दिसंबर 15 - संत मरियम दी रोसा

सैन्य अस्पताल के किलेबंद दरवाजे पर जोरदार धमाकों से हर दिल दहशत में आ गया। 1848 में ब्रेशिया (इटली) में युद्ध के बीच में, घायल, बीमार और उनकी देखभाल करने वाले जानते थे कि उस प्रहार का क्या मतलब है। दरवाजे के बाहर से सिपाहियों की ओर से चीख-पुकार मच गई, किसी भी आदेश का पालन नहीं किया गया, बल्कि उनकी आंतरिक इच्छा का जो नष्ट करने और लूटने की इच्छा थी।

उन्हें रोकने के लिए कौन कुछ कर सकता था? यहां केवल कुछ धर्मबहनों, हेंडमिड्स ऑफ चौरिटी थे, जिन्होंने खुद को बीमारों की मदद करने के लिए समर्पित कर दिया। डॉक्टरों ने उन्हें वहां चाहा भी नहीं था। डॉक्टर ऐसे चिकित्सकीय लोग चाहते थे जो धर्मनिरपेक्ष और सैन्य हों, न कि धर्मबहने। और इस नए खतरे के सामने वे और भी बेकार थे! बेकार से भी बदतर - क्योंकि वह पाउला (जैसा कि वह जानी जाती थी) दी रोसा वास्तव में दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ रही थी!

जब दरवाजा पूरा खुल गया, तो सैनिकों ने पाउला दी रोसा द्वारा हाथ में उठाए गए एक महान क्रूस एवं छह में से दो बहनों द्वारा, जो उनके पास खड़ी थी, जिन्होंने दो मोमबत्तियां पकड़ी थी, अपना रास्ता अवरोधित देखा। अचानक नष्ट करने का उनका उन्माद गायब हो गया, और साहस और विश्वास के इस प्रदर्शन से शर्म से भरे हुए, वे वापस अंधकार में लिप्त हो गए।

अपने पूरे जीवन में, पाउला दी रोसा कभी भी ईश्वर की सेवा करने के एक नए अवसर का द्वार खोलने से नहीं डरती थी, खासकर जब वह इस बात से अनिश्चित थी कि आगे क्या होगा। जो लोग उन्हें अच्छी तरह से नहीं जानते थे, उन्होंने सोचा होगा कि वह इन उपक्रमों के लिए बहुत कमजोर और नाजुक थी, लेकिन वह न केवल अपने विश्वास के साथ लैस होकर आई थी बल्कि असीम ऊर्जा, बुद्धि और सेवा करने की भूख से भी।

1813 में जन्मी, उन्होंने सत्रह साल की उम्र से ही बड़ी परियोजनाओं को निपटाया था, अपने पल्ली के लिए रिट्रीट और विशेष मिशन की व्यवस्था की और एक महिला गिल्ड की स्थापना की।

जब वह केवल चौबीस वर्ष की थी, तो उन्हें गरीब लड़कियों के लिए एक कार्यगृह का पर्यवेक्षक बनने के लिए कहा गया था। दो साल बाद, वह चिंतित हो गई क्योंकि दिन के अंत में लड़कियों के जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। रात इन लड़कियों के लिए विशेष खतरे रखती थी और पाउला उन्हें रहने के लिए एक सुरक्षित जगह देना चाहती थी। ट्रस्टियों ने वह जगह देने से इनकार कर दिया।

पाउला के लिए चुनाव आसान था - उन्होंने एक बार कहा था कि अगर वह कुछ अच्छा करने का मौका चूक जाती तो वह कभी भी स्पष्ट अंतःकरण के साथ विश्राम करने नहीं जा सकती। इसलिए उन्होंने गरीब लड़कियों के लिए एक बोर्डिंग गृह स्थापित करने के लिए कार्यगृह छोड़ दिया, जबकि वह अपने भाई को बधिरों के लिए एक स्कूल के साथ मदद कर ही रही थी।

27 साल की उम्र में वह दूसरे दरवाजे के सामने खड़ी हो गई। उन्हें हेंडमिड्स ऑफ चौरिटी, एक धार्मिक समाज में अधिकारी नियुक्त किया गया था, जिसका उद्देश्य अस्पतालों में पीड़ितों के लिए अपना सारा समय और ध्यान समर्पित करना था। अपने दोस्तों गैब्रिएला बोर्नती और मोनसिग्नोर पिंजोनी के साथ, उन्होंने उन लोगों का सम्मान जीता जो इन ‘‘दासियों‘‘ को घुसपैठियों के रूप में सोचते थे।

फिर 1848 में उनका पूरा जीवन बिखरता नजर आया। पहले उन्होंने गैब्रिएला को खो दिया और फिर मोनसिग्नोर पिंजोनी की मृत्यु हो गई, उन्हें बिना समर्थन और दोस्ती के छोड़ दिया, जिस पर वह निर्भर हो गयी थी। यूरोप में युद्ध शुरू हुआ और उसकी मातृभूमि पर आक्रमण किया गया। इस तरह के दुःख और उथल-पुथल का सामना करते हुए, कई अन्य लोग शायद बिस्तर के अंदर दुबक कर अपने सिर पर चादर डाल कर छिप जाते। लेकिन पाउला ने हमेशा अपने रास्ते में आने वाली हर चीज में अवसर देखा था। युद्ध का मतलब था कि कई लोग युद्ध से घायल और विस्थापित हो जाएंगे, इसलिए वह और उसकी बहनें एक सैन्य अस्पताल में काम करने गईं और यहां तक कि युद्ध के मैदान में घायल और मरने वालों को आध्यात्मिक और शारीरिक आराम देने के लिए भी गईं।

उनका जीवन 1855 में समाप्त हुआ, अंतिम दरवाजे से गुजरते हुए, बेखौफ और खुश हमेशा के लिए अपने ईश्वर से मिलने के लिए।


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