फरवरी 9

जोसेफीना बखिता

सन् 1869 में सुडान के दारफूर क्षेत्र के एक छोटे से गाँव में जोसेफीना का जन्म हुआ। खेत में अपने परिवारवालों के साथ काम करते समय उनका अपहारण किया गया तथा गुलाम के रूप में वे बेची गयी। अपहारणकर्ताओं ने उनसे अपना नाम जानना चाहा परन्तु डर के मारे न बोल पाने पर उन्होंने उनका नाम बखिता रखा। अरबी भाषा में बखिता का मतलब है भाग्यवती। उनके मालिकों ने उनको बहुत प्रताडित किया। एक बार उनकी मालकिन ने उसको चाकू से उसके शरीर में 114 घाव बनाये तथा इन घावों पर नमक डालकर उनकी यंत्रणाओं को असहनीय बनाया। उन्होंने इन सब यंत्रणाओं को धीरज के साथ स्वीकार किया। उनके हदय में ईश्वर पर भरोसा था हालॉकि उन्होंने तब तक ख्रीस्त को नहीं जाना था। पाँच बार बेचे जाने के बाद सूडान में तैनात इटली के वाणिज्यदूत कालिस्तो बेन्जानी ने उसे खरीद लिया। दो साल बाद उन लोगों ने बखिता को इटली में अगुस्तो मिखिएली नामक परिचित के यहाँ काम करने के लिये भेज दिया।

अगुस्तो ने वेनीस में कैनीसियानी धर्मबहनों के द्वारा संचालित पाठशाला में बखिता को अपनी बेटी के साथ उसकी देखभाल के लिये भेजा। बखिता कलीसिया की ओर आकर्षित हुयी और उन्होंने बपतिस्मा ग्रहण किया तथा जोसेफीना मार्गरेट नाम स्वीकार किया। मिखिएली अपनी बेटी के साथ जोसेफीना को सुडान वापस भेजना चाहती थी। परन्तु जोसेफीना ने सुडान लौटने से इंकार कर दिया। मामला कचहरी तक पहुँच गया और कचहरी में यह फैसला सुनाया गया कि जोसेफीना आजाद है और उस पर सुडान भेजने के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता। इस प्रकार जोसेफीना इटली में रह गयी और 1893 में कैनीसियानी धर्मसमाज में शामिल होने का निर्णय लिया। सन् 1896 में उन्होंने धर्मसंघीय व्रतधारण किया। उनके अधिकारियों ने उन्हें उत्तर इटली भेज दिया जहाँ उन्होंने अपना जीवन लोगों की सेवा तथा धार्मिक शिक्षा देते हुए बिताया।

जोसेफीना अपनी मुस्कुराहट, सौम्यता तथा पवित्रता के लिये जानी जाती थी। उन्होंने यहाँ तक कहा, ’’अगर मेरी मुलाकात मेरे अपहारणकत्ताओं या अत्याचारियों से होती, मैं घुटने टेककर उनके हाथों का चुम्बन करती क्योंकि उन्हीं के कारण मैं ख्रीस्तीय बन गयी हूँ और धर्मबहन भी’’।

उम्र के साथ-साथ जोसेफीना का शरीर भी क्षीण हो रहा था तथा वे बीमार होने लगी थी। लेकिन शारीरीक दर्द के बावजूद भी उनके शांत तथा सौम्य व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। माता मरियम के प्रति उनमें अदम्य भक्ति थी। 8 फरवरी 1947 को माता मरियम को पुकार कर स्कियो में स्थित कैनीसियानी मठ में उन्होंने ने अतिंम श्वास ली। 17 मई 1992 को वे धन्य घोषित हुई तथा 1 अक्टुबर 2000 को संत घोषित की गयी।


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