1लीसियस को इन घटनाओं से बड़ा क्षोम हुआ। वह राजा का अभिभावक और संबंधी था और उसे राज्य का प्रबंध सौंपा गया था। 2कुछ दिन बाद वह अस्सी हजार पैदल सैनिक और अपना सारा घुड़सवार दल ले कर यहूदियों से लड़ने चल पड़ा। वह येरूसालेम में यूनानियों को बसाना चाहता था। 3उसका विचार था कि दूसरी जातियों के मंदिरों की तरह उस मंदिर पर भी कर लगेगा और वह प्रति वर्ष प्रधानयाजक का पद बेच देगा। 4उसने ईश्वर के सामर्थ्य का ध्यान नहीं रखा, उसे केवल अपने लाखों पैदल सैनिकों, हजारों घुडसवारों और अपने अस्सी हाथियों का भरोसा था। 5वह यहूदिया में प्रवेश कर बेत-सूर के पास पहुँचा। वह एक किलाबंद स्थान है, जो येरूसालेम से लगभग डेढ़ सौ फर्लांग दूर है। उसने उसका घेराव किया। 6जैसे ही मक्काबी के आदमियों ने सुना कि लीसियस ने किलाबंद नगर पर घेरा डाला है, तो वे सारी जनता के साथ रोते और विलाप करते हुए प्रभु से प्रार्थना करने लगे कि वह इस्राएल की रक्षा के लिए उन्हें एक सहायक दूत भेजे। 7मक्काबी ने स्वयं सब से पहले शस्त्रों से सुसज्जित हो कर दूसरों को उत्साहित किया कि वे जोखिम का सामना करते हुए अपने भाइयों की सहायता करें। वे एक साथ पूरे उत्साह से निकल पड़े। 8अभी वे येरूसालेम के पास ही थे कि एक घुड़सवार दिखाई पड़ा, जो उनके आगे-आगे चल रहा था। 9उन्होंने दयालु ईश्वर को एक स्वर में धन्यवाद किया और इसके बाद उन में इतना साहस भर आया कि वे न केवल मनुष्यों, बल्कि उग्र जानवरों का सामना करने और लोहे की दीवारों पर भी आक्रमण करने की तैयार हो गये। 10वे पंक्तिबद्ध हो कर आगे बढ़ते गये। उनके साथ स्वर्ग का वह सहायक था, जिसे दयालु प्रभु ने उन्हें भेजा था। 11वे सिंहों की तरह शत्रुओं पर टूट पडे़ और ग्यारह हजार पैदल सौनिकों तथा सोलह सौ घुडसवारों को मार गिराया। बचे हुए लोगों को उन्होंने खदेड़ दिया। 12उन में जो भागने में सफल हुए, वे अधिकांश घायल थे और उन्हें अपने हथियार खोने पड़े। लीसियस को भी लज्ज़ित हो कर भागना पडा़। 13लीसियस नासमझ व्यक्ति था जब उसने अपनी पराजय पर विचार किया, तो वह समझ गया कि इब्रानी लोग केवल इसलिए अजय हैं कि सर्वशक्तिमान् ईश्वर उनके लिए युद्ध करता है। 14इसलिए उसने उचित शर्तों पर यहूदियों के साथ संधि करने दूत भेजे। उसने उन्हें यह आश्वासन दिया कि वह राजा को उनके पक्ष में कर लेगा। 15मक्काबी लीसियस के ये सभी प्रस्ताव स्वीकार कर गया; क्योंकि उसने देखा कि लोगों का हित इसी में है। राजा ने भी वे सभी शर्तें स्वीकार कर ली, जिन्हें मक्काबी ने यहूदियों की ओर से लिख कर लीसियस को दिया था। 16यहूदियों के नाम लीसियस का पत्र इस प्रकार था: "लीसियस का यहूदियों को नमस्कार! 17आपके दूत योहन और अबसालोम ने मुझे आपका पत्र दिया और निवेदन किया कि मैं उस में लिखित प्रस्तावों का अनुमोदन करूँ। 18राजा के सामने जो कुछ प्रस्तुत करना था, उसे मैंने प्रस्तुत किया और उन्होंने जो उचित था, उसे स्वीकार किया। 19यदि भविष्य में आप लोग राज्य के प्रति सद्भाव बनाये रखेंगे, तो मैं भी आपके कल्याण के लिए प्रयत्न करता रहूँगा। 20मैंने अपने और आप लोगों के दूतों को आज्ञा दी है कि वे एक-एक विषय पर आप से बातचीत करें। 21आप लोगों का कल्याण हो! एक सौ अड़तालीसवें वर्ष के ज़्यूस करिंथस मास के चैबीसवें दिन।" 22राजा का पत्र इस प्रकार था: 23"भाई लीसियस को राजा अंतियोख का नमस्कार! हमारे पिता देवलोक सिधार गये। हमारी इच्छा है कि हमारे राज्य के लोग विश्वस्त हो कर अपने-अपने कामों में लगे रहें। 24हम सुनते हैं कि यहूदी हमारे पिता की इच्छा के अनुसार रहना चाहते हैं और इसलिए वे निवेदन करते हैं कि उन्हें अपने विधि-निषेधों के पालन की अनुमति दी जाये। 25हम चाहते हैं कि उस जाति को तंग नहीं किया जाये इसलिए हमने यह निर्णय किया कि उन्हें मंदिर लौटा दिया जाये और उन्हें अपने पूर्वजों के परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन बिताने की अनुमति दी जाये। 26अच्छा हो, यदि आप दूत भेज कर उन से संधि कर लें, जिससे वे हमारे विचार जान कर निश्चिन्त हो जायें और अपने कामों में शांतिपूर्वक लगे रहें।" 27लोगों के नाम राजा का पत्र इस प्रकार था: "यहूदियों की परिषद् तथा शेष यहूदियों को राजा अंतियोख का नमस्कार! 28हम आपका कल्याण चाहते हैं। हम सकुशल हैं। 29मनेलास ने हमें बतलाया है कि आप लोग अपने यहाँ लौट कर अपने काम-काज में लग जाना चाहते हैं। 30इसलिए जो यहूदी जंथिकस मास की तीसवीं तारीख तक ऐसा करेंगे, उन्हें आश्वासन दिया जाता है कि 31वे पहले की तरह भोजन-संबंधी अपने नियमों और अपने विधि-निषेधों का पालन कर सकते हैं। उन में किसी को भी अनजान में किये हुए अपराधों के लिए तंग नहीं किया जायेगा। 32मैंने मनेलास को भेजा, जिससे वह आप लोगों को आश्वासन दे। 33आप लोगों का कल्याण हो! एक सौ अड़तालीसवें वर्ष के जंथिकस मास के पन्द्रहवें दिन।" 34रोमियों ने भी उन्हें एक पत्र भेजा। वह इस प्रकार था: "यहूदियों को क्विन्तुस मम्मियुस और तितुस मानियुस नामक राजदूतों का नमस्कार! 35राजा के संबंधी लीसियस ने आप लोगों को जिन बातों की अनुमति दी है, उस से हम भी सहमत हैं। 36जिन बातों के संबंध में उन्होंने राजा की राय लेना उचित समझा, आप उन पर विचार कर लेने के बाद किसी को शीघ्र हमारे पास भेज दें, जिससे हम वे बातें आपकी ओर से राजा के सामने प्रस्तुत कर सकेंं। कारण यह है कि हम अंताकिया जाने वाले हैं। 37इसलिए आप शीघ्र ही कुछ लोगों को हमारे पास भेजंे, जिससे हमें आपके विचारों का पता चले। 38आप लोग स्वस्थ रहें! एक सौ अडतालीसवें वर्ष के जंथिकस मास के पन्द्रहवें दिन।"