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विवरण: 5 नवंबर

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नवंबर 05

सन्त जकरियस एवं सन्त एलीजबेथ

जकरियस एवं एलीजबेथ योहन बपतिस्ता के माता थे। इन दोनों के बारे में हम संत लूकस के सुसमाचार में पढते है। जकरियस याजक वंश का था वह वह मंदिर में याजक था। वह बुढा हो चला था तथा संतानहीन था। एक दिन जब वह प्रभु के मंदिर में धूप चढा रहा था तो उसे स्वर्गदूत के दर्शन हुये। उसने योहन को बताया कि किस प्रकार उसको पुत्र प्राप्त होगा तथा वह महान व्यक्ति होगा। किन्तु जकरियस के लिये इस पर विश्वास करना कठिन था। इस कारण संतान के जन्म दिन तक स्वर्गदूत उसे मौन कर देते हैं। स्वर्गदूत के बताये अनुसार जकरियस की पत्नी गर्भवती होती है तथा एक पुत्र, योहन को जन्म देती है। हॉलाकि जकरियस याजक था किन्तु उसका विश्वास कमजोर था किन्तु इन सारी घटनाओं ने उसके विश्वास को परिपक्व किया, उसे पुनः बोलने की शक्ति प्राप्त होती है तथा वह भजन गाकर ईश्वर का गुणगान करता है।

एलीजबेथ माता मरियम की कुटुम्बनी थी। उसे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ की उसने येसु के जन्म के पूर्व ही मरियम को धन्य घोषित किया तथा प्रभु की माता के रूप में पहचाना। योहन बपतिस्मा एक महान व्यक्ति थे। उनके महान गुणों के विकास में इनके माता-पिता की परवरिश का योगदान था। वे आदर्श माता-पिता बने तथा योहन को उसी प्रकार बढने दिया जैसा कि स्वर्गदूत ने उन्हें बताया था।

जकरियस और एलीजबेथ साधारण मनुष्य थे किन्तु जब ईश्वर ने उन्हें संतान का महान वरदान प्रदान किया तो उन्होंने उस वरदान को समझा तथा उसे ईश्वर की इच्छाानुसार पूर्णता तक ले गये। हमारे जीवन में ईश्वर अनेक वरदान देते हैं। क्या हम उन वरदानों के प्रति गंभीर, सजग तथा ईमानदार रहते हैं? क्या हम इन दोनों संतों के समान ईश्वर को धन्यवाद देते है। क्या हम ईश्वर को पहचान पाते या फिर उसके कार्यों को समझने का प्रयत्न करते हैं? इनका जीवन हमें सिखाता है कि हमें ईश्वर की उपस्थिति को पहचानना चाहिये तथा उसके मार्गदर्शन में जीवन बिताना चाहिये।


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