16 फरवरी, 2024

राख-बुधवार के बाद का शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : इसायाह 58:1-9

1) प्रभु-ईश्वर यह कहता है, “पूरी शक्ति से पुकारो, तुरही की तरह अपनी आवाज़ ऊँची करो- मेरी प्रजा को उसके अपराध और याकूब के वंश को उसके पाप सुनाओ।

2) वे मुझे प्रतिदिन ढूँढ़ते हैं और मेरे मार्ग जानना चाहते हैं। एक ऐसे राष्ट्र की तरह, जिसने धर्म का पालन किया हो और अपने ईश्वर की संहिता नहीं भुलायी हो, वे मुझ से सही निर्णय की आशा करते और ईश्वर का सान्निध्य चाहते हैं।

3 (वे कहते हैं) , ’हम उपवास क्यों करते हैं, जब तू देखता भी नहीं? हम तपस्या क्यों करते हैं, जब तू ध्यान भी नहीं देता। देखो, उपवास के दिनों में तुम अपना कारबार करते और अपने सब मजदूरों से कठोर परिश्रम लेते हो।

4) तुम उपवास के दिनों लड़ाई-झगड़ा करते और करारे मुक्के मारते हो। तुम आजकल जो उपवास करते हो, उस से स्वर्ग में तुम्हारी सुनवाई नहीं होगी।

5) क्या मैं इस प्रकार का उपवास, ऐसी तपस्या का दिन चाहता हूँ, जिस में मनुष्य सरकण्डे की तरह अपना सिर झुकाये और टाट तथा राख पर लेट जाये? क्या तुम इसे उपवास और ईश्वर का सुग्राह्î दिवस कहते हो?

6) मैं जो उपवास चाहता हूँ, वह इस प्रकार है- अन्याय की बेड़ियों को तोड़ना, जूए के बन्धन खोलना, पददलितों को मुक्त करना और हर प्रकार की गुलामी समाप्त करना।

7) अपनी रोटी भूखों के साथ खाना, बेघर दरिद्रों को अपने यहाँ ठहराना। जो नंगा है, उसे कपड़े पहनाना और अपने भाई से मुँह नहीं मोड़ना।

8) तब तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी और तुम्हारा घाव शीघ्र ही भर जायेगा। तुम्हारी धार्मिकता तुम्हारे आगे-आगे चलेगी और ईश्वर की महिमा तुम्हारे पीछे-पीछे आती रहेगी।

9) यदि तुम पुकारोगे, तो ईश्वर उत्तर देगा। यदि तुम दुहाई दोगे, तो वह कहेगा-‘देखो, मैं प्रस्तुत हूँ‘। यदि तुम अपने बीच से अत्याचार दूर करोगे, किसी पर अभियोग नहीं लगाओगे और किसी की निन्दा नहीं करोगे;

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 9:14-15

14) इसके बाद योहन के शिष्य आये और यह बोले, "हम और फरीसी उपवास किया करते हैं। आपके शिष्य ऐसा क्यों नहीं करते?"

15) ईसा ने उन से कहा, "जब तक दूल्हा साथ है, क्या बाराती शोक मना सकते हैं? किन्तु वे दिन आयेंगे, जब दुल्हा उन से बिछुड़ जायेगा। उन दिनों वे उपवास करेंगे।

📚 मनन-चिंतन

जैसे ही हम इस पवित्र उपवास के मौसम में हैं, आइए हम मत्ती 9:14-15 में येसु के शब्दों पर चिंतन करें। योहन के शिष्य येसु के पास आए यह पूछते हुए कि उनके शिष्य उनके और फरीसियों की तरह उपवास क्यों नहीं करते थे। उत्तर में, येसु ने उपवास के लिए एक समय के बारे में बात की, लेकिन ज़ोर दिया कि जब तक वह, दूल्हा, उनके साथ था, तब तक उसके शिष्यों के लिए उपवास करने का समय नहीं था। इन शब्दों में, येसु हमें वर्तमान क्षण के महत्व को समझने का निमंत्रण देते हैं। चालीसा उपवास, प्रार्थना, और पश्चाताप का समय है, लेकिन यह हमारे बीच ईश्वर की उपस्थिति को पहचानने का भी एक समय है। येसु, दूल्हा, हमारे साथ हैं, और यह आनंद और उत्सव का एक समय है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उपवास का महत्व कम हो जाता है। बल्कि, यह हमारा ध्यान पुनर्निर्देशित करता है। चालीसे के दौरान उपवास मसीह की उपस्थिति में होने के गहरे आनंद का एक जवाब बन जाता है। यह एक साधारण रीति नहीं है, बल्कि उसके प्रेम की परिवर्तनशील शक्ति के लिए हमारे दिलों को खोलने का एक तरीका है। तो, जैसे ही हम इस उपवास की यात्रा पर निकलते हैं, आइए हम उद्देश्य के साथ उपवास करें, ईमानदारी के साथ प्रार्थना करें, और एक दुखी दिल के साथ पश्चाताप करें। हमारे कार्यों को मसीह की उपस्थिति के आनंद में जड़ा होने दें, जो हमें उसके साथ एक गहरे संबंध की ओर ले जाएं। यह उपवास एक गहरे आध्यात्मिक विकास का समय हो, जब हम ईस्टर के शानदार उत्सव का इंतजार करते हैं।

- फादर पॉल राज (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

As we are in this sacred season of Lent, let us reflect on the words of Jesus in Matthew 9:14-15. The disciples of John came to Him, asking why His disciples did not fast as they and the Pharisees did. In response, Jesus spoke of a time for fasting but emphasized that while He, the bridegroom, was with them, it was not the time for His disciples to fast.

In these words, Jesus invites us to understand the significance of the present moment. Lent is a time of fasting, prayer, and repentance, but it’s also a time to recognize the presence of the Divine among us. Jesus, the bridegroom, is with us, and this is a time for joy and celebration.

However, this doesn’t diminish the importance of fasting. Rather, it redirects our focus. Fasting during Lent becomes a response to the profound joy of being in the presence of Christ. It’s not a mere ritual but a way to open our hearts to the transformative power of His love.

So, as we embark on this Lenten journey, let us fast with purpose, pray with sincerity, and repent with a contrite heart. May our actions be rooted in the joy of Christ’s presence, leading us to a deeper connection with Him. Let this Lent be a time of profound spiritual growth as we await the glorious celebration of Easter.

-Fr. Paul Raj (Bhopal Archdiocese)

📚 मनन-चिंतन-2

येसु की उपस्थिति, बलिदान और आत्म-त्याग के बीच में भी आनंद और उत्सव लाती है। येसु दूल्हा है, और उनके शिष्य विवाह के बारातियों के समान हैं। जिस तरह विवाह आनंद और दावत का समय होता है, वैसे ही हमारे जीवन में येसु की उपस्थिति चालीसा काल के दौरान भी जब हम खुद को त्याग देते हैं और खुद को नकार देते हैं, वह हमारे लिए आनंद और उत्सव लेकर आती है।

ळमें चलीसा काल के बलिदान और आत्म-त्याग को एक बोझ के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे येसु के नजदीक आने का एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। उपवास और परहेज करने से, हम क्रूस पर येसु के बलिदान को याद करते है तथा हम शरीरिक रूप से इस छोटे से बलिदान द्वारा कष्ट अनुभव करते हुये हम येसु के साथ एकमयता को प्रदर्शित करते है। यह जानकर कि हम येसु के निकट आ रहे हैं, यह बलिदान हमारे लिए आनन्द का स्रोत बनना चाहिए।

चालीसा केवल कुछ देने के बारे में नहीं है, यह कुछ नया लेने के बारे में है। यह येसु की तरह बनने के बारे में है, जिसने हमारे लिए सब कुछ त्याग दिया। चालीसा ईश्वर और दूसरों के प्रति एक ऐसी प्रतिबद्धता बनाने के बारे में है, जिसमें प्यार करने और सेवा करने की प्रतिबद्धता तथा येसु की तरह अधिक बनने की प्रतिबद्धता शामिल है। आईये हम इस हेतु प्रार्थना करें।

-फादर डेन्नीस तिग्गा (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION


Jesus' presence brings joy and celebration, even in the midst of sacrifice and self-denial. Jesus is the bridegroom, and his disciples are the wedding guests. Just as a wedding is a time of rejoicing and feasting, so too should the presence of Jesus in our lives bring us joy and celebration, even as we sacrifice and deny ourselves during Lent.

The sacrifice and self-denial of Lent should not be seen as a burden, but rather as an opportunity to draw closer to Jesus, the bridegroom. By fasting and abstaining, we are reminded of Jesus' sacrifice on the cross and are able to physically experience a small sacrifice in solidarity with him. This sacrifice should be a source of joy, knowing that we are drawing closer to Jesus.

Lent is not just about giving something up, it's about taking on something new. It's about becoming more like Jesus, who gave up everything for us. Lent is about making a commitment to God and to others, a commitment to love and serve, a commitment to be more like Jesus. Let’s pray for this.

-Fr. Dennis Tigga (Bhopal Archdiocese)

📚 मनन-चिंतन - 3

उपवास का अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। इसे केवल एक अनुष्ठान के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। उपवास एक उद्देश्य से किया जाता है। आज के सुसमाचार में हम पाते हैं कि येसु ने अपने उपवास न करने वाले शिष्यों को न्यायोचित ठहराया जबकि योहन बपतिस्ता के शिष्यों और फरीसियों ने उपवास किया। इसका मतलब यह नहीं है कि येसु उपवास के खिलाफ थे। येसु ने शिष्यों को उपवास के सही तरीके के बारे में सिखाया (देखें मत्ती 6:16-18)। हम पुराने विधान में लोगों को ईश्वर की सहायता की मांग कर उपवास करते हुए पाते हैं। बहुत बार वे तब तक उपवास करते थे जब तक कि ईश्वर ने सहायता नहीं की। येसु का संसार में आना मानव इतिहास में ईश्वर का सबसे बड़ा कार्य था। यह उनके बीच ईश्वर की उपस्थिति का आनंद लेने और उल्लसित होने का समय था। संत योहन बपतिस्ता ने येसु मसीह के लिए रास्ता तैयार किया। योहन बपतिस्ता के चेले मसीह को स्वीकार करने के लिए तैयार थे। संत योहन ने खुद को 'दूल्हे के मित्र' के रूप में संदर्भित किया, जबकि उन्होंने येसु को दूल्हा माना। योहन ने मसीह को यह कहते हुए भी संकेत दिया, "यह ईश्वर का मेम्ना है"। फिर भी, उनके कुछ चेले मसीह को पहचानने में असफल रहे। वे एक संप्रदाय के रूप में बने रहे। फरीसी धर्मग्रन्थ को जानते थे और मसीह की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन उन्होंने येसु को मसीह के रूप में नहीं पहचाना और उन्हें स्वीकार नहीं किया। वे व्यर्थ ही उपवास करते रहे। हमारा उपवास हमें ईश्वर के करीब ले जाना चाहिए।

- फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

Fasting in itself has no value. It is not to be done as a mere ritual. Fasting is done with a purpose. In today’s Gospel we find Jesus justifying his disciples for not fasting while the disciples of John the Baptist and the Pharisees fasted. This does not mean that Jesus was against fasting. Jesus taught the disciples about the right way of fasting (cf. Mt 6:16-18). In the Old Testament we see people fasting to seek God’s intervention. Very often they fasted until God intervened. Jesus’ coming into the world was the greatest intervention of God in human history. It was a time to enjoy and relish the presence of God among them. St. John the Baptist prepared the way for Jesus, the Messiah. The disciples of John the Baptist were prepared to receive the Messiah. St. John referred to himself as the ‘friend of the bridegroom’ while he considered Jesus to be the bridegroom. John even indicated the Messiah saying, “Here is the Lamb of God”. Yet, some of his disciples failed to recognize the Messiah. They remained as a sect. The Pharisees knew the Scripture and awaited the Messiah, but did not recognize or accept Jesus as the Messiah. They continued to fast in vain. Our fasting should lead us closer to God.

-Fr. Francis Scaria

📚 मनन-चिंतन -4

आज के सुसमाचार में संत योहन बपतिस्ता के शिष्यों का उल्लेख कई सवाल उठाता है। जब प्रभु येसु लोगों के बीच सेवा कर रहे थे, तब संत योहन बपतिस्ता के शिष्यों का एक समुदाय भी दिखाई देता है। संत योहन मसीह के अग्रदूत थे। उन्होंने स्वयं अपने शिष्यों को प्रभु येसु से परिचित कराया और उन्हें येसु का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया। फिर भी यह अजीब है कि येसु के सार्वजनिक कार्यों के दौरान वहाँ एक ऐसा समूह मौजूद है जिनकी पहचान योहन बपतिस्ता के शिष्यों के रूप में दी जाती है। इतना ही नहीं, प्रेरित-चरित 19: 1-4 में, हम ऐसे लोगों का एक समूह पाते हैं जो दावा कर रहे थे कि उन्होंने योहन का बपतिस्मा ग्रहण किया था। संत योहन बपतिस्ता ने मसीह को स्वीकार करने के लिए लोगों को तैयार करने हेतु एक प्रामाणिक आंदोलन शुरू किया था, लेकिन जब मसीह आये, तो उन लोगों में से कुछ ने खुद को संत योहन से जुड़े एक अलग समूह के रूप में रखा। हमारे कुछ संघों और समूहों की स्थापना येसु के करीब जाने के बहुत अच्छे इरादे से की गयी होगी, फिर भी वे अपने लक्ष्य से भटक सकते हैं और एक लोकप्रिय सामाजिक शख्सियत से जुड़ा एक समूह का रूप धारण कर सकते हैं। हमारे संस्कारों और समारोहों के अनुष्ठानों में भी इस प्रकार की परिस्थिति बन सकती है। समय के साथ वे अपने मूल अर्थ को खो सकते हैं और लोग उन अनुष्ठानों तक ही सीमित रह कर अपने वास्तविक लक्ष्य को भूल सकते हैं। माध्यम को ही लक्ष्य समझा जाता है। आइए हम इस तरह की विफलता के बारे में सतर्क रहें।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

The reference in today’s gospel to the disciples of St. John the Baptist raises many questions. When Jesus was ministering to the people, he came across a group of the disciples of St. John the Baptist. St. John was the precursor of the Messiah. St. John himself pointed Jesus to his disciples and led them to him. Yet it is strange that there existed a group of people who identified themselves as the disciples of St. John after the death of St. John. Even in Acts 19:1-4, we find a group of people who claimed to have been baptized into John’s baptism. St. John began an authentic movement to prepare the people to receive the Messiah, but some of those people instead of accepting the Messiah when he came, kept themselves as a separate group attached to St. John. Some of our Associations and Groups founded with the great good intention of moving closer to Jesus may go astray and end up being a groups attached to some popular social figures. This can also happen to our rituals and ceremonies. In the course of time they can lose their original meaning and people may practice them for their own sake. The means is misunderstood as the end. Let us be watchful about such a failure.

-Fr. Francis Scaria