा है कि वे आपको स्वर्ग में देखें। संत पौलुस कहते हैं, “इन बातों से एक-दूसरे का हौसला बढ़ाओ“ (1 थेसलनीकियों 4ः18)। “इन बातों“ का मतलब है कि हम स्वर्ग जाएँगे।

ख. ताकि वे मेरी उस महिमा को देख सकें जो आपने मुझे दी हैः

येसु ने कहा था कि स्वर्ग में उनके लोगों का ध्यान इसी बात पर होगा- येसु की महिमा को देखना। येसु की महिमा में ज़रूर कुछ ऐसा गहरा, मनमोहक और विशाल होगा जो हमेशा-हमेशा के लिए ईश्वर के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच सके।

ग. क्योंकि तुमने दुनिया बनने से पहले ही मुझसे प्रेम कियाः

येसु ने यह बात उस महिमा के संदर्भ में कही जो पिता ने पुत्र को दी थी। यह महिमा प्रेम के रिश्ते के संदर्भ में दी गई थी, और यह प्रेम का रिश्ता अनंत काल से चला आ रहा था।

6. (25-26) येसु की प्रार्थना का शानदार समापन।

क. हे धर्मी पिता!

येसु क्रूस पर जाने और अपने दुख-भोग की पूरी परीक्षा से गुज़रने वाले थे। यह सब पिता की योजना थी और उन्हीं की ओर से तय किया गया था। फिर भी, पिता के प्रति प्रेम और सम्मान से भरे हुए येसु ने इस प्रार्थना को समाप्त करते हुए पुकारा, “हे धर्मी पिता!“

ख. दुनिया ने आपको नहीं जाना, लेकिन मैंने आपको जाना हैः

येसु समझते थे कि दुनिया ईश्वर पिता को नहीं जानती और न ही समझती है, जबकि वे स्वयं उन्हें जानते और समझते थे।

ग. और इन्होंने जान लिया है कि आपने मुझे भेजा हैः

येसु ने उस बात को दोहराया जिसका ज़िक्र उन्होंने इस प्रार्थना में पहले योहन 17ः8 में किया था। उनकी मानवीय दुर्बलताओं और कमज़ोरियों के बावजूद, चेलों को यह समझ आ गया था कि पिता ने ही पुत्र को भेजा है।

घ. मैंने उन्हें आपका नाम बताया है, और बताता रहूँगाः

येसु ने इस महान प्रार्थना का समापन विश्वास और विजय की भावना के साथ किया। वे जानते थे कि उन्होंने अपना काम कर लिया है और वे अपना कार्य पूरा करेंगे।

एक तरह से, येसु के पूरे काम का सार यह कहा जा सकता है कि उन्होंने चेलों और दुनिया के सामने पिता का नाम प्रकट किया। यानी, उन्होंने पिता के चरित्र और स्वभाव को उनकी महिमा की चमक और उनके व्यक्तित्व की सटीक छवि के रूप में प्रकट किया और वैसा ही जीवन जिया (इब्रानियों 1ः3)। येसु की तरह हमें भी इस दुनिया में ईश्वर को प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है।

ड. ताकि जिस प्रेम से आपने मुझसे प्रेम किया, वह उनमें भी होः

येसु को पिता से प्रेम मिला था, और प्रेम का यह रिश्ता ही उनके जीवन की ताकत और सहारा था। यहाँ, अपनी महान प्रार्थना को समाप्त करते हुए, येसु ने प्रार्थना की कि वही प्रेम, जो उनकी ताकत और सहारा था, उनके चेलों (पास और दूर के) में भी भर जाए। यह मसीही जीवन और समुदाय में प्रेम के ज़रूरी स्थान को दर्शाता है।

च. और मैं उनमेंः

येसु ने प्रार्थना की कि उनके चेले न केवल पिता के प्रेम से भरे हों, बल्कि वे स्वयं येसु की उपस्थिति को भी जानें, जो उनमें वास करते हैं। यह उसी शाम येसु के कहे शब्दों (योहन 15ः1-8) में ’बने रहने’ और ’भीतर वास करने वाले येसु’ पर दिए गए ज़ोर को आगे बढ़ाता है।

येसु ने चेलों के लिए जो प्रार्थना की, उसका सारांशः

पिता, उन्हें सुरक्षित रख (11-12)

पिता वे एक हो जाएँ जैसे हम हैं (11, 21-23)

उन्हें मेरे परिपूर्ण आनंद में बनाए रखिए (13)

उन्हें दुष्ट से बचाईए (15)

वे दुनिया के नहीं रहें, ठीक वैसे ही जैसे मैं दुनिया का नहीं हूँ (14-16)

उन्हें सत्य में पवित्र करें (17)

वे स्वर्ग में मेरे साथ हों, जहाँ मैं हूँ, ताकि वे मेरी महिमा देख सकें (24)

उनमें आपका प्रेम हो और मैं उनमें रहूँ (26)


Praise the Lord!