1इसके बाद दाऊद उठ कर चला गया और योनातान नगर लौट आया। 2उसने उसे उत्तर दिया, "ऐसा नहीं होगा तुम नहीं मारे जाओगे। देखो, मुझे बताये बिना मेरे पिता कभी कोई छोटी या बड़ी बात नहीं करते। मेरे पिता मुझ से यह क्यों छिपायेंगे? यह हो नहीं सकता।" 3दाऊद ने उत्तर दिया, "तुम्हारे पिता अच्छी तरह जानते हैं कि तुम मुझे प्यार करते हो और इसलिए वह सोचते हैं कि योनातान को इस बात का पता न चले, नहीं तो वह दुःखी होगा। मैं प्रभु की शपथ और तुम्हारी शपथ खा कर कहता हूँ कि मेरे और मृत्यु के बीच अब केवल एक कदम की दूरी रह गयी है।" 4योनातान ने दाऊद से कहा, "तुम मुझ से जो कुछ चाहोगे, मैं तुम्हारे लिए वह सब करूँगा।" 5दाऊद ने योनातान से कहा, "देखों, कल अमावस है। मुझे राजा के साथ भोजन करना पडे़गा। इसलिए तुम मुझे जाने की अनुमति दो, जिससे मैं तीसरे दिन की शाम तक खेत में छिपा रहूँ। 6यदि तुम्हारे पिता मुझे ढूँढे, तो उन से कहना कि दाऊद ने मुझ से आग्रह किया कि मैं उसे अपने नगर बेथलेहेम जाने की अनुमति दूँ, क्योंकि वहाँ उसके सारे कुल के लिए वार्षिक बलिदान चढ़ाया जा रहा है। 7यदि वह कह दें कि ठीक है, तो तुम्हारे इस सेवक को कोई खतरा नहीं है। परन्तु यदि वह क्रुद्ध हो जायें, तो समझो कि वह मेरा बुरा करने पर उतारू हैं। 8तब मुझ, अपने सेवक पर कृपा करो, क्योंकि तुमने मुझ, अपने दास के साथ प्रभु के नाम पर मित्रता की है। यदि मैं दोषी हूँ, तो तुम स्वयं मुझे मार डालो, किन्तु अपने पिता के हवाले मत करो।" 9ष्योनातान ने उत्तर दिया, "ऐसा कभी नहीं होगा। यदि मुझे इसका पता होता कि मेरे पिता तुम्हारा बुरा करने पर ही उतारू हैं, तो मैं तुम्हें यह अवश्य बताता।" 10दाऊद ने योनातान से कहा, "तो मुझे कौन बतायेगा कि तुम्हारे पिता ने कठोर उत्तर दिया है।" 11योनातान ने दाऊद से कहा, "चलो, हम खेत चलें।" दोनों खेत चले गये। 12तब योनातान ने दाऊद से कहा, "प्रभु इस्राएल का ईश्वर यह जानता है कि कल या परसों मैं इसी समय अपने पिता की थाह लूँगा। यदि उनके मन में तुम्हारे प्रति सद्भाव होगा, तो मैं अवश्य ही किसी को भेज कर तुम्हें सूचित करूँगा। 13और यदि मेरे पिता तुम्हारा बुरा करना चाहेंगे, तो यदि वह मैं स्वयं तुम्हें न बताऊँ और तब यदि तुम्हें न जाने दूँ, जिससे तुम सुरक्षित रहो, तो प्रभु योनातान को कठोर-से-कठोर दण्ड दिलाये। प्रभु तुम्हारे साथ हो, जैसे वह मेरे पिता के साथ रहा है। 14जब तक मैं जीवित रहूँ, तुम मुझ पर प्रभु-जैसा अनुग्रह बनाये रखो, जिससे मेरा वध न किया जाये। 15मेरे घराने पर से अपनी कृपादृष्टि मत हटाओ-उस समय भी नहीं, जब ईश्वर पृथ्वी पर से दाऊद के सब शत्रुओं को मिटा देगा।" 16योनातान ने यह कहते हुए दाऊद के घराने के साथ मित्रता की, "प्रभु दाऊद के शत्रुओं को दण्डित करे।" 17फिर योनातान ने दाऊद को शपथ खिलायी कि वह योनातान को प्यार करता रहेगा; क्योंकि योनातान उसे अपने समान प्यार करता था। 18योनातान ने दाऊद से कहा, "कल अमावास है। तुम्हारा आसन ख़ाली होने के कारण पता चलेगा कि तुम अनुपस्थित हो। 19तीसरे दिन तुम लौट कर वहीं छिपे रहो, जहाँ तुम उस दिन छिपे थे और एजे़ल के पत्थर के पास बैठे रहो। 20मैं उस ओर तीन तीर इस प्रकार छोडूँगा, जैसे मैं उन्हें किसी निशाने पर चला रहा होऊँ। 21तब मैं एक लड़के से कहूँगा कि जाओ, तीर ढूँढ़ लाओ। यदि मैं उस लड़के से कहूँ, ‘तीर तुम्हारे इस तरफ़ है’, तो तुम आओ; क्योंकि तुम सुरक्षित होगे। जीवन्त प्रभु की शपथ! तुम को कुछ नहीं होगा। 22परन्तु यदि मैं उस लड़के से कहूँ, ‘देखो, तीर तुम्हारे उस तरफ़ है‘, तो तुम भाग जाओ; क्योंकि प्रभु चाहता है कि तुम चले जाओ। 23प्रभु मेरे और तुम्हारे बीच इस बात का सदा साक्षी रहेगा।" 24दाऊद ने अपने को खेत में छिपा रखा। 25अमावास के दिन राजा भोजन करने बैठा। राजा सदा की भाँति दीवार के पास अपने स्थान पर बैठा, उसके सामने योनातान और साऊल की बग़ल में अबनेर। 26दाऊद की जगह खाली रह गयी। उस दिन साऊल ने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि दाऊद निश्चय ही किसी कारण अशुद्ध होगा। 27जब अमावास के दूसरे दिन भी दाऊद की जगह ख़ाली रह गयी, तब साऊल ने अपने पुत्र योनातान से पूछा, "यिशय का पुत्र कल और आज भोजन पर क्यों नहीं आया?" 28योनातान ने साऊल को उत्तर दिया, "बेथलेहेम जाने के लिए दाऊद ने मुझ से आग्रहपूर्वक छुट्टी माँगी। 29उसने मुझ से कहा, ‘मुझे जाने दो; क्योंकि हमारा नगर बलिदान चढ़ाने वाला है। मेरे भाई ने मुझे बुला भेजा है। यदि तुम मुझे प्यार करते हो, तो मुझे जाने दो, जिससे मैं अपने भाइयों से मिल आऊँ।’ इसलिए वह राजा के साथ भोजन पर नहीं आया है।" 30तब साऊल को योनातान पर बड़ा क्रोध आया और उसने उस को फटकारते हुए कहा, "अरे तुम कुटिल और विद्रोही माँ के पुत्र! मैं जानता हूँ कि तुम अपना मुँह और अपनी माँ का मुँह काला करने के लिए यिशय के पुत्र का पक्ष लेते हो। 31जब तक यिशय का पुत्र पृथ्वी पर जीवित है, तब तक यह समझ लेना कि न तुम सुरक्षित रह सकते हो और न तुम्हारा राज्य। अब किसी को भेज कर उसे मेरे पास बुलवा लो। उसे अब मरना ही होगा।" 32योनातान ने अपने पिता साऊल से कहा, "वह क्यों मारा जायेगा? उसने क्या बिगाड़ा है?" 33इस पर साऊल ने उसे मारने के लिए उसकी ओर भाला चलाया। अब योनातान को विश्वास हो गया कि उसका पिता निश्चय ही दाऊद को मार डालना चाहता है। 34योनातान बहुत क्रोध में भोजन की मेज़ पर से उठ कर चल दिया। अमावास के दूसरे दिन उसने कुछ नहीं खाया। वह दाऊद के लिए बड़ा दुःखी था, क्योंकि उसके पिता ने उसका अपमान किया था। 35दूसरे दिन सबेरे योनातान निश्चित किये हुए स्थान पर खेत में दाऊद से मिलने गया। उसके साथ एक छोटा लड़का था। 36उसने उस लड़के से कहा, "दौड़ कर ये तीर ढुँढ लाओ, जिन्हें मैं छोड़ रहा हूँ।" जब लड़का दौड़ा, तब उसने उसके आगे एक तीर छोड़ा। 37जब वह लड़का योनातान के छोडे़ हुए तीर के पास आया, तब योनातान ने उस से पुकार कर कहा, "क्या तीर तुम से और आगे नहीं है?" 38तब योनातान ने फिर लड़के से कहा, "जल्दी आओ; रूको मत।" योनातान के साथ का लड़का तीर उठा कर अपने स्वामी के पास लौट आया। 39परन्तु लड़का कुछ जान न पाया। केवल योनातान और दाऊद ही यह बात जान सके। 40योनातान ने अपने हथियार अपने साथ के लड़के को दिये और उन्हें नगर में ले जाने की आज्ञा दी। 41लड़का चला गया, तो दाऊद अपने छिपने के स्थान से निकला और उसने पृथ्वी पर सिर झुका कर तीन बार प्रणाम किया। इसके बाद दोनों ही एक दूसरे के लिपट कर देर तक रोते रहे। अन्त में दाऊद सँभल गया 42और योनातान दाऊद से बोला, "शान्त मन से जाओ। हम दोनों ने प्रभु के नाम मित्रता की शपथ खायी-प्रभु सदा के लिए मेरे और तुम्हारे बीच, मेरे और तुम्हारे वंशजो के बीच साक्षी हो।"