मई 14, 2024, मंगलवार

प्रेरित सन्त मथियस - पर्व

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:15-17,20-26

15) उन दिनों पेत्रुस भाइयों के बीच खड़े हो गये। वहाँ लगभग एक सौ बीस व्यक्ति एकत्र थे। पेत्रुस ने कहा,

16) ’’भाइयो! यह अनिवार्य था कि धर्मग्रन्थ की वह भविष्यवाणी पूरी हो जाये, जो पवित्र आत्मा ने दाऊद के मुख से यूदस के विषय में की थी। यूदस ईसा को गिरफ्तार करने वालों का अगुआ बन गया था।

17) वह हम लोगों में एक और धर्मसेवा में हमारा साथी था।

20) स्त्रोत-संहिता मे यह लिखा है-उसकी ज़मीन उजड़ जाये; उस पर कोई भी निवास नहीं करे और-कोई दूसरा उसका पद ग्रहण करे।

21) इसलिए उचित है कि जितने समय तक प्रभु ईसा हमारे बीच रहे,

22) अर्थात् योहन के बपतिस्मा से ले कर प्रभु के स्वर्गारोहण तक जो लोग बराबर हमारे साथ थे, उन में से एक हमारे साथ प्रभु के पुनरुत्थान का साक्षी बनें’’।

23) इस पर इन्होंने दो व्यक्तियों को प्रस्तुत किया-यूसुफ को, जो बरसब्बास कहलाता था और जिसका दूसरा नाम युस्तुस था, और मथियस को।

24) तब उन्होंने इस प्रकार प्रार्थना की, ’’प्रभु! तू सब का हृदय जानता है। यह प्रकट कर कि तूने इन दोनों में से किस को चुना है,

25) ताकि वह धर्मसेवा तथा प्रेरितत्व में वह पद ग्रहण करे, जिस से पतित हो कर यूदस अपने स्थान गया।

26) उन्होंने चिट्ठी डाली। चिट्ठी मथियस के नाम निकली और उसकी गिनती ग्यारह प्रेरितों में हो गयी।

सुसमाचार : सन्त योहन 15:9-17

9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।

12) मेरी आज्ञाा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।

📚 मनन-चिंतन

‘आज्ञा’ शब्द का तालुक अक्सर बल और नियमों से होता है, जबकि ‘आज्ञाकारिता’ शब्द में एक अनिच्छुक या उदास बच्चे की नकारात्मक भावना के अर्थ छिपे होते हैं। हालाँकि, जब ईश्वर की आज्ञाओं की बात आती है, तो आज्ञा वास्तव में एक उपहार है जो हमें सच्चे अर्थों में ईश्वर को प्यार करना सिखाता है और आज्ञाकारिता ईश्वर का अनुकरण करके उनके करीब आने का एक तरीका है। जब कोई दूसरे से प्यार करता है, तो वह उस व्यक्ति की तरह व्यवहार करने और उसके गुणों को अपनाने की कोशिश करता है।

ईश्वर की आज्ञाएँ मनमानी अथवा तानाशाही नहीं है बल्कि वे हमें हमारे सृस्तिकर्ता एवं मुक्तिदाता ईश्वर के पास आने में मददगार होती है। प्रभु येसु ने अपने स्वर्गिक पिता की आज्ञाओं का पालन किया और उनके प्रेम में बने रहे, और इसी तरह हमें भी करना है। कोई यह भी तर्क दे सकता है कि प्रभु येसु को दुःख उठाना पड़ा ताकि हम ये देख सकें कि ईश्वर भी दुःख-तकलीफों को सहन कर सकता है। दुख तथा मृत्यु की अंतिम पीड़ा मानवीय अनुभव हैं, जिन के लिए ईश्वर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, तथा प्रभु येसु ने इसलिए उन्हें साझा करने और उन्हें समृद्ध करके अपने ऊपर लिया। यीशु ने उन दुखद अनुभवों को सहने का चुनाव करके पिता और मानवता के लिए अपना प्रेम दिखाया। यही प्रेम का पूरा और सच्चा अर्थ है “जैसे पिता ने मुझ से प्रेम किया, वैसे ही मैंने तुम से प्रेम किया है।”

- फादर प्रीतम वसुनिया - इन्दौर धर्मप्रांत


📚 REFLECTION

The term ‘commandment’ is often associated with force and rules, while the term ‘obedience’ has negative connotations of an unwilling or sulky child. However, when it comes to God’s commands, a commandment is a gift that shows us how we can express our love for God, and obedience is a way to draw closer to God by imitating Him. When someone loves another, they often try to emulate that person and adopt their positive qualities. The commands of God are not arbitrary or domineering but are actually indications of how we can become closer to the infinite qualities of the creating and redeeming God. This is how Jesus kept His Father’s commandments and remained in His love, and it’s how we too can do the same.

One could even argue that Jesus had to suffer so that we could see that God can also endure suffering. Suffering and the ultimate suffering of death are human experiences that cannot be attributed to God, and so Jesus took them on to share and ennoble them. Jesus showed love for the Father and humanity by choosing to endure experiences that cannot touch an impassive God. This is the full meaning of the love expressed in ‘as the Father has loved me, so have I loved you.’

-Fr. Fr. Preetam Vasuniya - Indore Diocese

📚 मनन-चिंतन-2

प्रेरित संत मथियस एक ऐसा प्रेरित संत जिसे प्रभु येसु के बारह शिष्यों में से एक कहलाने का सौभाग्य मिला। संत मथियस का चुनाव यूदस के स्थान पर बहुत सोच विचार कर के किया गया। बारह संख्या इस्राएली जनता में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस्राएल के बारह वंश थे और यदि नयें इस्राएल को प्रेरितों से आना था तो उनका बारह होना आवश्यक था।

उनमें से एक यूदस इस्कारियोती ने येसु के साथ विश्वासघात कर स्वयं को फांॅसी लगा लिया था। प्रभु येसु के स्वर्गारोहण के बाद शिष्यगण अटारी पर प्रार्थना कर रहे थे- वहॉं पर पैत्रुस खड़े होकर यह कहा कि कोई दूसरा यूदस का पद ग्रहण करें। इस हेतु वे उनमें से चुनेंगे जो योहन के बपतिस्मा से येसु के पुनरुत्थान तक येसु के साथ रहे हो; और उनके बीच दो व्यक्तियों का नाम आता है जिसमें से संत मथियस का नाम चिठ्ठी के द्वारा सामने आता है और संत मथियस को बारहों में से एक चुना जाता है।

प्रभु येसु संत योहन 15ः16 में कहते है, ‘‘तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो।’’ प्रभु येसु विभिन्न लोगों को विभिन्न कार्यों के लिए चुनते है। संत मथियस भी उसी चुनाव में से एक था। संत मथियस के बारे में बाईबिल में ज्यादा तो नहीं लिखा हुआ है परंतु यह बताया जाता है कि संत पूरे निष्ठा से प्रभु येसु के सुसमाचार प्रचार प्रसार में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया।

प्रभु का कार्य को सम्पन्न करने के लिए आज भी प्रभु बहुतों को चुनते और नियुक्त करते है जिससे कि वे फल उत्पन्न कर सकें। आज हमें संत मथियस जैसे कई लोग चाहिए जो अपना जीवन प्रभु के लिए समर्पित कर देते है- प्रभु के सुसमाचार के लिए प्रभु के स्वर्गराज्य के लिए। हम प्रार्थना करें कि संत मथियस के पर्व के दिन एक सच्चा बुलाहट सभी को प्राप्त हों। आमेन!

फ़ादर डेनिस तिग्गा

📚 REFLECTION


Apostle St. Matthias is the St. who got the priviledge to be called among the twelve. The selection of St. Matthias instead of Judas was done with lot of thinking. The number twelve has a great significance in Israelites. There were twelve tribes of Israel and if the new Israel has to come from the disciples then they have to be twelve.

Among them Judas Iscariot betrayed Jesus and committed suicide. After the Ascension of the Lord the believers were praying in the upper room- there Peter stood up and told about taking the position of an overseer in the place of Judas. For this they will select the person who was with Jesus from the baptism of John till Jesus’ Resurrection; and the two names come in front of them among whom St. Matthias is being selected through the lot and St. Matthias is chosen among the twelve.

Jesus tells in John 15:16, “You did not choose me but I chose you. And I appointed you to go and bear fruit.” Lord Jesus chooses different people for different works. St. Matthias was among that chosen one. About St. Matthias not much is being found in the bible but it is being said that St. with full dedication has sacrificed his life for the proclamation and evangelization of Jesus Gospel.

To do God’s work Lord chooses and appoints many even now so that they may bear fruit. Today we need people like St. Matthias who offer their lives for the Lord- for the Gospel of the Lord, for the Kingdom of God. Let’s pray that on the feast of St. Matthias true vocation may be received by many. Amen!

-Fr. Dennis Tigga