अप्रैल 14, 2024, इतवार

पास्का का तीसरा इतवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 3:13-15,17-19

13) इब्राहीम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने, हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने अपने सेवक ईसा को महिमान्वित किया है। आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ कर देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।

14) आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।

15) जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।

17) भाइयो! मैं जानता हूँ कि आप लोग, और आपके शासक भी, यह नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

18) ईश्वर ने इस प्रकार अपना वह कथन पूरा किया जिसके अनुसार उसके मसीह को दुःख भोगना था और जिसे उसने सब नबियों के मुख से घोषित किया था।

19) आप लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के पास लौट आयें, जिससे आपके पाप मिट जायें

दूसरा पाठ 1 योहन 2:1-5a.

1) बच्चो! मैं तुम लोगों को यह इसलिए लिख रहा हूँ कि तुम पाप न करो। किन्तु यदि कोई पाप करता, तो पिता के पास हमारे एक सहायक विद्यमान हैं, अर्थात् धर्मात्मा ईसा मसीह।

2) उन्होंने हमारे पापों के लिए प्रायश्चित किया है और न केवल हमारे पापों के लिए, बल्कि समस्त संसार के पापों के लिए भी।

3) यदि हम उनकी आज्ञाओं का पालन करेंगे, तो उस से हमें पता चलेगा कि हम उन्हें जानते हैं।

4) जो कहता है कि मैं उन्हें जानता हूँ, किन्तु उनकी आज्ञाओं का पालन नहीं करता वह झूठा है और उस में सच्चाई नहीं है।

5) परन्तु जो उनकी आज्ञाओं का पालन करता है, उस में ईश्वर का प्रेम परिपूर्णता तक पहुँचता है।

सुसमाचार : लूकस 24:35-48

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

36) वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, "तुम्हें शान्ति मिले!"

37) परन्तु वे विस्मित और भयभीत हो कर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं।

38) ईसा ने उन से कहा, "तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में सन्देह क्यों होता है?

39) मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़-मांस नहीं होता।"

40) उन्होंने यह कह कर उन को अपने हाथ और पैर दिखाये।

41) जब इस पर भी शिष्यों को आनन्द के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, "क्या वहाँ तुम्हारे पास खाने को कुछ है?"

42) उन्होंने ईसा को भुनी मछली का एक टुकड़ा दिया।

43) उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया।

44) ईसा ने उन से कहा, "मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है"।

45) तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया

46) और उन से कहा, "ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।

📚 मनन-चिंतन

प्रभु येसु का दुखभोग एवं मृत्यु ऐतिहासिक सत्य था। शिष्यों ने यह स्वयं देखा था तथा कुछ एक तो उनके दफन के समय भी मौजूद थे। इस प्रकार वे निश्चित तौर पर जानते थे कि येसु मर चुके थे। वे इन घटनाओं के कारण बेहद उदास थे। येसु की उनके दुखभोग तथा मृत्यु की भविष्यवाणी के बावजूद भी वे यही सोच रहे थे ऐसा कुछ नहीं होगा तथा अंत में येसु नाटकीय ढंग से राजनैतिक उलटफेर करेंगे। किन्तु क्रूस मरण ने उनकी सारी उम्मीदें छीन ली थी। ऐसी निराशाजनक अवस्था में पुनरूत्थान की खबर ने उन्हें संशय में डाल दिया था। ऐसी परिस्थिति में ईश्वर स्वयं उनके विश्वास को पुनःस्थापित करने की पहल करते हैं।

येसु पहले दो शिष्यों से एम्माउस के मार्ग में मिले थे तथा अब वे एक बंद कमरे में उन्हें दर्शन देते हैं। येसु अपने शिष्यों को आश्वसन देने के लिये तत्पर थे कि वे भूत-प्रेत नहीं वरन एक नयी अवस्था में वहीं येसु है जिन्हें वे जानते थे। उनकी पहचान का सबसे मजबूत सबूत उनके घाव थे, जो मसीह के चिन्ह थे, तथा उनकी भविष्य्वाणी के अनुरूप थे कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे। येसु मानवीय ढंग से उनके विश्वास को जीतना चाहते थे। वे अपने घावों को दिखाते तथा उनका स्पर्श करने का निमंत्रण देकर बताना चाहते हैं कि वे सचमुच के है। वे उनके सामने खाते हैं। फिर उन्हें समझाते हैं कि जो कुछ भी उनके साथ हुआ वह धर्मग्रंथ के अनुसार हुआ। संहिता, नबी, तथा स्तोत्र, जो कि धर्मग्रंथ के तीन भाग थे को उल्लेखित कर येसु यही बताते हैं कि मसीह के बारे में भविष्यवाणी सम्पूर्ण धर्मग्रंथ में की गयी है।

येसु के दुखभोग, मृत्यु तथा पुनरूत्थान से ईश्वर से मानवजाति के मिलन का मिशन उत्प्रेरित होता है जैसा कि प्रभु कहते हैं, ’’तुम इन बातों के साक्षी हो।’’ यह शिष्यों का मिशन है कि सारे संसार में ईश्वर के राज्य की स्थापन के लिये कार्यरत रहे। उन्हें येसु के नाम पर येरुसालेम से लेकर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिये पश्चाताप का उपदेश देना होगा।

कलीसिया अपने स्वाभाव से ही मिश्नरी है। ईश्वर के अनुभव तथा वरदानों को सभी के साथ बांटा जाना चाहिये ताकि सभी मुक्ति प्राप्त कर सके। यह कारण था कि शिष्यों ने ज्ञात दुनिया के सभी हिस्सों को येसु की शिक्षा तथा उनके पुनरूत्थान की सच्चाई से भर दिया था। कुरिन्थियों के नाम अपने पहले पत्र में संत पौलुस जिन्होंने स्वयं पुनरूत्थान की सच्चाई का अनुभव किया था, कहते हैं, ’’धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूं।’’(1 कुरि.9:16)

हम भी ईश्वर का अनुभव करते तथा उनके उपहारों को ग्रहण करते हैं। ये हमारी स्वयं की महिमा तथा उपभोग के लिये नहीं बल्कि दूसरों के कल्याण के लिये दिये गये हैं। हमें दूसरों के साथ येसु के पुनरूत्थान का सुसमाचार तथा ईश्वर के क्रियाशील सामर्थ्य को बांटना चाहिये। प्रेरितों के समान हम भी केवल वहीं बांट सकते हैं जो हमने अनुभव किया है तथा प्रभु से विनती करे कि वे हमारे हृदयों को धर्मग्रंथ को समझने के लिये खोले। केवल ईश्वर ही ऐसा कर सकते है। ईश्वर हमें उनकी राह देखते तथा उनके लिये पुनःआगमन के लिये उल्सित पाये।

फादर रोनाल्ड वाँन

📚 REFLECTION


The passion and death of the Jesus was a historical reality. The disciples had witnessed it and they and some of had been present at burial of Jesus. So, they knew for sure that Jesus was dead. They were dismayed at the turn of event for obvious reasons. Inspite of Jesus’ forewarning of his passion and death they had continued to hope for the sensational triumphant resurgence of Jesus at political platform. Now the news of resurrection had terribly confused them. They had already been devastated by the death and now the rising from the death had been too much to digest. But it was God who takes initiative in restoration of their faith.

Jesus meets them on the road to Emmaus previously and now when they had been closed up in a room the Lord Jesus appears to them. Jesus is keen to reassure his friends that he not a ghost, but the same one as before, though in a new state. The strongest proof of this identity are his wounds, a clear sign that ‘that the Messiah is to suffer and to rise from the dead on the third day’. Jesus tries to win over their confidence in a very human manner. He speaks to them of peace. He showed his wounds to be touched and felt. He eats with them. Definitely the Lord was not hungry but he wanted to be as human and normal as he was before. Jesus then goes on to explain, all that had happened to him was fully in harmony with and the fulfilment of the Law, the prophets and psalms. Mentioning the three parts of the Old Testament Jesus indicates that the Messiah was foretold through the whole of the scriptures.

Out of Christ’s suffering, death and resurrection comes the mission to proclaim reconciliation with God through Jesus to the whole word. “You are witnesses to this.” It is the mission of apostles to carry on the establishment of the Kingdom throughout the world. They are to preach “repentance, for the forgiveness of sin, in Jesus’ name to all the nations, beginning from Jerusalem”.

Church my nature is a missionary. God’s experience and gifts are to be shared so that all must obtain salvation. This is very reason the apostles would fill the whole known parts of the earth with the teachings and news of the resurrection of Jesus. Paul who come to the truth of the resurrection at a later stage would say, “Foe to me if I do not preach the gospel” and moreover if the Christ has not been risen then vain is our faith.” (1 Cor.9:16)

We too experience God and his gifts. They are not for self-glory or advantages but for the good of the others. We ought to be sharing with other the news of the risen Lord and his power working amidst us. Like the apostles we can only witness what we have already experienced and we ask the Lord to open our hearts to the understanding of the scripture and to the truth of his resurrection in our life. Only the Lord can do it and we shall be found waiting and thirsting for the his coming into our life.

-Fr. Ronald Vaughan

- चिं

मानव अनादि काल से ही शांति की खोज करता रहा है। इब्रानी भाषा में शांति को ’शालो’ कहते हैं जिसका अर्थ है, ’परिपूर्णता’, ’परिपक्वता’, ’सम्पूर्ण’। जब मनुष्य अपने अंतरतम में परिपूर्णता का अनुभव करता है तो उसे वह शांति प्राप्त होती है जिसकी तलाश उसे हमेशा से होती रही है। हम जिंदगी में शांति को समृद्धि में खोजने का प्रयत्न करते हैं। उपलब्धि, संपत्ति, अधिकार, विलक्षणता आदि के द्वारा भी हम परिपूर्णता या शांति को प्राप्त करना चाहते हैं। मानव पहाडों, गुफाओं, रेगिस्तानों जैसी एंकात स्थानों में शरण लेता है। जीवन जीने की विभिन्न शैलियॉ अपनाता तथा योग, प्राणिक चंगाई आदि कसरतें करता है। किन्तु ये मानवीय प्रयत्न क्षणिक सांसारिक उल्लास या सुख प्रदान करते हैं। स्थायी शांति फिर भी दूर बनी रहती है।

’शांति’ प्रभु येसु का वह अनमोल उपहार है जिसे उन्होंने अपने शिष्यों को दिया है। “मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।” (योहन 14:27) प्रभु के जन्म पर भी स्वर्गदूतों के समूहों ने शांति के वरदान की घोषणा की थी, ‘‘सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा प्रकट हो और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को शान्ति मिले!” (लूकस 2:14) प्रभु येसु के जन्म की भविष्यवाणी में भी नबी इसायाह उन्हें शांति का राजा कहते हैं, “....हम को एक पुत्र मिला है। उसके कन्धों पर राज्याधिकार रखा गया है और उसका नाम होगा- अपूर्व परामर्शदाता, शक्तिशाली ईश्वर, शाश्वत पिता, शान्ति का राजा।” (इसायाह 9:5) अपने शिष्यों का प्रेषण करते समय येसु उन्हें इसी शांति के साथ भेजते हैं। “जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’ यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।” (लूकस 10:5-6) इब्रानियों के नाम पत्र का लेखक भी येसु को शांति का राजा बताते हैं। वे मेलखिसेदेक को, येसु का पूर्व-चिन्ह बताते हुये इंगित करते हैं, “सालेम के राजा और सर्वोच्च ईश्वर के पुरोहित ....मेलखिसेदेक का अर्थ है -धार्मिकता का राजा। वह सालेम के राजा भी है, जिसका अर्थ है- शान्ति के राजा।”(इब्रानियों 7:1-2)

प्रभु की मृत्यु के बाद जब शिष्य निराश एवं भयभीत थे तो पुनर्जीवित प्रभु तीन बार शिष्यों को पुनः शांति प्रदान करते है। “...ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, “तुम्हें शांति मिले!” और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, “तुम्हें शांति मिले!” (योहन 20:19-20) “वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, ‘‘तुम्हें शान्ति मिले!” (लूकस 24:36) इस प्रकार शांतिप्रदाता येसु शिष्यों के हृदयों की उथलपुथल को अपनी शांति से शांत करते हैं।

हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि हमारा ईश्वर शांति का ईश्वर है तथा उसने हमें शांति का जीवन जीने के लिए बुलाया है। जो शांति प्रभु हमें प्रदान करते हैं वह संसार की शांति के समान नहीं है जो कुछ क्षण के लिए हमें केवल शांति का अहसास कराती है। प्रभु की शांति उनके सानिध्य एवं सामिप्य से प्राप्त होती है।

जब येसु शिष्यों के साथ नाव में जा रहे थे तो नाव तूफान से घिर गयी थी। शिष्यों में भय छा गया था। वे इस डर और घबराहट के बीच येसु को जगाते हैं। येसु ने “वायु को डाँटा और समुद्र से कहा, “शान्त हो! थम जा!” वायु मन्द हो गयी और पूर्ण शान्ति छा गयी।” (मारकुस 4:39) संत पौलुस कहते हैं, “ईश्वर कोलाहल का नहीं, वरन् शान्ति का ईश्वर है।...” (1 कुरि. 14:33) हमारे जीवन में भी हम अव्यवस्था, अंशांति एवं तूफानों से गुजरते हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें शांति के राजा येसु को पुकारना चाहिए जो सारे कोलाहल को शांत करते हैं। यदि विषम परिस्थितियों में हम सांसारिक तिकडमों पर भरोसा करेंगे तो यह कोलाहल बढता ही जायेगा।

प्रभु की शांति को प्राप्त करने और उसमें बने रहने के लिए हमें लोगों के बीच शांति स्थापित करना चाहिए। जो व्यक्ति मेलमिलाप के कार्यों में लगे रहते हैं वे सचमुच में ऐसे लोग है जो प्रभु की शांति का अनुभव करते हैं। उसी शांति से प्रेरित होकर वे मेल कराते हैं। ऐसे शांतिप्रिय लोगों को येसु धन्य कह कर पुकारते हैं, “धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।” (मत्ती 5:9) इसी प्रकर अपने शिष्यों को नमक के समान बनने की चुनौती देने के साथ-साथ येसु हमें आपसी शांति एवं मेल-मिलाप को बनाये रखने का आव्हान करते हैं। “...अपने में नमक बनाये रखो और आपस में मेल रखो।” (मारकुस 9:50) ईश्वर जो शांति का ईश्वर है चाहते हैं कि हम अपने कार्यों के द्वारा शांति भंग न करें तथा शांति स्थापित कर प्रभु की धन्यता को धारण करना चाहिए। इस प्रकार “ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।” (फिलिल्पियों 4:7) यह वही शांति है जिसे येसु अपने भयभीत शिष्यों को अपने पुनरूत्थान के बाद प्रदान करते हैं।

फादर रोनाल्ड वाँन