अप्रैल 10, 2024, बुधवार

पास्का का दूसरा सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : प्रेरित-चरित 5:17-26

17) यह सब देख कर प्रधानयाजक और उसके सब संगी-साथी, अर्थात् सदूकी सम्प्रदाय के सदस्य, ईर्ष्या से जलने लगे।

18) उन्होंने प्रेरितों को गिरफ्तार कर सरकारी बन्दीगृह में डाल दिया।

19) परन्तु ईश्वर के दूत ने रात को बन्दीगृह के द्वार खोल दिये और प्रेरितों को बाहर ले जा कर यह कहा,

20) "जाइए और निडर हो कर मन्दिर में जनता को इस नव-जीवन की पूरी-पूरी शिक्षा सुनाइए"। उन्होंने यह बात मान ली और भोर होते ही वे मन्दिर जा कर शिक्षा देने लगे।

21) जब प्रधानायाजक और उसके संगी-साथी आये, तो उन्होंने महासभा अर्थात् इस्राएली नेताओं की सर्वोच्च परिषद् बुलायी और प्रेरितों को ले आने के लिए प्यादों को बन्दी-गृह भेजा।

22) जब प्यादे वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने प्रेरितों को बन्दीगृह में नहीं पाया। उन्होंने लौट कर यह समाचार दिया,

23) "हमने देखा कि बन्दीगृह बड़ी सावधानी से बन्द किया हुआ है और पहरेदार फाटकों पर तैनात हैं, किन्तु खोलने पर हमें भीतर कोई नहीं मिला।

24) यह सुन कर मन्दिर-आरक्षी के नायक और महायाजक यह नहीं समझ पा रहे थे कि प्रेरितों का क्या हुआ है।

25) इतने में किसी ने आ कर उन्हें यह समाचार दिया, "देखिए, आप लोगों ने जिन व्यक्तियों को बन्दीगृह में डाल दिया, वे मन्दिर में जनता को शिक्षा दे रहे हैं"।

26) इस पर मन्दिर का नायक अपने प्यादों के साथ जा कर प्रेरितों को ले आया। वे प्रेरितो को बलपूर्वक नहीं लाये, क्योंकि वे लोगों से डरते थे कि कहीं हम पर पथराव न करें।

📚 सुसमाचार : योहन 3:16-21

16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।

18) जो पुत्र में विश्वास करता है, वह दोषी नहीं ठहराया जाता है। जो विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहराया जा चुका है; क्योंकि वह ईश्वर के एकलौते पुत्र के नाम में विश्वास नहीं करता।

19) दण्डाज्ञा का कारण यह है कि ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे।

20) जो बुराई करता है, वह ज्योंति से बैर करता है और ज्योति के पास इसलिए नहीं आता कि कहीं उसके कर्म प्रकट न हो जायें।

21) किन्तु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के पास आता है, जिससे यह प्रकट हो कि उसके कर्म ईश्वर की प्रेरणा से हुए हैं।

📚 मनन-चिंतन

प्रभु के कार्य में कितनी भी बाधा क्यों न आ जाये, लेकिन उनका कार्य जारी रहेगा। उसे कोई भी नहीं रोक पायेगा। प्रधान याजक और कुछ सदूकियों ने प्रेरितों का बन्दीग्रह में ड़लवा दिया। ईश्वर के दूत ने उन्हें रिहा कर निड़रता से पुनर्जीवित प्रभु की शिक्षा का प्रचार करने का आदेश दिया। महायाजक और अन्य लोग इस घटना को समझ नहीं पा रहे थे। वे फिर जा कर उन्हें गिरफ्तार करना चाहते हैं। प्रेरित निर्भीकता से प्रभु का वचन सनते हैं।

ईश्वर हमसे प्यार करते हैं, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को इस संसार में भेजा। और जो उनमें विश्वास करता है, उसका सर्वनाश नहीं होगा बल्कि वह अनंत जीवन प्राप्त करेगा। प्रभु येसु हमें जीवन देने आये, उनके द्वारा हम परिपूर्ण जीवन का आनंद ले सकते हैं। प्रेरितों ने जीवंत ईश्वर के पुत्र पर विश्वास किया इसलिए वे मौत से भी नहीं ड़रते क़्योंकि प्रभु उनका सहारा एवं बल हैं।

क्या हम ईश्वर से प्रेम करते हैं? आइये, हम अनंत जीवन की ओर आगे बढ़े।

- फादर साइमन मोहता (इंदौर धर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

No matter how many obstacles come in the work of the Lord, but His work will continue. No one will be able to stop him. The chief priests and some Sadducees put the apostles in prison. The angel of God released them and ordered them to preach boldly the teachings of the risen Lord. The high priest and others could not understand this incident. They want to go back and arrest them. The apostles boldly preach the word of the Lord.

God loves us, so he sent his son into this world. And whoever believes in him will not perish but will have eternal life. Lord Jesus came to give us life, through him we can enjoy a full life. The apostles believed in the Son of the living God, so they did not fear even death because the Lord was their support and strength.

Do we love God? Come, let us continue towards eternal life.

-Fr. Simon Mohta (Indore Diocese)

📚 मनन-चिंतन -2

अधिकाश लोग चमत्कार एवं दिव्य उपहारों को खोजते हैं और ऐसा करने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन स्वयं से यह सवाल भी पूछना चाहिये कि हम इन्हें क्यों चाहते हैं। यदि इन अभिलाषाओं एवं उपहारों को व्यक्तिगत और सांसारिक लाभ के लिये की जा रही हो तो वे शायद ही हमें मिले। किन्तु यदि वे ईश्वर की महिमा के लिये हो तो ईश्वर लौकिक एवं अलौकिक रूप से अवश्य ही हस्तक्षेप कर सकते हैं। ईश्वर के उपहार समुदाय के कल्याण के लिये होते हैं। ये ईश्वर की शक्ति एवं सामर्थ्य के चिन्ह होते हैं। जब पावन आत्मा के वरदान प्रत्याक्ष रूप में विश्वासियों और गैर-विश्वासियों पर प्रकट होते हैं तो वह लोगों के विश्वास को बढाता तथा ढांढस देता है ईश्वर समीप ही है तथा वह हमारे कल्याण के लिये कार्यरत है। जब ईश्वर अपने प्रेम, शक्ति-सामर्थ्य और प्रज्ञा को विश्वाससियों के द्वारा प्रदर्शित करता है तो गैर-विश्वासी इस चमत्कारों के समक्ष ईश्वर की सत्यता से रूबरू होते हैं। जो लोग ईश्वर प्रद्त्त उपहारों या चमत्कारों को करते हैं, वे लोगों की सेवा एवं कल्याण के लिये, मात्र ईश्वर के उपकरण एवं माध्यम होते हैं। हमें इन चमत्कारों को तुच्छ मानवीय लाभ की दृष्टि या दायरे से नहीं देखना चाहिये।

जब ईर्ष्या की भावना से महायाजक तथा अन्यों ने प्रेरितों का गिरफतार कर जेल में डालवा दिया था तो ईश्वर ने उन्हें आश्चर्यजनक ढंग से मुक्त कर दिया। कारावास के द्वार अपने आप खुल जाते हैं और वे बाहर आ जाते हैं। पहरेदारों ने द्वारों को ताला बंद पाया किन्तु प्रेरित अंदर नहीं थे। ईश्वर ने प्रेरितों को इस अलौकिक रूप इसलिये मुक्त कराया ताकि वे जाकर उन्हीं लोगों के समक्ष गवाही दे सके जिन्होंने उन्हें गिरफतार किया था। इस मुक्तिकार्य से विरोधी अंचभित थे। वे उनके इस प्रकार कारावास से छुटने को लेकर विस्मित थे। वे आश्चर्यचकित तो थे किन्तु इस महान कार्य में ईश्वर का सामर्थ्य पहचानने से इंकार करते हैं। महायाजकों तथा अन्य पुनः उनके विरूद्ध षडयंत्र रचने लगते हैं।

हमें अपने जीवन में तथा योजनाओं में इतना अधिक नहीं डूबना चाहिये कि हम ईश्वर की उपस्थिति को ही न पहचान पाये।

- फादर रोनाल्ड मेलकम वॉन


📚 REFLECTION

We seek miracles and divine gifts and we are not wrong in seeking them in our lives. Sometimes it is good to ask ourselves so as why do we need them. If the gifts or miracles are meant for individual gains or mundane reasons then they may be hard to come by, however, if they are for the glory of God and not for vain human self then God may intervene even in some supernatural and human ways. God’s gifts are meant for the welfare of a larger community. They merely reflect God’s power among men. When the Holy Spirit works in various ways that can be perceived by believers and unbelievers, this encourages people’s faith that God is near and active and that he is working to fulfil his purposes in us and to bring blessings to his people. The unbelievers come face to face with the reality of the living God as He displays His power, His love, and His wisdom through His people. Those who receive God’s gifts are merely instruments of God for others. We must never confuse the gifts with petty selfish motives or gains.

When out of jealously the high priest and others arrested and put the apostles in public prison the Lord rescued them in an astonishing manner. The prison gates were opened and they moved out of the prison. The gourds found the prison securely locked but the apostles had not been there. The Lord did this great thing only to send them back to bear witness to the very people they had been arrested by. This rescue work left the oppositions into in to perplexity. They wonder how could some people be out of the tightly secured prison. They wondered about the incident but refused to believe God’s hand in such an extra-ordinary way. The chief priests and others still refused to believe in the power working in and through the apostles. They again began to plot how to destroy them.

We should not so much engrossed in our thinking and understanding of the events of life that we may fail to see God and his ways.

-Fr. Ronald Melcom Vaughan

📚 मनन-चिंतन -3

ईश्वर ने संसार से इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करें।

आज हम ईश्वर और संसार के बीच में रिश्ते के विषय पर मनन करेंगे। ईश्वर सृष्टिकर्ता है और यह संसार उसकी सृष्टि है। ईश्वर के समक्ष यह सृष्टि कुछ नही ंके बराबर है। सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने यह संसार एक धूल भर के बराबर भी नहीं है। परंतु आज का सुसमाचार हमें यह बताता हैं कि ईश्वर ने संसार से प्यार किया। ईश्वर का इस संसार या हमसे जो कि कुछ भी नहीं है, इतना प्यार करने का क्या कारण हो सकता है? स्तोत्रकार 8ः4-5 में कहता है, ‘‘जब मैं तेरे बनाये हुए आकाश को देखता हूॅं, तेरे द्वारा स्थापित तारों और चन्द्रमा को, तो सोचता हूॅं कि मनुष्य क्या है, जो तू उसकी सुधि ले? आदम का पुत्र क्या है, जो तू उसकी देख-भाल करें?’’ प्रभु का हमसे इतना प्रेम करने का कारण बस यहीं है कि हम सब उसकी संतान है और हम उसके है। आइये इसे हम एक परिवार के उदाहरण से समझें। एक परिवार में माता पिता दूसरों के बच्चों की अपेक्षा अपने बच्चे से अधिक प्यार करेंगे। वे पड़ोसियों या रिश्तेदारों या दोस्तों के बच्चे की अपेक्षा अपने बच्चे से कई अधिक प्यार करेंगे क्योकि वह बच्चा उनका स्वयं का खून है तथा बच्चे का प्रतिरूप उनके माता पिता से मिला है। ठीक उसी प्रकार हम भी ईश्वर के प्रतिरूप बनाये गये है (उत्पत्ति 1ः27), हम उसकी संतान है। यही कारण है जो ईश्वर हमसे इतना प्यार करता है चाहे हम धर्मी है या पापी, पुरुष है या महिला, अमीर है या गरीब। वह हमसे बिना शर्त प्रेम करता है। इस असीमित प्रेम को हम मत्ती 5ः45 में अच्छी तरह समझ सकते है, ‘‘वह भले और बुरे दोनों पर अपना सूर्य उगाता तथा धर्मी और अधर्मी दोनो पर पानी बरसाता है।’’

हम जो उसकी संतान है को बचाने के लिए ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया जिससे हम उसके दुःखभोग, मरण एवं पुनरुत्थान द्वारा बच जायें। जिस प्रकार हम जी रहें उस से तो हमारा सर्वनाश होना तय था परंतु अभी हमें येसु के द्वारा अनंत जीवन की आशा है।

येसु हमे बचाने के लिए एक ज्योति की तरह इस संसार में आये। परंतु हमारे कर्म और कार्य इतने पापमय है कि हम हमेशा उस पाप को छिपा कर अंधेरे में रहना पसंद करते है। हम हमारे जीवन को प्रकाश में नहीं लाना चाहते हैं।

प्रिय दोस्तों ईश्वर के पास हमें बचाने के लिए यह सबसे अच्छी योजना है परंतु हमें संसार की ज्योति येसु को अपनाने और उस पर विश्वास करने की जरूरत है। हमें अपने जीवन को येसु के सामने प्रकाश में लाने की जरूरत है। हम अक्सर अपने जीवन को प्रकाश में इसलिए नहीं लाना चाहते क्योकि हम जानते है कि हमारे कार्य पापमय और शर्मिदंगी से भरी हुई है तथा अगर हम इसे प्रकाश में लायेंगे तो ईश्वर हमे दोषी ठहराकर हमे दण्ड देंगे, परंतु ईश्वर का वचन कहता है,:ःईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।’’

आईये हम उस पर विश्वास करते हुए हमारे सभी हताशा के साथ जैसे हम है एक पापी के समान उसके पास आये। ईश्वर का असीमित प्रेम ज्योति की संतान के अनुसार हमारे जीवन का बदल देगा। हम हमेशा उसकी ओर मुड कर अपने जीवन में सदा उसकी खोज करते रहें। आमेन

- फादर डेन्नीस तिग्गा


📚 REFLECTION

“God so loved the world that He gave his only Son, so that everyone who believes in him may not perish but may have eternal life.”

Today we will reflect on the relationship between God and the world. God is the creator and the world is his creation. In front of God all the creation is nothingness. It may be not even the dust in front of God, the Supreme Being. But today’s Gospel tells that God so loved the World. What can be the reason the God loves us who are nothing in front of Him? Psalmist says in 8:3-4, “When I look at your heavens, the work of your fingers, the moon and the stars that you have established; what are human beings that you are mindful of them, mortals that you care for them?” The reason why God love us is all because we are His children we came through him. Let us understand this by an example of a family, the parents will love their child more than other children, they will love their child more than the children of their neighbours, or relatives or friends. It is because the child born in the family belongs to them the child have the image and likeness of their own parents. So also we are being created in God’s image and likeness (Gen 1:27), we are His children, we belong to Him. This is the reason God loves us whether we are righteous or sinful, male or female, rich or poor. He loves us without any condition. This unconditional love is understood by the verse in Mt 5:45, “He makes his sun rise on the evil and on the good and sends rain on the righteous and on the unrighteous.”

In order to save us, His children, He gave his only Son so that we may be saved by his passion death and resurrection. We all would have perished by the way we all were living but now we have the promise of eternal life.

Jesus came in this world as the light to save us. But our deeds and actions are so evil that we always tend to hide our sin and remain in darkness. We don’t want to expose our life to the light.

Dear friends God has this wonderful plan to save us but we need to accept and believe in Jesus, the light of the world. We need to expose our whole life to Jesus. We do not expose our lives because we know that our deeds are evil and we fear that if we expose then God will punish us; but the word of God says, “God did not send the Son into the world to condemn the world, but in order that the world might be saved through him.”

Let us believe and come to him with all the brokenness or as we are sinful and wretched one. God mercy is infinite that he will change our lives to that of the children of light. Let us always turn towards him and seek him in our lives. Amen

-Fr. Dennis Tigga