अप्रैल 27, 2024, शनिवार

पास्का का चौथा सप्ताह

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📒 पहला पाठ : प्रेरित-चरित 13:44-52

44) अगले विश्राम-दिवस नगर के प्रायः सब लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए इकट्ठे हो गये।

45) यहूदी इतनी बड़ी भीड़ देख कर ईर्ष्या से जल रहे थे और पौलुस की निंदा करते हुए उसकी बातों का खण्डन करते रहे।

46) पौलुस और बरनाबस ने निडर हो कर कहा, ’’यह आवश्यक था कि पहले आप लोगों को ईश्वर का वचन सुनाया जाये, परंतु आप लोग इसे अस्वीकार करते हैं और अपने को अनंत जीवन के योग्य नहीं समझते; इसलिए हम अब गैर-यहूदियों के पास जाते हैं।

47) प्रभु ने हमें यह आदेश दिया है, मैंने तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दिया हैं, जिससे तुम्हारे द्वारा मुक्ति का संदेश पृथ्वी के सीमांतों तक फैल जाये।’’

48) गैर-यहूदी यह सुन कर आनन्दित हो गये और ईश्वर के वचन की स्तृति करते रहे। जितने लोग अनंत जीवन के लिए चुने गये थे, उन्होंने विश्वास किया

49) और सारे प्रदेश में प्रभु का वचन फैल गया।

50) किंतु यहूदियों ने प्रतिष्ठित भक्त महिलाओं तथा नगर के नेताओ को उभाड़ा, पौलुस तथा बरनाबस के विरुद्ध उपद्रव खड़ा कर दिया और उन्हें अपने इलाके से निकाल दिया।

51) पौलुस और बरनाबस उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ कर इकोनियुम चले गये।

52) शिष्य आनन्द और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे।

📙 सुसमाचार : योहन 14:7-14

7) यदि तुम मुझे पहचानते हो, तो मेरे पिता को भी पहचानोगे। अब तो तुम लोगों ने उसे पहचाना भी है और देखा भी है।’’

8) फिलिप ने उन से कहा, ’’प्रभु! हमें पिता के दर्शन कराइये। हमारे लिये इतना ही बहुत है।’’

9) ईसा ने कहा, ’’फिलिप! मैं इतने समय तक तुम लोगों के साथ रहा, फिर भी तुमने मुझे नहीं पहचाना? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है। फिर तुम यह क्या कहते हो- हमें पिता के दर्शन कराइये?’’

10) क्या तुम विश्वास नहीं करते कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं? मैं जो शिक्षा देता हूँ वह मेरी अपनी शिक्षा नहीं है। मुझ में निवास करने वाला पिता मेरे द्वारा अपने महान कार्य संपन्न करता है।

11) मेरी इस बात पर विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं, नहीं तो उन महान कार्यों के कारण ही इस बात पर विश्वास करो।

12) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ जो मुझ में सिवश्वास करता है, वह स्वयं वे कार्य करेगा, जिन्हें मैं करता हूँ। वह उन से भी महान कार्य करेगा। क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ।

13) तुम मेरा नाम ले कर जो कुछ माँगोगे, मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा, जिससे पुत्र के द्वारा पिता की महिमा प्रकट हो।

14) यदि तुम मेरा नाम लेकर मुझ से कुछ भी माँगोगें, तो मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा।

📚 मनन-चिंतन

हम अक्सर असंतोष की भावना के साथ जीते हैं। हम अपने अंदर की इच्छाओं और लालसाओं से अवगत हैं जो पूरी तरह से हमें संतुष्टि नहीं देते। हम में बेचैनी है, एक प्रकार का खालीपन है जो कभी पूरी तरह नहीं भरता। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम उस चीज़ के लिए बने हैं जो यह दुनिया हमें पूरी तरह से नहीं दे सकती। संत ऑगस्टीन ने कहा कि हमारा हृदय तब तक बेचैन रहता है जब तक वह ईश्वर में विश्राम नहीं कर लेता। सुसमाचार में, फिलिप इस जागरूकता के बारे में बात करते हैं कि परम संतुष्टि ईश्वर को देखने में, ईश्वर के साथ जुड़ने में पाई जाती है। जवाब में, येसु कहते हैं कि उन्हें विश्वास की आँखों से देखना, उसके साथ सहभागिता होना, पिता को देखना है। येसु पिता और पुत्र के बीच संबंधों की गहराई को प्रकट किया। पुत्र को जानना पिता को जानना है। यहाँ और अभी, इस सांसारिक जीवन में, हम येसु के साथ अपने रिश्ते के माध्यम से वह अनुभव करना शुरू कर सकते हैं जिसके लिए हम अंततः तरसते हैं।

- फादर संजय कुजूर, एसवीडी


📚 REFLECTION

We often live with a sense of dissatisfaction. We are aware of desires and longings in us that are not fully satisfied. We have the restlessness, a kind of emptiness that is never fully filled. That is because we are made for something which this world cannot fully give us. Saint Augustine said our hearts are restless until they rest in God. In the gospel, Philip speaks out of the awareness that ultimate satisfaction is to be found in seeing God, in being in communion with God. In response, Jesus says that to see him with the eyes of faith, to enter into communion with him, is to see the Father. Jesus reveals the depth of relationship between Father and Son. To know the Son is to know the Father. Already here and now in this earthly life, we can begin to experience that for which we ultimately long in and through our relationship with Jesus.

-Fr. Sanjay Kujur SVD

📚 मनन-चिंतन

इब्रानीयों के नाम पत्र में हम पढ़ते हैं कि ईश्वर का वचन जीवंत, सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से तेज है (इब्रानीयों 4:12)। जो भी व्यक्ति ईश वचन को सुनता या पढ़ता है, वह उसके प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़ता है। ईश्वर के वचन को सुनने वाला वह व्यक्ति अगर उस पर चलना चाहता है तो उसका जीवन जरूर बदल जाएगा, लेकिन अगर कोई व्यक्ति ईश्वर के वचन को सुनकर उस पर नहीं चलना चाहता है तो वह अपने पापों में बंधा रहता है और उसका सर्वनाश निश्चित है (देखिए मत्ती 7:24-27)। कुछ ऐसा ही नज़ारा हमें आज के पहले पाठ में देखने को मिलता है। प्रेरित लोग तो प्रभु का कार्य कर रहे थे, और अच्छा कार्य कर रहे थे, लेकिन यहूदी लोग उनका विरोध करते हैं, उनके बारे में झूठी अफवाहें फैलाते हैं, ताकि लोग उनको स्वीकार न करें।

आज भी जब हम अपने चारों ओर देखते हैं कि प्रभु येसु के अनुयायी तो मानवता की भलाई के कार्यों में व्यस्त रहते हैं लेकिन उनके विरुद्ध अफवाहें फैलाई जाती हैं, उन पर झूठे आरोप लगाए जाते हैं, उनको प्रताड़ित किया जाता है। लेकिन हमें प्रभु येसु की भांति और प्रेरितों की भांति विरोध एवं चुनौतियों के बावजूद अपने भलाई के कार्य जारी रखने हैं। क्योंकि ये कार्य किसी मनुष्य की इच्छा से नहीं बल्कि ईश्वर की आज्ञा से किए जा रहे हैं, और अगर हम ईश्वर के कार्य करते हैं तो कौन हमें रोक सकता है?

- फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

We read in the Letter to the Hebrews that the Word of God is active, alive and cuts more finely than a double-edged sword (Heb 4:12). Whoever listens to the word of God or reads it, that person cannot remain untouched with it. Somehow, the word of God will leave an impact on that person . One who hears the word of God and lives accordingly , his life will certainly be changed on the contrary, if a person hears the word of God but does not follow it in his life then not only he is tied up with his sins but also chooses the path of destruction (Ref. Matthew 7:24-27). Something similar is seen in the first reading of today. The apostles were doing the work of God; it was for the welfare of whole humanity but some of the Jews not only work against them but also spread false rumours so that people do not accept them.

Even today we see around us that the followers of Jesus are working for the welfare of humanity but rumours are spread about them and they are accused falsely and persecuted unjustly but we learn from our Lord that in spite of all the challenges and protests we need to continue the good work of God . This work is not of some human origin but it is doing the will of God and who can stop us from doing the will of God? Who can work against God?

-Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)