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विवरण: 1 जून

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जून 01

संत जुस्तिन, शहीद –अनिवार्य स्मृति

जुस्तिन का जन्म पहली सदी के आसपास फिलिस्तीनी प्रांत सामरिया में हुआ था, जो यूनानी भाषी माता-पिता के पुत्र थे। जुस्तिन के पिता ने यूनानी मूर्तिपूजक धर्म का पालन किया और अपने बेटे को भी इसी धर्म में बढ़ा किया। उन्होंने जुस्तिन को साहित्य और इतिहास में एक उत्कृष्ट शिक्षा भी प्रदान की। जुस्तिन सत्य का उत्साही खोजी था, और एक युवा व्यक्ति के रूप में, दर्शनशास्त्र में रुचि रखते हुए पूरे साम्राज्य में फैले विचार के विभिन्न विद्यालयों में सत्य की खोज की।

कई वर्षों के अध्ययन के बाद, जुस्तिन का सामना एक बूढ़े व्यक्ति के साथ हुआ जिसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने जुस्तिन से उनकी मान्यताओं के बारे में और विशेष रूप से सत्य को प्राप्त करने के साधन के रूप में दर्शनशास्त्र की पर्याप्तता के बारे में सवाल किया। उन्होंने उसे यहूदी नबीयों का अध्ययन करने का आग्रह किया और यह भी बताया कि इन लेखकों ने न केवल ईश्वर की प्रेरणा से बात की थी, बल्कि मसीह के आने और उनकी कलीसिया की नींव की भी भविष्यवाणी की थी। जुस्तिन ने हमेशा ईसाइयों के नैतिक जीवन की सुंदरता के कारण उनकी दूर से ही प्रशंसा की थी।

अपने धर्म परिवर्तन के उपरांत, रोम चले जाने के बाद भी उन्होंने एक सरल और तपस्वी जीवन शैली को अपनाया। जुस्तिन कदाचित एक उपयाजक दीक्षित किया गया था, क्योंकि उन्होंने प्रचार किया, विवाह नहीं किया, और अपने घर में ही धार्मिक शिक्षा दी। उन्हें प्रारंभिक मंडनात्मक खीस्तीय साहित्य कार्यों के लेखक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने यहूदियों, अन्यजातियों और गैर-ख्रीस्तीय दार्शनिकों के दावों के खिलाफ काथलिक विश्वास के लिए तर्क दिया।

कलीसिया के बारे में बताए गए झूठ का खंडन करने के उद्देश्य से इनमें से कई लेख रोमन अधिकारियों को लिखे गए थे। जुस्तिन ने रोमन साम्राज्य के शासकों को यह समझाने की कोशिश की कि वे ईसाईयों को सताने पर कुछ भी हासिल नहीं करेंगे; इसके विपरीत वे बहुत कुछ खोयेंगे। उनके दो सबसे प्रसिद्ध मंडनात्मक ख्रीस्तीय ग्रंथ ‘‘पक्षसमर्थन‘‘ और ‘‘ट्रायफॉन के साथ संवाद‘‘ थे।

उन्हें अन्य विश्वासियों के एक समूह के साथ गिरफतार कर रोम के अनुशासक, रुस्तिकस के सामने लाया गया। एक जीवित प्रत्यक्षदर्शी के बयान से पता चलता है कि कैसे दार्शनिक जुस्तिन को ‘‘संत जुस्तिन शहीद‘ के रूप में जाना जाने लगा। संत जुस्तिन शहीद को कलीसिया की शुरुआती सदियों से एक संत के रूप में माना जाता रहा है। पूर्वी काथलिक और पूर्वी आर्थोडोक्स ईसाई भी 1 जून को अनका पर्व मनाते हैं।


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