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विवरण: 13 नवंबर

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नवंबर 13

संत फ़्रान्सिस जेवियर काब्रिनी

संत फ़्रान्सिस जेवियर काब्रिनी का जन्म 15 जुलाई 1850 में लोम्बार्डी, इटली में हुआ। उनका स्वास्थ्य जन्म से ही कमजोर रहा। वे अक्सर बीमार रहा करती थी। बचपन से ही उनमें धर्मसंघी जीवन बिताने की इच्छा थी। वे पढाई में काफी होशियार थी। 18 वर्ष की आयु में अपनी पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने धर्मसंघी जीवन बिताने के लिये निवेदन किया। किन्तु उनके खराब स्वास्थ्य को देखते हुये उनको प्रवेश नहीं दिया गया। तब एक पुरोहित ने उनको ’हाउस ऑफ प्रोविडेंस’ नामक अनाथालय में पढाने की सलाह दी। उन्होंने छः वर्षो तक यह कार्य किया इस दौरान उन्होंने कुछ महिलाओं का समुदाय बनाकर धर्मसंघी जैसा जीवन बिताया। 1877 में उन्होंने धर्मसंघी जीवन का व्रत तथा वस्त्र धारण किया तथा धर्मसंघी बन गयी। संत फ्रांसिस जेवियर के आदर में उन्होंने अपने नाम के साथ जेवियर भी जोड लिया। जब यह अनाथालय बंद हो गया तो धर्माध्यक्ष ने उनसे ’मिश्नरी सिस्टर्स आफॅ सेक्रेड हाटॅ’ धर्मसंघ बनाने को कहा जो स्कूलों तथा अस्पतालों में गरीब बच्चों की देखरेख करे। फ्रांसिस ने अपने इस नये धर्मसंघ के नियम तथा विधान बनाये।

शुरूआती वर्षों में धर्मसंघ ने रहने तथा मुफ्त में शिक्षा देने के उददेश्य से अनेक संस्थायें खोली। अमेरिका में बढती जा रही इटली के शरणार्थियों की संख्या को देखते हुये पापा लियो तेहरवें ने उन्हें अमेरिका जाने की सलाह ली। अपनी छः धर्मसंघी बहनों के साथ वे अमेरिका पहुंची। यहॉ उन्हें अनेक परेशानियों का सामना करना पडा। किन्तु ईश्वर में गहरी आस्था तथा नैसर्गिक प्रशासनिक क्षमता के बल पर उन्होंने 35 वर्षों में अनाथालयों, स्कूलों तथा अस्पतालों को मिलाकर 67 संस्थाओं की स्थापना की। फ्रांसिस प्रार्थनामय जीवन बिताती थी तथा हमेशा लोगों को उनकी संस्था के लिये पैसा, समय तथा समर्थन देने को राजी कर लिया करती थी। इतने वर्षों तक अमेरिका में रहने के बाद वे 1909 में अमेरिका की नागरिक बनी। 22 दिसंबर 1977 को उनकी मृत्यु हो गयी। सन् 1946 में पापा पायस बाहरवें ने उन्हें संत घोषित किया।

धर्मग्रंथ कहता है, ’’प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप-रंग देखता है, किन्तु प्रभु हृदय देखता है।’’ (1 समूएल 16:7) ईश्वर ने सचमुच में संत फ्रांसिस के हदय को परखा और उन्हें चुना। वे कमजोर स्वास्थ्य की थी, शुरू में उन्हें धर्मसंघी जीवन के लिये अस्वीकृत किया गया किन्तु इसी अस्वीकृत तथा क्षीण स्वास्थ्य वाली महिला को ईश्वर ने इतना ऊपर उठाया।


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