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विवरण: 18 सितंबर

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सितंबर 18

क्यूपर्तिनो के संत योसेफ

योसेफ इतने असाधारण संत थे कि उनके साथी-ख्रीस्तीय मुश्किल से उनका मुक़ाबला कर पाते थे। सबसे पहले वे भूल जाते थे, यहां तक कि एक बालक के रूप में, अक्सर उनकी गरीब विधवा मां द्वारा तैयार किए गए अल्प भोजन के लिए भी नहीं आते थे। वे इटली के क्यूपर्टिनो गांव में घूमते रहते थे, जहां उनका जन्म हुआ था, अचरज में मुँह खोलकर सब कुछ ताकते रहते थे। उन्हें अकसर सीखने में कठिनाई होती थी और वे बेढ़ंगे माने जाते थे।

जब वे सत्रह वर्ष के हुए तब उन्होंने निश्चय किया कि वे एक निर्जनवासी या तपस्वी बनना चाहते हैं। फ्रांसिस्कन उन्हें प्रवेश नहीं दे रहें थे क्योंकि, उन्होंने कहा, कि वे बहुत मूर्ख थे। कैपुचिनों ने उन्हें आठ महीने बाद ही अपनी मण्डली से बाहर निकाल दिया क्योंकि उन्होंने सब कुछ तोड़ दिया था। आखिरकार ला ग्रोटेला में एक फ्रांसिस्कन मठ ने उन्हें एक अश्वपाल के रूप में स्वीकार कर लिया।

उन्होंने प्रार्थना की और उपवास किया और हर कार्य को पूर्णता से करने की पूरी कोशिश की। आखिरकार प्रसन्न हुए भाइयों ने उन्हें अपनी बिरादरी में से एक के रूप में स्वीकार करने का फैसला किया, और 1628 में उन्हें पुरोहिताभिषेक दिया गया। उस समय के बाद से क्यूपर्तिनो के योसेफ लगातार परमानंद में गुजरते रहते थे, कभी-कभी तो वे जमीन के ऊपर तैरता भी दिखाई देते थे। योसेफ के चमत्कारी व्यवहार के कारण बिना किसी असाधारण रुकावट के मठ में कोई भोजन नहीं किया जा सकता था। पैंतीस वर्षों के लिए समुदाय ने फैसला किया कि उन्हें गायन मण्डली और भोजन कक्ष से बाहर रखा जाना चाहिए।

स्वाभाविक रूप से उनके चमत्कार और उनके अलौकिक उत्तोलन की सभी रिपोर्टों ने मिलने आने वाले अनगिनत जिज्ञासुओं को आकर्षित किया। 1653 में कलीसिया के अधिकारियों ने उन्हें पिएत्रोसा की पहाड़ियों में एक कैपुचिन मठ में स्थानांतरित कर दिया और उन्हें पूरी तरह से लोगों की दृष्टि से दूर रखा। अंत में संत योसेफ को ओसीमा नामक स्थान पर अपने स्वयं के तपस्वी धर्मसंघ में शामिल होने की अनुमति दी गई, लेकिन 1663 में उनकी मृत्यु तक उन्हें फिर भी लोगों की दृष्टि से दूर रखा गया था। यह सब उन्होंने बिना किसी शिकायत के सहन किया। बीसवीं सदी ने इस संत को उपयुक्त रूप से पायलटों और एयरलाइन यात्रियों के संरक्षक बना दिया है।


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