Lent

चालीसा काल - ईश्वर को खोजने का समय

चालीसा काल ईश्वर को खोजने का समय है। स्तोत्तकार कहता है, “ईश्वर यह जानने के लिए स्वर्ग से मनुष्यों पर दृष्टि दौड़ाता है कि उन में कोई बुद्धिमान हो, जो ईश्वर की खोज में लगा रहता हो”(स्तोत्र 53:3)।” नबी आमोस कहते हैं, “प्रभु-ईश्वर इस्राएल के घराने से यह कहता हैः “मुझ को ढूँढो और तुम जीवित रहोगे” (आमोस 5:4) “जीवित रहने के लिए प्रभु-ईश्वर को ही ढूँढो” (आमोस 5:6)।”

ईश्वर को खोजने वालों में इश्वर नवजीवन का संचार करते हैं। “तुम, जो ईश्वर की खोज में लगे रहते हो, तुम्हारे हृदय में नवजीवन का संचार हो; क्योंकि प्रभु दरिद्रों की पुकार सुनता है, वह अपनी पराधीन प्रजा का परित्याग नहीं करता।” (स्तोत्र 69:33-34) प्रभु को खोजने वालों पर ईश्वर अपने आप को प्रकट करते हैं और कभी वे उनका परित्याग नहीं करते हैं। “प्रभु! जो तेरा नाम जानते हैं, वे तुझ पर भरोसा रखें; क्योंकि तू उन लोगों का परित्याग नहीं करता, जो तेरी खोज में लगे रहते हैं” (स्तोत्र 9:11)

प्रभु को खोजने वालों को प्रभु बहुत-सी प्रतिज्ञाएं देते हैं। विधि-विवरण 4:29-31 में प्रभु कहते हैं, “यदि तुम वहाँ प्रभु, अपने ईश्वर से फिर मिलना चाहोगे तो वह तुम्हें तभी मिलेगा, जब तुम उसे सारे मन और सारी आत्मा से ढूँढ़ोगे। जब तुम कष्ट से पीड़ित होगे और जब भविष्य में ये सब विपत्तियाँ तुम को अक्रान्त करेगी, तब तुम फिर प्रभु, अपने ईश्वर की ओर अभिमुख हो जाओगे और उसकी आज्ञा का पालन करने लगोगे। इसका कारण यह है कि प्रभु, तुम्हारा ईश्वर एक करूणामय ईश्वर है। वह न तो तुम को त्यागेगा, न तुम्हारा विनाश करेगा और न वह विधान भूलेगा, जिसे उसने शपथ खा कर तुम्हारे पूर्वजों के लिए निर्धारित किया है।“ यिरमियाह 29:13-14 में प्रभु कहते हैं, “यदि तुम मुझे सम्पूर्ण हृदय से ढूँढ़ोगे, तो मैं तुम्हे मिल जाऊँगा“- यह प्रभु की वाणी है- “और मैं तुम्हारा भाग्य पलट दूँगा। मैं तुम्हें उन सब राष्ट्रों और उन सब स्थानों से, जहाँ मैंने तुम्हें निर्वासित कर दिया है, यहाँ फिर एकत्रित करूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है। “मैं तुम्हें फिर उसी जगह ले आऊँगा, जहाँ से मैंने तुम्हें निर्वासित कर दिया था।''

प्रभु येसु स्वयं कहते हैं, “तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें, तुम्हें यों ही मिल जायेंगी।“ (मत्ती 6:33)”

“मरियम मगदलेना ईश्वर को खोजने वालों का प्रतीक है। योहन 20:1-2 में बताया गया है कि “मरियम मगदलेना सप्ताह के प्रथम दिन, तडके मुँह अँधेरे ही कब्र के पास पहुँची”। वहाँ येसु का शरीर न पाने पर उन्होंने सिमोन पेत्रुस तथा उस दूसरे शिष्य के पास, जिसे ईसा प्यार करते थे, दौडती हुई आकर कहा, “वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।“ योहन 20:11 बताता है कि “मरियम कब्र के पास, बाहर रोती रही”। इसी कारण प्रभु येसु ने अपने पुनरुत्थान के बाद सब से पहले उन्हीं को दर्शन दिया था। मारकुस 16:9 में हम पढ़ते हैम, “ईसा सप्ताह के प्रथम दिन प्रातः जी उठे। वे पहले मरियम मगदलेना को, जिस से उन्होंने सात अपदूतों को निकाला था, दिखाई दिये”।”

इसलिए स्तोत्रकार हम सब को निमंत्रण देता है, “परख कर देखो कि प्रभु कितना भला है। धन्य है वह, जो उसकी शरण जाता है! प्रभु-भक्तों! प्रभु पर श्रद्धा रखो! श्रद्धालु भक्तों को किसी बात की कमी नहीं। धनी लोग दरिद्र बन कर भूखे रहते हैं, प्रभु की खोज में लगे रहने वालों का घर भरा-पूरा है।” (स्तोत्र 34:9-11)

आइए हम स्तोत्रकार के साथ गायें, “ईश्वर! जैसे हरिणी जलधारा के लिए तरसती है, वैसे मेरी आत्मा तेरे लिए तरसती है, मेरी आत्मा ईश्वर की, जीवन्त ईश्वर की प्यासी है। मैं कब जा कर ईश्वर के दर्शन करूँगा? (स्तोत्र 42:1-3) “ईश्वर! तू ही मेरा ईश्वर है! मैं तुझे ढूँढ़ता रहता हूँ। मेरी आत्मा तेरे लिए प्यासी है। जल के लिए सूखी सन्तप्त भूमि की तरह, मैं तेरे दर्शनों के लिए तरसता हूँ। मैंने तेरे मंदिर में तेरे दर्शन किये, मैंने तेरा सामर्थ्य और तेरी महिमा देखी है। तेरी सत्यप्रतिज्ञता प्राणों से भी अधिक प्यारी है। मेरा कण्ठ तेरी स्तुति करता था। मैं जीवन भर तुझे धन्य कहूँगा और तुझ से करबद्ध प्रार्थना करता रहूँगा। मेरी आत्मा मानों उत्तम व्यंजनों से तृप्त होगी; मैं उल्लसित हो कर तेरी स्तुति करूँगा। मैं अपनी शय्या पर भी तुझे याद करता हूँ; मैं रात भर तेरा मनन करता हूँ। तू सदा मेरा सहारा रहा है; मैं तेरे पंखों की छाया में सुखी हूँ। मेरी आत्मा तुझे में आसक्त रहती है; तेरा दाहिना हाथ मुझे सँभालता रहता है। जो मेरे प्राणों के गाहक हैं, उनका विनाश हो; वे अधोलोक जायें। वे तलवार के घाट उतारे जाये; वे गीदड़ों का आहार बनें। राजा प्रभु के कारण आनन्दित होंगे। जो ईश्वर की शपथ खाता है, वह अपने को धन्य समझेगा, जब कि मिथ्यावादियों का मुख बन्द रहेगा।” (स्तोत्र 63)

-फादर फ़्रांसिस स्करिया