मैं विश्वास करता हूँ।

Smiley faceएलीज़बेथ ऊँचे स्वर से बोल उठी, ’’और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!’’ (लूकस 1:45) यह एक विश्वासी के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण है कि वह प्रभु की प्रतिज्ञाओं में अंत तक विश्वास करे। ईश्वर की प्रतिज्ञाओं के वचन उसके जीवन में पथ-प्रदर्शन का कार्य करते हैं। बाइबिल का ईतिहास ऐसे अनेकों उदाहरणों से भरा पडा है जिसमें प्रतिकूल परिस्थितियों में लोगों ने ईश्वर की प्रतिज्ञाओं में विश्वास नहीं किया और भटक कर नष्ट हो गये। मिस्र की गुलामी से मुक्त होकर प्रतिज्ञात देश की ओर अग्रसर लोग अपने अविश्वास के कारण ही नष्ट हो गये। ईश्वर ने उन्हें महान चमत्कारों एवं अविश्वसनीय सहायता के कार्यों के द्वारा मिस्र की गुलामी से निकाल लाये थे। किन्तु कठिनाई एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में उन्होंने प्रभु के कार्यों का स्मरण कर उन पर विश्वास करने की बजाये मिस्र की दासता को कहीं अधिक आरामदायक समझा। इस अविश्वास ने उनको प्रतिज्ञात देश पहुँचने नहीं दिया तथा वे मार्ग में ही भटक गये।

नून के पुत्र योशुआ को संबोधित करते हुये ईश्वर ने इस बात पर जोर दिया कि वह सदैव विश्वास में दृढ़ बना रहें, ’’दृढ़ बने रहो और ढारस रखो क्योंकि तुम उस देश पर इन लोगो का अधिकार कराओगे जिसे मैंने इनके पूर्वजो को देने की शपथ खायी थी। दृढ़ बने रहो और ढारस रखो। .....इस से तुम्हारा सर्वत्र कल्याण होगा। संहिता के इस ग्रन्थ की चरचा करते रहो। दिन-रात उसका मनन करो, जिससे उस में जो कुछ लिखा है तुम उसका सावधानी से पालन करो। .....क्या मैनें तुम से यह नहीं कहा दृढ़ बनें रहो और ढारस रखो? तुम न डरोगे और न घबराओगे क्योंकि तुम जहाँ कहीं भी जाओगे प्रभु तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे साथ होगा।’’ (योशुआ 1:6-9) ईश्वर के ये वचन इस बात को स्पष्ट करते है भले ही प्रतिज्ञायें महान है किन्तु उसको पाने का मार्ग अत्यंत कठिन और लम्बा भी हो सकता है। इसलिए ईश्वर जोर देकर योशुआ से ’’दृढ बने और ढारस रखने’’ को कहता है। योशुआ अंत तक प्रभु की प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासी बना तथा ईश्वर की इन्हीं प्रतिज्ञाओं पर विश्वास कर उसने अनेक कठिन एवं विषम परिस्थितियों पर विजयी प्राप्त की। योशुआ के विश्वास का स्मरण दिलाते हुए इब्रानियों के नाम पत्र में लेखक लिखते हैं, ’’विश्वास के कारण येरीखो की चारदीवारी गिर पड़ी, जब इस्राएली सात दिनों में सात बार उसकी परिक्रमा कर चुके थे।’’ (इब्रानियों 11:30) योशुआ एक तरफ तो बिना संदेह किये ईश्वर द्वारा निर्देशित कार्य को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम करता रहा तथा दूसरी ओर वह सदैव दृढ बना रहा।

विश्वास के मार्ग में ये दो कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है; कठिन परिश्रम तथा ईश्वर की योजना की पूर्ति। परिश्रम के बिना विश्वास व्यर्थ है। विश्वास से प्रेरित होकर किया गया कठिन परिश्रम स्थायी तथा प्रतिकूल फल उत्पन्न करता है। संत याकूब अपने पत्र में इस मानसिकता को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, ’’क्या तुम इसका प्रमाण चाहते हो कि कर्मों के अभाव में विश्वास व्यर्थ है? ...हमारे पिता इब्राहीम ....(को) तुम देखते हो कि उनका विश्वास क्रियाशील था और उनके कर्मों द्वारा ही पूर्णतः प्राप्त कर सका।’’(याकूब 2:20-22) इस प्रकार इस दृष्टिकोण को अपनाकर योशुआ विश्वास एवं कर्म के उदाहरण बने।

मरियम ने भी विश्सास से प्रेरित होकर अपने जीवन में कार्य किये। जब दूत ने मरियम को यह बताया कि, ’’देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीजबेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है’’। (लूकस 1:36) तब मरियम ने इस पर विश्वास करते हुए अपनी कुटुम्बिनी से मिलने निकल पडती है। ’’उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी। उसने जकरियस के घर में प्रवेश कर एलीजबेथ का अभिवादन किया।’’ (लूकस 1:39-40)

इब्राहिम भी विश्वास में अपने कार्यों के कारण ही महान बने। ईश्वर ने उनसे महान किन्तु रहस्यमयी प्रतिज्ञायें कर उनको पालन करने का आदेश दिया। उन्हें अपना सबकुछ छोड़कर उसे देश जाना था जो ईश्वर उन्हें प्रदान करेंगे। इस योजना में इब्राहिम को अनेक उतार-चढाव का सामना करना पडा। ऐसा प्रतीत होता था कि अस्थिर जीवन ही उसका भाग्य है। लेकिन एक बार भी इब्राहिम ने यह नहीं सोचा कि ईश्वर ने उसके साथ कोई मजाक किया है। इस प्रक्रिया में इब्राहिम को उसकी दासी से उत्पन्न पुत्र को त्यागना पडा। यहाँ तक कि उनके पुत्र इसहाक का भी बलिदान चढाने का आदेश ईश्वर ने दिया। ईश्वर के द्वारा किये सहायता के कार्य शायद इब्राहिम की स्मृति में रहे होगे इसलिए इस दयनीय परिस्थिति में भी उसने साहस का परिचय देते हुए कहा, ’’इब्राहीम ने उत्तर दिया, बेटा! ईश्वर होम के मेमने का प्रबन्ध कर देगा, और वे दोनों साथ-साथ आगे बढ़े।’’ (उत्पत्ति 22:8)

✍ - फादर रोनाल्ड मेलकम वॉन