Lent

धर्मग्रंथ की सहायता से येसु के पुनरूत्थान पर विश्वास

मसीह का पुनरूत्थान मानवीय इतिहास की अविश्वसनीय घटना थी। इस प्रकार किसी मनुष्य का सार्वजनिक तौर पर मर जाना तथा उसका पूर्वघोषित तरीके से तीसरे दिन जी उठना अप्रत्याशित बात थी। हरेक व्यक्ति की इस बात को लेकर अपनी-अपनी धारणा तथा प्रतिक्रिया थी। येसु ने अपने जीवनकाल में ही शिष्यों को अनेक बार अपने दुःखभोग एवं पुनरूत्थान के बारे में आगाह किया था किन्तु शिष्य इस बात को समझने में नाकाम रहे। येसु के गिरफ्तार होते ही वे तितर-बितर हो गये तथा पेत्रुस ने तो उन्हें पहचानने से ही इनकार कर दिया था। येसु के भयावह दुःखभोग एवं दर्दनाक मृत्यु ने उनका मनोबल तोड दिया था। ऐसी मनोदशा में उनका पुनरूत्थान पर विश्वास करना संभव नहीं था। प्रभु के शव को कब्र में नहीं पाये जाने की सूचना सर्वप्रथम मरियम मगदलेना द्वारा पेत्रुस एवं योहन को इस प्रकार दी गयी, “वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।” इस खबर पर पेत्रुस एवं योहन कब्र की ओर दौड पडते हैं। पेत्रुस सर्वप्रथम कब्र के अंदर जाता है और देखता है कि, ”पट्टियाँ पडी हुई हैं। और ईसा के सिर पर जो अँगोछा बँधा था वह पट्टियों के साथ नहीं बल्कि दूसरी जगह तह किया हुआ अलग पडा हुआ है।” इसके बाद योहन कब्र में प्रवेश करता है किन्तु योहन वह दृश्य देखकर विश्वास करता है कि प्रभु सचमुच में जी उठे हैं। मरियम मगदलेना एवं पेत्रुस के विपरीत, योहन ने खाली कब्र को देख कर विश्वास किया कि प्रभु ने जैसा कहा था वैसे ही वे जीवन उठे होंगे।

Lentयोहन के अनुसार अन्यों का पुनरूत्थान में विश्वास न कर पाने का कारण उनका धर्मग्रंथ को नहीं समझ पाना था। शिष्यों को पुनरूत्थान में विश्वास दिलाने के लिए येसु को उन्हें न सिर्फ अपने दर्शन कराने पडे बल्कि उन्हें धर्मग्रंथ के द्वारा भी यह समझाना तथा विश्वास दिलाना पडा। संत लूकस के सुसमाचार में एम्माउस जाने वाले दो शिष्यों को येसु इसी प्रकार समझाते हैं, ”तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो! क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?” तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।” (लूकस 24:25-27) येसु उनको धर्मग्रंथ का हवाला देकर ही अपने पुनरूत्थान की सच्चाई पर विश्वास करना सिखलाते हैं। येसु की यह शैली शिष्यों के लिए प्रभावशाली सिद्ध हुयी तथा वे कह उठे, ”हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!” (लूकस 24:32) बाद में येसु ने प्रेरितों के समूह पर स्वयं को प्रकट किया तथा उनको अपनी शिक्षा का स्मरण दिलाते हुये कहा, ”मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है”। तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया”। (लूकस 24:44-45)

इस प्रकार बाद में अपने प्रेरिताई के कार्यों के दौरान शिष्य भी दूसरों को धर्मग्रंथ की सहायता से येसु के पुनरूत्थान पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। संत पेत्रुस अपने प्रथम प्रेरिताई संबोधन में राजा दाउद के स्तोत्र 16 को आधार बनाते हुये उपस्थित जनसमूह को पुनरूत्थान की सच्चाई से अवगत कराने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं, ”उन्होंने नबी होने के नाते भविष्य में होने वाला मसीह का पुनरूत्थान देखा और इसके विषय में कहा कि, ’वह अधोलोक में नहीं छोडे गये और उनका शरीर गलने नहीं दिया गया।’ ईश्वर ने इन्ही ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है - हम इस बात के साक्षी हैं। अब वह ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं।”(प्रेरित चरित 2:31-33) अन्य स्थानों जैसे प्रेरित चरित 3:22-26; 4:11 पर भी संत पेत्रुस धर्मग्रंथ की व्याख्या द्वारा येसु के पुनरूत्थान को सच तथा ईश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित प्रमाणित करते हैं। संत पौलुस भी कुरिन्थियों के नाम प्रथम पत्र में धर्मग्रंथ के लेखों के द्वारा पुनरूत्थान के सच को प्रतिपादित करते हैं। (1 कुरि. 15:25,27,32,45,54)

धर्मग्रंथ के द्वारा हम भी पुनरूत्थान पर विश्वास करना सीखते हैं। हमने प्रभु को नहीं देखा और न ही हम पुनरूत्थान के प्रत्यक्ष साक्षी हैं किन्तु येसु के पुनरूत्थान पर हमारा विश्वास सच्चा एवं दृढ है। हमें यह विश्वास धर्मग्रंथ के वचनों द्वारा ही प्राप्त होता है। धर्मग्रंथ हमें सिखलाता है कि येसु ही वह प्रतिज्ञात मसीहा है तथा उनका दुःखभोगना तथा पुनरूत्थित होना ईश्वर की इच्छा एवं सामर्थ्य का परिणाम था। धर्मग्रंथ के द्वारा ईश्वर हम से बात करते हैं तथा अपने ईश्वरीय रहस्यों को प्रकट करते हैं। यदि हम धर्मग्रंथ के लेखों को पढते नहीं हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हम ईश्वर और उनके मार्गों के बारे में भी कम ही जानते होंगे। संत पौलुस भी इसी तथ्य को समझाते हुये कहते हैं कि ”...यदि उन्होंने उसके विषय में कभी सुना नहीं, तो उस में विश्वास कैसे कर सकते हैं?..... सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है।” (रोमियों 10:14,17) मसीह में विश्वास करने के लिए धर्मग्रंथ को जानना तथा उसमें विश्वास करना हमारे खीस्तीय विश्वास की धुरी है। विश्वास के लिए यह भी अत्यंत आवश्यक है कि हम वचन को ईश्वर का वचन मानें, ”..... जब आपने ईश्वर का सन्देश सुना और ग्रहण किया, तो आपने उसे मनुष्यों का वचन नहीं बल्कि -जैसा कि वह वास्तव में है- ईश्वर का वचन समझकर स्वीकार किया और यह वचन अब आप विश्वासियों में क्रियाशील है।” (1 थेसलनीकियों. 2:13) इस विश्वास के साथ वचन को ग्रहण करना हमें पुनरूत्थान में विश्वास की ओर ले जाता है। पवित्र आत्मा हमें वचन को समझने तथा उसमें विश्वास करने की ओर ले जाता है। आज येसु अपने वचन के द्वारा हमें पुनरूत्थान में विश्वास करने का निमंत्रण देते हैं। जब हम उनके इस संदेश को पूर्ण भक्ति एवं विश्वास के साथ ग्रहण करते हैं तो पुनरूत्थान की यह घटना हमारे लिए जीवंत घटना बन जाती है तथा हम भी यह कह सकते हैं, ”मैंने प्रभु को देखा है और उन्होंने मुझे यह संदेश दिया।” (योहन 20:18)

-फादर रोनाल्ड वाँन