माता मरियम की आज्ञाकारिता

ईश्वर ने आदम और हेवा को सबकुछ प्रदान किया तथा उन्हें केवल एक ही आज्ञा देकर कहा, ’’इस वृक्ष का फल नहीं खाना।’’ लेकिन आदम और हेवा को शायद वही करना अच्छा लगा जिसके लिए उन्हें मना किया गया था। उन्होंने ईश्वर की एकमात्र आज्ञा का उल्लंघन कर उस फल को खाया। मनुष्य के पाप बढते गये इसके फलस्वरूप वे ईश्वर की कृपा से वंचित रह जाते थे। ईश्वर ने मूसा के द्वारा उन्हें दस आज्ञाएं प्रदान की। इन दस आज्ञाओं को लेकर ढेर सारे नियमों का ढांचा दिया गया जिसे ’संहिता’ कहते हैं। लेकिन इन सब के बावजूद भी पाप नहीं रूके बल्कि बढते ही गये। यहॉ तक की नूह, इब्राहिम, याकूब, दाउद तथा अन्य चुने हुये लोगों के जीवन में भी पाप प्रवेश करता है।

मनुष्य के पाप करने का कारण उसका विद्रोही स्वाभाव था जो अवज्ञा में प्रदर्शित होता है। माता मरियम में हम एक ऐसे मनुष्य को देखते हैं जिन्होंने आज्ञापालन का अनुपम एवं आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर ईश्वर की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। जब स्वर्गदूत ने मरियम को येसु के जन्म के बारे में बताया तो वे स्वाभाविक तौर पर डर गयी होगी। उनका मन भी आने वाले कल से भयभीत हो गया होगा क्योंकि किसी कुँवारी का इस प्रकार गर्भवती होना अनसुनी बात थी। उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार उन्हें सार्वजनिक रूप से पत्थरों से मारा भी जा सकता था। किन्तु मरियम ने ईश्वर की योजना का विरोध नहीं किया बल्कि स्वर्गदूत से केवल यह कहकर स्पष्टीकरण मांगा कि, ’’यह कैसे हो सकता है...’’ (लूकस 1:34) स्वर्गदूत से आश्वासन पाकर वे स्वयं को प्रभु की दासी के रूप में प्रस्तुत करते हुये कहती हैं, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाए।’’ (लूकस 1:38) मरियम का स्वयं को दासी कहकर संबोधित करने में गहरा अर्थ है। यह संबोधन उनके विश्वास की अभिव्यक्ति था। दास/सेवक का मुख्य कार्य आज्ञापालन होता है। दास/दासी की अपनी कोई व्यक्तिगत राय नहीं होती। वह तो केवल मालिक के आदेशों का पालन करना जानता है। वह आदेश-पालन में इतना रम जाता है कि उसे अपनी सुविधा की सुधबुध नहीं रहती। अपने भावों को दासी के समान बनाते हुए वे कहती हैं, ’’आपका कथन मुझ में पूरा हो जाए।’’

मरियम अपने स्तुतिगान में भी स्वयं को दासी कहकर पुकारते हुये कहती हैं, ’’उसने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है।....और दीनों को महान बना दिया है।’’(लूकस 1:48,52) मरियम ने सारी जिंदगी अपने इस दासी के भाव को बनाये रखा। काना के विवाह समारोह में जब येसु ने उनके निवेदन पर यह विचित्र प्रतिक्रिया दी, ’’भद्रे! इससे मुझ को और आप को क्या? अभी तक मेरा समय नहीं आया है।’’ तब मरियम ने दासी का भाव अपनाते हुये सेवकों से येसु का कहना मानने को कहा, ’’वे तुम लोगों से जो कहें, वही करना।’’ (योहन 2:4-5) येसु के दुःखभोग के दौरान एवंकलवारी पर क्रूसमरण तक वे धैर्य एवं विनम्रता के साथ ईश्वर की इच्छा के पूरे होने का इंतजार करती रही। धर्मग्रंथ हमें सिखाता है कि सेवक का भाव धारण करना अत्यंत आवश्यक है तथा यह ईश्वर को अति प्रिय है। येसु ने दास का मनोभाव धारणकर पिता के आज्ञाकारी पुत्र के रूप में हमारे सामने आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। फिलिप्पियों के नाम पत्र में संत पौलुस मसीह को भी ईश्वर का विनम्र, दीन-हीन दास बताते हैं, ’’उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बनकर अपने को दीन-हीन बना लिया।’’ (फिलिप्पियों 2:7) नबी इसायाह भी मसीह का ईश्वर का सेवक कहकर परिचय कराते हुए करते हैं, ’’देखो! मेरा सेवक फलेगा-फूलेगा’’ (इसायाह 52:13) येसु भी शिष्यों को अनेक बार सेवक एवं सेवा करने का उदाहरण देते हैं। एक दास का मनोभावा कैसा होना चाहिये इस बात को दृष्टांत द्वारा बताते हुये येसु कहते हैं कि, ’’तुम भी ऐसे ही हो। सभी आज्ञाओं का पालन करने के बाद तुम को कहना चाहिए, ‘हम अयोग्य सेवक भर हैं, हमने अपना कर्तव्य मात्र पूरा किया है’।’’ (लूकस 17:10)

दास का मनोभाव धारण करने से हमें जीवन में तकलीफों का सामना भी करना पडता है। जब हम अपने जीवन में आज्ञापालन के बारे में सोचते हैं तो शायद मन में उत्साहित होते हैं किन्तु जीवन की विषम तथा वास्तविक परिस्थितियों में हम दुविधा में पडकर आसान रास्ता खोजने लगते हैं। येसु बीजों के दृष्टांत के द्वारा यही शिक्षा देते हैं, ’’जो पथरीली भूमि मे बोया गया है, यह वह है, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करता है, परन्तु उस में जड़ नहीं है, और वह थोड़े ही दिन दृढ़ रहता है। वचन के कारण संकट या अत्याचार आ पड़ने पर वह तुरन्त विचलित हो जाता है।’’ (मŸाी 13:20-21) हमें अपने जीवन के सुख-दुख में भी ईश्वर के आज्ञानुसार व्यवहार करने में दृढ़ बने रहना चाहिए। आज्ञापालन की विशेषता यह है कि इससे जीवन में तकलीफ होती है। आज्ञापालन के कारण आने वाली तकलीफों के कारण अनेक लोग विचलित हो जाते हैं। मरियम के जीवन में आज्ञापालन के कारण अनेक तकलीफें आयी। किन्तु वे अडिग बनी रही। येसु को जन्म देने के लिए उन्हें जगह नहीं मिली इसकारण उन्हें चरनी में ही उन्हें जन्म देना पडता है। येसु के जन्म के बाद भी उनका परिवार स्थायी तौर पर बस नहीं पाता है। उन्हें जोसफ के साथ मिस्र भागना पडता है। इसके बाद उन्हें गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में बसना पडता है। (मत्ती 2:22) बालक येसु को लेकर भी नबी सिमयोन की भविष्यवाणी उन्हें अचम्भे में पड गये क्योंकि वे शायद उसका अर्थ पूरी तरह से नहीं समझ सकी थी। अनुमानित तौर पर यूसुफ की मृत्यु येसु के सार्वजनिक जीवन शुरू होने के पूर्व ही हो गयी थी, इसके बाद वे एक विधवा बनकर अकेली ही येसु के साथ बनी रही। येसु के दुखःभोग एवं क्रूसमरण की वे साक्षी बनी। अपने पुत्र का दुख एवं मृत्यु किसी भी मॉ के लिए सबसे बडी वेदना होती है। मॉ मरियम इसका अपवाद नहीं थी। किन्तु वे ईश्वर की दासी के रूप में धैर्य के साथ सबकुछ देखती और सुनती रही।

इस प्रकार हम देखते हैं कि आज्ञापालन में बहुत तकलीफों का सामना करना पडता है किन्तु जो अंत तक धीर बना रहता है वही मुक्ति पाता है। मरियम का आज्ञापालन यही समाप्त नहीं होता है यह प्रकिया येसु के स्वर्गारोहण के बाद भी बनी रहती है। येसु के इस निर्देश, ’’मेरे पिता ने जिस वरदान की प्रतिज्ञा की है, उसे मैं तुम्हारे पास भेजॅूगा। इसलिए तुम लोग शहर में तक तक बने रहो, जब तक ऊपर की शक्ति से सम्पन्न न हो जाओ’’ (लूकस 24:49) का पालन करते हुए वे शिष्यों एवं अन्यों के साथ प्रार्थना में प्रतीक्षारत रहती है। ’’ये सब एकहृदय होकर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।’’ (प्रेरित चरित 1:14) हेवा ने शैतान की बात मानकर ईश्वर द्वारा निषिद्ध फल खाया तथा आदम को भी दिया किन्तु मरियम ने स्वयं को दासी मानकर जीवनपर्यन्त आज्ञापालन किया तथा येस को ऐसा करना सिखलाया। आज्ञापालन की महत्ता को समझाते हुए नबी समूएल राजा साउल से कहते हैं, ’’क्या होम और बलिदान प्रभु को इतने प्रिय होते हैं, जितना उसके आदेश का पालन? नहीं! आज्ञापालन बलिदान से कहीं अधिक उत्तम है और आत्मसमर्पण भेड़ों की चरबी से बढ़ कर है।’’ (1 समूएल 15:22) इब्रानियों के नाम पत्र हमें हमें यह बताता है कि प्रथम आदम ने आज्ञाउल्लंघन किया जबकि द्वितीय आदम येसु मसीह पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए ही इस दुनिया में आते हैं। ’’इसलिए मसीह ने संसार में आ कर यह कहा, तूने न तो यज्ञ चाहा और न चढ़ावा, बल्कि तूने मेरे लिए एक शरीर तैयार किया है।तू न तो होम से प्रसन्न हुआ और न प्रायश्चित्त के बलिदान से; इसलिए मैंने कहा - ईश्वर! मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ, जैसा कि धर्मग्रन्थ में मेरे विषय में लिखा हुआ है। (इब्रानियों 10:5-7)

-फ़ादर रोनाल्ड वॉन