जनवरी 13

संत हिलेरी, धर्माध्यक्ष और धर्माचार्य

फ्रांस के पॉटिए शहर में हिलारी का जन्म तीसरी सदी के अन्त में या चौथी सदी की शुरूआत में हुआ। उनके माता-पिता गैरईसाई थे। उन्हें बचपन से ही अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई, यहाँ तक भी कि पश्चिम रहते हुए भी उन्होंने यूनानी भाषा का भी अध्ययन किया। वे जीवन का अर्थ समझना चाहते थे। कई समकालीन लोगों ने उन्हें अपनी मानवीय इच्छाओं की तृप्ति कर अपने जीवन में सफलता पाने की सलाह दी। लेकिन उन्हें हमेशा यह लगता था कि केवल अपनी इच्छाओं की तृप्ति करना जानवर का जीवन। मनुष्य जानवरों से भिन्न है और उसे अपनी इच्छाओं से ऊपर उठ कर मूल्यों पर आधारित जीवन बिताना चाहिए। मानव जीवन की खोज ने उसे ख्रीस्तीय विश्वास तक पहुँचाया। उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी के साथ ख्रीस्तीय धर्म को अपनाया। पॉटिए के लोगों ने हिलारी का इतना आदर किया कि उन्होंने सन्‍ 350 या 353 में सर्वसहमति से उन्हें धर्माधक्ष चुना। उन्होंने अरियसवाद को हराने हेतु हर संभव प्रयास किया।

अरियसवाद दुनिया में प्रबल रूप धारण कर रहा था और उसे सम्राट का भी समर्थन प्राप्त था। इसी कारण जो अरियसवाद के विरोध कर रहे थे, उन्हें अत्याचारों का सामना करना पड़ा। इस सिलसिले में अथनासियुस की निन्दा करने से इनकार किया। इस पर हिलारी को सन्‍ 356 में निर्वासित किया गया। निर्वासित किये जाने पर उन्होंने कहा, “हलाँकि मैं निर्वासित हूँ, किताबों के द्वारा बोलूँगा; ईशवचन को बन्दी नहीं बनाया जा सकता, वह स्वतन्त्रता से चलता रहेगा”। उन्होंने किताबें लिखना शुरू किया – पावन त्रित्व पर उन्होंने बहुत लिखा। इसके अलावा उन्होंने मत्ती के सुसमाचार तथा स्त्रोत्र ग्रन्थ पर आधारित रचनाएँ भी की। तीन साल के निर्वासन के बाद सम्राट ने उन्हें वापस आने दिया, परन्तु वे मिस्र तथा इटली से होकर अरियसवाद के विरुध्द शिक्षा देते हुए वापस अपना देश लौटे। उन्होंने कई भक्ति-गीतों की भी रचना की। उनका यह प्रयास था कि लोग धर्म की सच्चाइयों को जाने, माने और हृदय से ग्रहण करें। सन्‍ 367 या 368 में हिलारी की मृत्यु हुई और सन्‍ 1851 में कलीसिया ने उन्हें विद्वान घोषित किया। हिलारी “अरियसवादियों की हथौड़ी” और “पश्चिम के अथानासियुस” के नामों से भी जाने जाते हैं।


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