मई 21, 2024, मंगलवार

सामान्य काल का सातवाँ सप्ताह

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📒 पहला पाठ : याकूब 4:1-10

13) आप लोगों में जो ज्ञानी और समझदार होने का दावा करते हैं, वह अपने सदाचरण द्वारा, अपने नम्र तथा बुद्धिमान व्यवहार द्वारा इस बात का प्रमाण दें।

14) यदि आपका हृदय कटु ईर्ष्या और स्वार्थ से भरा हुआ है, तो डींग मार कर झूठा दावा मत करें।

15) इस प्रकार की बुद्धि ऊपर से नहीं आती, बल्कि वह पार्थिव, पाशविक और शैतानी है।

16) जहाँ ईर्ष्या और स्वार्थ है, वहाँ अशान्ति और हर तरह की बुराई पायी जाती है।

17) किन्तु उपर से आयी हुई प्रज्ञा मुख्यतः पवित्र है और वह शान्तिप्रिय, सहनशील, विनम्र, करुणामय, परोपकारी, पक्षपातहीन और निष्कपट भी है।

18) धार्मिकता शान्ति के क्षेत्र में बोयी जाती है और शान्ति स्थापित करने वाले उसका फल प्राप्त करते हैं।

📙 सुसमाचार : मारकुस 9:30-37

30) वे वहाँ से चल कर गलीलिया पार कर रहे थे। ईसा नहीं चाहते थे कि किसी को इसका पता चले,

31) क्योंकि वे अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। ईसा ने उन से कहा, "मानव पुत्र मनुष्यों के हवाले कर दिया जायेगा। वे उसे मार डालेंगे और मार डाले जाने के बाद वह तीसरे दिन जी उठेगा।"

32) शिष्य यह बात नहीं समझ पाते थे, किन्तु ईसा से प्रश्न करने में उन्हें संकोच होता था।

33) वे कफ़रनाहूम आये। घर पहुँच कर ईसा ने शिष्यों से पूछा, "तुम लोग रास्ते में किस विषय पर विवाद कर रहे थे?"

34) वे चुप रह गये, क्योंकि उन्होंने रास्ते में इस पर वाद-विवाद किया था कि हम में सब से बड़ा कौन है।

35) ईसा बैठ गये और बारहों को बुला कर उन्होंने उन से कहा, "जो पहला होना चाहता है, वह सब से पिछला और सब का सेवक बने"।

36) उन्होंने एक बालक को शिष्यों के बीच खड़ा कर दिया और उसे गले लगा कर उन से कहा,

37) "जो मेरे नाम पर इन बालकों में किसी एक का भी स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह मेरा नहीं, बल्कि उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।"

📚 मनन-चिंतन

पेत्रुस द्वारा प्रभु येसु को मसीह के रूप में अंगीकार करने के पश्चात्, प्रभु येसु ने तीन बार अपने दुखभोग की भविष्यद्वाणी की, हालाँकि, उनके शिष्य उनके संदेश को समझने और स्वीकार करने में असमर्थ थे। उनकी असमर्थता उनकी उस बहस में साफ़ झलकती है जिसमे वे प्रभु के दुखभोग और मरण की भविष्यवाणी को नज़रंदाज़ कर एक दुसरे से बड़ा बनने की बात पर बहस करते हैं।

प्रभु येसु बड़ी ही संजीदगी से उन्हें स्वर्ग राज्य के रिवाज़ और वहां की व्यवस्था के बारे में बतलाते हैं। वे कहते हैं – ‘जो पहला होना चाहता है, वह सब का से पिछला बने और सबका सेवक बने। संत मत्ती 18:1-5 में इसी सन्दर्भ में प्रभु येसु एक बालक को उनके बीच खड़ा करके कहते हैं – “"मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।“

नन्हें बालकों में वह क्या है जो उन्हें स्वर्ग राज्य में प्रवेश लायक बनाता है तथा वयस्कों में वो क्या परिवर्तन आ जाता है जो उन्हें स्वर्ग राज्य से दूर करता है? सबसे पहली बात पवित्रता और मासूमियत प्रभु को बेहद प्रिय है जो बच्चों में भरपूरी से पाई जाती है पर वयस्कों से नदारद हो जाती है। बच्चों में स्वार्थ तो होता है पर अहंकार नहीं होता, दूसरों का नुकसान कर खुद को लाभ पहुँचाना, मनमुटाव रखना, खुद को दूसरों से श्रेष्ठ बनाने की होड़ आदि बच्चों में नहीं होती। पर वो जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है ये सारी चीज़ें उनसे दूर हो जाती है। आसान भाषा में कहें तो बच्चों में स्वार्गिक गुणों की भरमार होती है जबकि बड़ों में सांसारिक गुणों की।

प्रभु येसु अपने अनुययों से कहते हैं, कि स्वर्ग राज्य में प्रवेश करने के लिए हमें फिर से बच्चों जैसा मनोभाव अपनाना होगा।

- फादर प्रीतम वसुनिया - इन्दौर धर्मप्रांत


📚 REFLECTION

After Peter confessed the Lord Jesus as the Messiah, the Lord Jesus prophesied His passion death and resurrection three times, however, His disciples were unable to understand and accept His message. Their inability is evident in their argument about becoming greater than each other, ignoring God's prophecy of suffering and death. Jesus very seriously tells them about the costoms of the Kingdom of Heaven. He says, “One who wants to be first should be the last of all and become the servant of all.” It is in this context in Matthew 18:1-5 that Jesus puts a child in the midst of them and says, “I tell you most solemnly: If you do not become like little children again, you will not enter the kingdom of heaven.”

What is it in young children that enables them to enter the kingdom of heaven and what changes do adults bring about that makes them unqualified for the kingdom of heaven? First of all, purity and innocence are very dear to God, which is abundant in children but absent from adults. Children have no ego, they do not tend benefiting themselves by harming others, having estrangement, competition to make themselves superior to others, etc. But as he/she grows up, all these things go away from him/her. In simple language, children are full of heavenly qualities while adults are full of worldly qualities. The Lord Jesus tells His followers that to enter the kingdom of heaven we must have a childlike attitude again.

-Fr. Fr. Preetam Vasuniya - Indore Diocese

📚 मनन-चिंतन-2

कभी-कभी ऐसा होता है कि जब एक छात्र को कुछ भी समझ में नहीं आता है कि शिक्षक क्या पढ़ा रहा है, तो वह शिक्षक की बात सुनने के बजाय कक्षा में और कुछ कार्य करना शुरू कर लेता है। एक अच्छा और साहसी छात्र शिक्षक से स्पष्टीकरण मांगेगा, लेकिन शिक्षक से डरने वाला छात्र शिक्षक से स्पष्टीकरण मांगने की हिम्मत नहीं कर सकता है। येसु और उनके शिष्यों के साथ आज के सुसमाचार में कुछ ऐसा ही होता है। सुसमाचार लेखक हमें बताता है कि जब येसु अपने आसन्न दुख और मृत्यु के बारे में बोल रहे थे, तो शिष्यों को कुछ भी समझ नहीं आया और वे उनसे स्पष्टीकरण माँगने से डरते थे। इसलिए वे आपस में बहस करने लगे कि उनमें से कौन सबसे महान है। यह शायद उनके पसंदीदा विषयों में से एक था। येसु चाहते हैं कि उन्हें एहसास हो कि दूसरों की सेवा करने से ही वे महान बन सकते हैं। उन्होंने मसीह को पीड़ित सेवक के रूप में नहीं समझा था जो सेवा करने और अपना जीवन उन लोगों के लिए देने के लिए आये थे, जिनकी उन्होंने सेवा की थी। येसु के शिष्यों को येसु के सेवक होने के रहस्य को समझने की कोशिश करनी चाहिए और उन्हें अपने दैनिक जीवन में उनका अनुकरण करना चाहिए।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

It can happen that when a student does not understand anything of what the teacher has been teaching, he may start doing something else in the class instead of listening to the teacher any further. A good and courageous student would ask for clarifications, but a student who is afraid of the teacher may not dare asking the teacher for any clarification. Something similar happens in today’s gospel with Jesus and his disciples. The Gospel writer notes that when Jesus was speaking about his impending suffering and death, the disciples did not understand anything and they were afraid to ask him for any clarification. So they started arguing among themselves as to which of them was the greatest. This probably was one of their favorite topics. Jesus wants them to realize that it is by serving others that they can become great. They had not understood the Messiah as the suffering servant who came to serve and give his life for those whom he served. The disciples of Jesus should try to understand the mystery of the servanthood of Jesus and imitate him in their daily life.

-Fr. Francis Scaria