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विवरण: 4 फरवरी

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संत योहन ब्रिट्टो

फरवरी 4

जन्म और बुलाहट

योहन दे ब्रिट्टो का जन्म 1 मार्च 1647 में पुर्तुगाल में हुआ। उनके पिताजी का नाम सल्वदोर दे ब्रिट्टो पेरेरा था। बचपन में एक गंभीर बीमारी के शिकार होने पर उनकी माँ ने चंगाई के लिए संत फ्रांसिस ज़ेवियर की मध्यस्थता से प्रार्थना की और यह मन्नत रखी कि चंगा हो जाने पर उनके बेटे को एक साल के लिए येसु समाजी पुरोहितों के वस्त्र पहनायेंगी। ऐसा ही हुआ। योहन दे ब्रिट्टो ठीक हो गये और उन्होंने एक साल तक येसु समाजी पुरोहितों जैसे वस्त्र पहन कर अपनी मन्न्त को पूरा किया। इस घटना का शायद योहन दे ब्रिट्टो पर भी प्रभाव पडा होगा। 15 साल की आयु में दिसंबर 17, सन 1662 में वे येसु समाजी धर्मसमाज में शामिल हुए।

भारत में मिशनरी कार्य

येसु समाजी धर्मसंघ ने योहन दे ब्रिट्टो को भारत भेजने का निर्णय लिया। जब उनकी माता को यह पता चला कि योहन जल्द ही भारत जाने वाले थे, तो उन्होंने उन्हें पुर्तुगाल में ही रोकने की हर संभव कोशिश की। यहाँ तक कि उन्होंने पुर्तुगाल में संत पापा के प्रतिनिधि की मदद भी माँगी। परन्तु योहन का इरादा पक्का था कि ईश्वर उन्हें अब भारत बुला रहे थे और उन्हें उस बुलावे को ठुकराना नहीं चाहिए। सन 1673 में वे मिशनरी के रूप में तमिलनाडु के मदुराई पहुँचे। उन्होंने अपना नाम बदल कर स्थानीय तमिल भाषा में अरुल अनान्त (அருளானந்தர்) नाम अपनाया। सन 1684 में उन्हें कैदी बनाया गया और 1687 में उन्हें देश से निष्कासित किया गया और वे वापस लिस्बन चले गये। राजा पेद्रो द्वितीय ने उन्हें पुर्तुगाल में ही रोकना चाहा, लेकिन वे सन 1690 में अन्य 24 मिशनरियों के साथ भारत वापस आये। योहन दे ब्रिट्टो ने भारतीय संस्कृति को अपनाया तथा वे भारतीय सन्यासियों की तरह वस्त्र पहनने लगे। उन्होंने ख्रीस्तीय ईशशास्त्र तथा शिक्षा को स्थानीय संस्कृति के अनुसार और स्थानीय भाषा में अभिव्यक्त करने की कोशिश की। वे शुध्द शाहाकारी भोजन करते थे। उन्होंने अपना प्रेरिताई कार्य मारवार राज्य में किया। उनके जीवन तथा प्रवचनों से प्रभावित हो कर मारवार राजा तडियातेवन ने बपतिस्मा ग्रहण किया। बपतिस्मा ग्रहण करने पर तडियातेवन को एक ही स्त्री को पत्नी के रूप में स्वीकार कर अन्य सभी स्त्रियों को वापस भेजना पडा। उनमें से एक पडोसी राज्य के राजा की बेटी थी। इस कारण सभी ख्रीस्तीय विश्वासियों के विरुध्द अत्याचार शुरू हुआ। योहन दे ब्रिट्टो और उनके साथियों को राजधानी रामनाद ले जाये गया।

मृत्यु और संत-घोषणा

4 फरवरी 1693 को योहन ब्रिट्टो को मारा डाला गया। अगस्त 21, 1853 को संत पापा पीयुस नौवें ने उन्हें धन्य घोषित किया। जून 22, 1947 को संत पिता पीयुस बारहवें ने उन्हें संत घोषित किया।


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