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विवरण: 10 नवंबर

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नवंबर 10

संत लियो महान

संत लियो महान संत पापाओं की श्रेणीयों में एक विशिष्ठ स्थान रखते हैं। वे पहले संत पापा है जिन्हें ’महान’ पदवी प्रदान की गयी। संत लियो का जन्म एक कुलीन रोमन परिवार में हुआ हालॉकि उनकी जन्मतिथि को लेकर कोई निश्चित जानकारी नहीं है। लियो बहुत बुद्धिमान तथा सामंजस्य प्रिय व्यक्ति थे। विवादों का हल शांति, संवाद तथा परस्पर आदरभाव के जरिये निकालने में वे सिद्धस्त थे। उन्हें अनेक विवादों का हल निकालने का कार्यभार सौंपा गया। अपने इस सौम्य स्वाभाव के कारण वे सभी वर्गों के लोगों में लोकप्रिय तथा स्वीकार्य थे। 440 में वे संत पापा के पद के लिये चुने गये।

संत पापा के रूप में अपने कर्तव्यों को निभाने में संत लियो पूर्णरूप से समर्पित थे। वे स्वयं को कृपापात्र समझते थे कि उन्हें संत पेत्रुस की कुर्सी पर बैठने का अवसर मिला। वे घोर परिश्रमी, समर्पित तथा सुलझे हुये प्रशासक भी थे। अपने कायों के कारण उनकी गिनती आज भी प्रशासक के रूप से सर्वश्रेठ संत पापाओं के रूप में होती है।

अपने कार्यकाल में उन्होंने कलीसिया की एकता तथा अखंडता को बचाने के व्यापक कार्य किये। कलीसिया की अधिकारिक शिक्षा के विपरीत फैली सभी छदम् एवं भ्रामक धारणाओं को, विशेषकर ’पलेजियनिसम’ को तर्क, बुद्धि तथा विश्वास के साथ आपने दूर किया। पूर्वी कलीसिया द्वारा येसु की मनुष्यता तथा ईश्वरीयता तथा इस ख्राीस्तीय विश्वास के रहस्य की व्याख्या को लेकर उपजे विवादों तथा अनिश्चिताओं को लेकर एक पत्र लिखा। इस पत्र ने उन सभी भ्रांतियों तथा अनिश्चिताओं को दूर किया। संत लियो का यह पत्र एक विशिष्ठ स्थान रखता है। आज दिन तक सभी इसकी दूरदर्शिता, विवेक, तर्क तथा भाषा की प्रशंसा करते है। इस पत्र ने कलीसिया के एकता को बनाये रखा।

उन्होनें लोगों की देखभाल के लिये परोपकार के कार्यों को अधिक व्यापक तथा संगठनात्मक बनाया। अकाल, गरीबी के शिकार लोगों तथा शरणनार्थियों की मदद के लिये लोगों को प्रेरित किया। उनके अनुसार ख्राीस्तीय होने का अर्थ सिर्फ बुद्धि से ख्राीस्त को अपनाना नहीं बल्कि दुख तथा पीडा से भरी इस दुनिया में लोगों की मदद करते हुये जीना है।

वे प्रभावी प्रवचन देने के लिये भी याद किये जाते हैं। उनके उपदेश उनके धर्मग्रंथ के ज्ञान, कलीसिया के विषय पर स्पष्टता को दर्शाते है। अपने इन सारे गुणों तथा कार्यों के कारण वे सभी संत पापाओं में महान माने जाते हैं।

10 नवम्बर 461 में उनकी मृत्यु हुयी। उनका जीवन एक अनुसंधान का विषय है। उनका जीवन तथा कार्य प्रेरणा का स्रोत तथा आदर्श है। जब कोई ख्राीस्त की सेवा को अपना सबकुछ मान लेता है तो इसी प्रकार एक पवित्र, कर्मठता तथा फलदायक जीवन जीता है।


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