1समझौते की इन बातों के बाद लीसियस राजा के पास लौट गया और यहूदी लोग अपनी खेती में लग गये। 2किन्तु उस प्रान्त के कई सेनापति -तिमोथेव, गन्नैयस का पुत्र अपल्लोनियस, हीरोनिमस, देमोफ़ोन और साइप्रस का सेनापति निकानोर-यहूदियों को शान्ति से रहने नहीं देते थे। 3याफ़ावासियों ने यह दुष्टता की। उन्होंने अपने साथ रहने वाले यहूदियों से कहा कि वे अपनी पत्नियों और बाल-बच्चों के साथ नावों पर सवार हो जायें, जो उन्होंने तैयार रखी थीं। उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि उनके प्रति कोई बैर नहीं था। 4यह नगरपालिका का प्रबन्ध था। इस पर यहूदियों ने उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया; क्योंकि वे उनके साथ शान्ति-पूर्वक रहना चाहते थे और उन्हें लगा कि इस में धोखे की कोई बात नहीं है। जब वे खुले समुद्र में आ गये, तो उन नावों को डुबा दिया गया, जिन पर लगभ् 5जैसे ही यूदाह को अपने जाति-भाइयों के साथ की हुई क्रूरता का पता चला, उसने अपने आदमियों को बुला भेजा। 6उसने निष्पक्ष न्यायकर्ता ईश्वर की दुहाई दी और अपने भाइयों के हत्यारों के विरुद्ध चल पड़ा। उसने रातोंरात बन्दरगाह में आग लगा दी, नावें जला दीं और जिन लोगों ने वहाँ शरण ली थी, उन्हें मार दिया। 7नगर के फाटक बन्द कर दिये गये थे, इसलिए वह इस विचार से चला गया कि वह बाद में लौट कर सारा याफा नष्ट कर देगा। 8जब उसने सुना कि यमनिया के लोग भी अपने साथ रहने वाले यहूदियों के साथ वैसा ही करना चाहते थे, 9तो उसने यमनिया के निवासियों पर रात में आक्रमण किया और उस बन्दरगाह तथा वहाँ की नावों को जला दिया। उस आग की ज्वाला येरूसालेम तक दिखाई देती थी, जो वहाँ से पचास किलोमीटर दूर है। 10यहूदियों ने वहाँ से तिमोथेव के विरुद्ध प्रस्थान किया। वे दो किलोमीटर भी पूरे नहीं कर सके कि उन पर अरब टूट पड़े जिनकी संख्या कम-से-कम पाँच हजार पैदल सैनिक और पाँच सौ घुड़सवार थे। 11घमासान युद्ध हुआ, किन्तु अन्त में यूदाह के आदमी ईश्वर की कृपा से विजयी हुए। पराजित खानाबदोश लोग यूदाह से दया की याचना करने लगे। उन्होंने उसे पशु देने का वचन दिया और यह वादा किया कि वे हर प्रकार से उसकी सहायता करेंगे। 12यूदाह जानता था कि वे सचमुच बहुत सी बातों में उसकी सहायता कर सकते हैं, इसलिए उसने उनकी शान्ति की बात स्वीकार कर ली। वे उस से हाथ मिला कर अपने तम्बुओं में लौट गये। 13इसके बाद यूदाह ने एक ऐसे नगर पर आक्रमण किया जो, बाँध और चार दीवारी से घिरा था। उस में कई जातियों के लोग रहते थे। उसका नाम कस्पिन था। 14उस नगर के निवासियों को चार दीवारी की सुदृढ़ता पर और नगर में खाद्य-सामग्री के भण्डारों का भरोसा था, इसलिए वे यूदाह के आदमियों पर ताना मारने, उनका अपमान करने, ईशनिन्दा और अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करने लगे। 15इस पर यूदाह के आदमियों ने संसार के प्रभु की दुहाई दी, जिसने योशुआ के समय भित्तिपातकों और घेरे के यन्त्रों का प्रयोग किये बिना येरीखो की चारदीवारी गिर दी थी। वे जंगली पशुओं की तरह दीवार पर टूट पड़े। 16उन्होंने ईश्वर की इच्छा से नगर अपने अधिकार में कर लिया और उस में इतने लोगों का वध किया कि नगर के पास का तालाब, जो आधा किलोमीटर चैड़ा था, रक्त से भरा हुआ दिखाई देता था। 17वे वहाँ से एक सौ चालीस किलोमीटर आगे बढ़ कर यहूदियों के यहाँ खारक्स पहुँचे, जो तूबी कहलाते हैं। 18उन्हें वहाँ तिमोथेव नहीं मिला, क्योंकि वह किसी से कुछ कहे बिना वहाँ से चला गया था; किन्तु उसने वहाँ के किसी स्थान पर एक बड़ी रक्षक-सेना रख दी थी। 19दोसिथेव और सोसीपतेर ने, जो मक्काबी के सेनापति थे, उस स्थान पर आक्रमण किया और तिमोथेव के उस गढ़ में रखे हुए लोगों को समाप्त कर दिया। उनकी संख्या दस हजार से अधिक थी। 20अब मक्काबी ने अपनी सेना को दलों में विभाजित किया, उनके अध्यक्ष नियुक्त किये और तिमोथेव की ओर प्रस्थान किया, जिसके पास एक लाख बीस हजार पैदल सैनिक और ढ़ाई हजार घुड़सवार थे। 21जैसे ही यूदाह पास आया, तिमोथेव ने स़्त्रियों और बच्चों को अपने सामान के साथ करनियन नामक स्थान भेज दिया। वहाँ एक अजेय गढ़ था, क्योंकि वहाँ तक पहुँचने की घाटियाँ सँकरी थीं। 22जैसे ही यूदाह का प्रथम दल पहुँचा, शत्रुओं पर आतंक छा गया, क्योंकि उन्हें सर्वदृष्टा ईश्वर के दर्शन हुए। उन में भागदौड़ मच गयी। वे इधर-उधर इस तरह भागने लगे कि वे अपने ही आदमियों के हाथों घायल हो जाते और अपनी ही तलवारों की धार के शिकार बन जाते। 23यूदाह ने उन्हें बुरी तरह खदेड़ा और उन दुष्टों को- लगभग तीस हजार लोगों को-मार गिराया। 24तिमोथेव स्वयं ही दोसिथेव और सोसीपतेर के आदमियों के हाथ पड़ गया। उसने कपटपूर्ण बातें करते हुए जीवनदान माँगा। उसने यह कहा कि उन में कितनों के माता-पिता और भाई बन्धु उसके वश में हैं; अगर वे उसे मुक्त नहीं करेंगे, तो उनके सम्बन्धियों के साथ बहुत बुरा व्यवहार होगा। 25जब तिमोथेव ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह उनके सम्बन्धियों को सकुशल जाने देगा, तो उन्होंने उसे मुक्त कर दिया, जिससे उनके भाई-बन्धुओं की रक्षा हो सके। 26वहाँ से यूदाह करनियन और अतरगातिस के मन्दिर की ओर बढ़ा। उसने वहाँ पहुँच कर पच्चीस हज़ार आदमियों का वध किया। 27इन शत्रुओं की पराजय और विनाश के बाद यूदाह ने अपनी सेना के साथ किलाबन्द नगर एफ्रोन की ओर प्रस्थान किया, जहाँ लीसियस तथा कई जातियों के बहुत-से लोग निवास करते थे। तगड़े युवकों की सेना चारदीवारी के बाहर पंक्तिबद्ध थी और उसने वीरतापूर्वक विरोध किया। नगर के अन्दर युद्धयन्त्रों और अस्त्रक्षेपकों की भरमार थी। 28यहूदियों ने उस सर्व शक्तिमान की दुहाई दी, जो अपने सामर्थ्य से शत्रुओं को रौंदता है। इसके बाद उन्होंने नगर को अपने अधिकार में किया और वहाँ लगभग पच्चीस हजार निवासियों का वध किया। 29वे वहाँ से स्कूतापुलिस की ओर बढ़े, जो येरूसालेम से एक सौ चालीस किलोमीटर दूर है। 30वहाँ के रहने वाले यहूदियों ने यह साक्ष्य दिया कि स्फूतापुलिस के निवासी उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और कि उन्होंने विपत्ति के समय उनका मैत्रीपूर्ण स्वागत किया था। 31इसलिए यूदाह और उसके साथियों ने नागरिकों को धन्यवाद दिया और उन से अनुरोध किया कि वे भविष्य में भी यहूदियों के साथ अच्छा व्यवहार करते रहें। इसके बाद वे येरूसालेम लौट गये; क्योंकि अब सप्ताहों का पर्व निकट था। 32उस पर्व के बाद, जो पेन्तेकोस्त कहलाता है, वे इदूमैया के शासक गोरगियस के विरुद्ध चल पड़े। 33वह तीन हज़ार पैदल सैनिकों और चार सौ घुड़सवारों के साथ उनका सामना करने आया। 34वे एक दूसरे से भिड़ गये और युद्ध में थोड़े ही यहूदी खेत रहे। 35बकेनोर के आदमियों में दोसिथेव नामक व्यक्ति ने, जो शूरवीर घुड़वार था, गोरगियस को उसके लबादे से पकड़ कर ज़ोरों से अपनी ओर खींचा, जिससे वह उस अभिशप्त को जीवित ही पकड़ ले। लेकिन एक थ्राकी घुड़सवार ने दोसिथेव पर प्रहार कर उसकी बाँह काट दी। इ 36एसिद्रिस के आदमी देर तक लड़ते-लड़ते थक गये। तब यूदाह ने प्रभु से प्रार्थना की कि वह अपने को यहूदियों का सहायक और सेनापति प्रमाणित करे। 37उसने अपनी मातृभाषा में भजन गाया और युद्ध का नारा लगा कर गोरगियस के आदमियों को भगा दिया। 38यूदाह अपनी सेना ले कर अदुल्ला पहुँचा। सप्ताह का अन्त निकट था; अतः उन्होंने प्रथा के अनुसार अपने को पवित्र कर, वहीं विश्राम-दिवस मनाया। 39दूसरे दिन यूदाह और उसके साथी वध किये गये लोगों के शव एकत्र करने और उन्हें पूर्वजों की कब्रों में अपने सम्बन्धियों के साथ दफनाने लगे। इस कार्य में अब देर नहीं की जा सकती थी। 40अब पता चला कि प्रत्येक मारे हुए व्यक्ति के कपड़ों के नीचे यमनियों की देवमूर्तियों के ताबीज थे; संहिता के अनुसार यहूदी ऐसी वस्तुएँ अपने पास नहीं रख सकते थे। अब सब के सामने यह स्पष्ट हो गया कि वे इसी पाप के कारण मारे गये हैं। 41इस पर सबों ने निष्पक्ष न्यायकर्ता का धन्यवाद किया, जो गुप्त बातें प्रकाश में लाता है। 42इसके बाद उन्होंने प्रार्थना की और यह निवेदन किया कि उनके किये हुए अपराध पूर्णतः क्षमा कर दिये जायें। वीर यूदाह ने लोगों से अनुरोध किया कि वे अपने को पाप से बचाये रखें; क्योंकि उन्होंने अपनी आँखें से देखा था कि मारे हुए लोगों के पाप के कारण उन पर क्या बीती थी। 43इसके बाद यूदाह ने लगभग दो हजार रुपये का चन्दा एकत्र किया और उसे येरूसालेम भेज दिया, जिससे वहाँ पाप के प्रायश्चित के रूप में बलि चढ़ायी जाये। उसने पुनरुत्थान का ध्यान रख कर यह उत्तम तथा सराहनीय कार्य सम्पन्न किया। 44यदि उसे मृत सैनिकों के पुनरुत्थान की आशा नहीं होती, तो मृतकों के लिए प्रार्थना करना मूर्खतापूर्ण तथा निरर्थक होता। 45उसका उद्देश्य पवित्र तथा पुनीत था, क्योंकि वह जानता था कि प्रभु-भक्ति में मरने वालों के लिए एक अपूर्व पुरस्कार सुरक्षित है। 46इसलिए उसने प्रायश्चित्त के बलिदान का प्रबन्ध किया, जिससे मृतक अपने पाप से मुक्त हो जायें।