चालीसा काल – प्रभु के निकट आने का समय
प्रभु ईश्वर ने स्वतन्त्रता का विशिष्ठ वरदन के साथ हमारी सृष्टि की। एक स्वतन्त्र व्यक्ति को अपने लिए कई निर्णय लेना पडता है, कई बार विभिन्न विकल्पों के बीच चयन करना पडता है। प्रभु हमें अपने पवित्र वचनों के द्वारा इस प्रकार के निर्णय तथा चयन के लिए कुछ अनुदेश भी देते हैं तथा अपने विभिन्न निर्णयों तथा चयन के संभावित परिणाम के बारे में भी वह हमें अवगत कराते हैं। फिर भी हम कई बार गलत निर्णय तथा अनुचित चयन करते हैं। जब हमें अपने ही बुरे कर्मों के परिणाम भुगतना पडता है, तो हम फिर ईश्वर को याद करते हैं और यह महसूस करते हैं कि ईश्वर के निकट न रहने के कारण ही हमारे साथ यह सब हो रहा है। और यह वास्तविकता है।
चालीसा काल अपने प्रभु ईश्वर के पास वापस आने का समय है। योएल 2:12-14 हम पढ़ते हैं, “प्रभु यह कहता है, "अब तुम लोग उपवास करो और रोते तथा शोक मनाते हुए, पूरे हृदय से मेरे पास आओ"। अपने वस्त्र फाड कर नहीं, बल्कि हृदय से पश्चात्ताप करो और अपने प्रभु-ईश्वर के पास लौट जाओ; क्योंकि वह करूणामय, दयालु, अत्यन्त सहनशील और दयासागर है और वह सहज की द्रवित हो जाता है। क्या जाने, वह द्रवित हो जाये और तुम्हें आशीर्वाद प्रदान करे।”
ईश्वर के करीब आने का मतलब है – संसार से दूर रहना या, साफ शब्दों में, सांसारिकता से दूर रहना। एफेसियों को लिखते हुए सन्त पौलुस कहते हैं, “आप लोगों को अपना पहला आचरण और पुराना स्वभाव त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह बहकाने वाली दुर्वासनाओं के कारण बिगड़ता जा रहा है। आप लोग पूर्ण रूप से नवीन आध्यात्मिक विचारधारा अपनायें और एक नवीन स्वभाव धारण करें, जिसकी सृष्टि ईश्वर के अनुसार हुई है और जो धार्मिकता तथा सच्ची पवित्रता में व्यक्त होता है।” (एफेसियों 4:22-24)
रोमियों 12:2 में वे कहते हैं, “आप इस संसार के अनुकूल न बनें, बल्कि बस कुछ नयी दृष्टि से देखें और अपना स्वभाव बदल लें। इस प्रकार आप जान जायेंगे कि ईश्वर क्या चाहता है और उसकी दृष्टि में क्या भला, सुग्राह्य तथा सर्वोत्तम है।”
मत्ती 17:21 में प्रभु हमें यह समझाते हैं “प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से” हम शैतान के कुछ प्रलोभनों पर विजय नहीं पा सकते हैं। दानिएल बहुत शक्तिशाली और प्रभावशाली नबी थे। इस शक्ति को अपनाने के तरीके पर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं, “इन तीन सप्ताहों में मैंने सात्त्विक भोजन किया, मांस और अंगूरी से परहेज़ रखा और बदन पर तेल नहीं लगाया।” (दानिएल 10:3) प्रार्थना, उपवास, परहेज तथा भिक्षादान के कार्यों द्वारा हम अपने बुरी प्रवणताओं पर विजय पा सकते हैं। इस चालीसा काल में हम बुराइयों को छोड़ने तथा भलाई को बढ़ावा देने का प्रयत्न करें। प्रभु कहते हैं, “मैं जो उपवास चाहता हूँ, वह इस प्रकार है- अन्याय की बेड़ियों को तोड़ना, जूए के बन्धन खोलना, पददलितों को मुक्त करना और हर प्रकार की गुलामी समाप्त करना। अपनी रोटी भूखों के साथ खाना, बेघर दरिद्रों को अपने यहाँ ठहराना। जो नंगा है, उसे कपड़े पहनाना और अपने भाई से मुँह नहीं मोड़ना। तब तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी और तुम्हारा घाव शीघ्र ही भर जायेगा। तुम्हारी धार्मिकता तुम्हारे आगे-आगे चलेगी और ईश्वर की महिमा तुम्हारे पीछे-पीछे आती रहेगी।“ (इसायाह 58:6-8) इन बातों को मन में रखते हुए, आईए हम चालीसा काल बितायें। प्रभु हमें अनुग्रहित करें।
✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया