मक्काबियों का दूसरा ग्रन्थ

अध्याय 14

1तीन वर्ष बाद यूदाह और उसके आदमियों को यह मालूम हुआ कि सिलूकस का पुत्र देमेत्रियस एक बड़ी सेना और एक बेड़े के साथ त्रीपुलिस बन्दरगाह पहुँच गया है 2तथा उसने अन्तियोख और उसके प्रशासक लीसियस को मरवा कर देश पर अधिकार कर लिया है। 3अलकिमस पहले प्रधानयाजक था और उसने विद्रोह के समय स्वेच्छा से अपने को अपवित्र किया। जब उसने देखा कि वह फिर कभी पवित्र वेदी की सेवा नहीं कर पायेगा, 4तो वह एक सौ इक्यानवें वर्ष राजा देमेत्रियम के पास पहुँचा। उसने येरूसालेम के मन्दिर की प्रथा के अनुसार उसे सोने का एक मुकुट, खजूर की डाली और जैतून की कुछ टहनियाँ भेंट कीं। उसने उस दिन और कुछ नहीं किया। 5लेकिन एक दिन उसे तब अपने उन्माद की सफलता का अवसर मिला, जब देमेत्रियस ने उसे अपनी सभा में बुलाया और उससे पूछा कि यहूदियों के क्या मनोभाव और क्या योजनाएँ हैं। 6उसने उत्तर दिया, "जो यहूदी हसीदी कहलाते हैं और जिनका नेता यूदाह मक्काबी है, वे युद्ध और विद्रोह का अवसर ढूँढ़ते रहते हैं और राज्य में अशान्ति फैलाते हैं। 7इस कारण मुझे अपने पूर्वजों की प्रतिष्ठा, अर्थात् प्रधानयाजक के पद से वंचित किया गया है और 8मैं इसलिए आया हूँ कि मैं हृदय से राजा का हित और अपने देश-भाइयों का कल्याण चाहता हूँ; क्योंकि उन लोगों के मूर्खतापूर्ण व्यवहार के कारण, जिनका उल्लेख कर चुका हूँ, हमारी समस्त जनता को बहुत-से कष्ट झेलने पड़ते हैं। 9राजा! आप को अब उन सब बातों की जानकारी प्राप्त हो गयी है, इसलिए मैं आप से निवेदन करता हूँ कि आप सब के प्रति अपने सद्भाव के अनुसार हमारे देश और हमारी पददलित जनता का कल्याण करें। 10जब तक यूदाह उनका नेता है, राज्य में शान्ति रहे, यह असम्भव है।" 11अलकिमस के इन शब्दों के तुरन्त बाद राजा के अन्य मित्र, जो यूदाह के शत्रु थे, देमेत्रियस का क्रोध भड़काने लगे। 12इस पर उसने निकानोर को, जो गज-सेना का अध्यक्ष रह चुका था, यहूदिया का राज्यपाल नियुक्त किया। 13और उसे यह आदेश दे कर भेजा कि वह यूदाह को समाप्त कर दे, उसके आदमियों को तितर-बितर कर दे और अलकिमस को महामन्दिर का प्रधानयाजक नियुक्त करे। 14जो गैर-यहूदी यूदाह के कारण यहूदिया से भाग गये थे, अब वे झुण्ड के झुण्ड निकानोर के पास यह सोच कर आने लगे कि यहूदियों के दुर्भाग्य और विपत्तियों से हमें लाभ होगा। 15जैसे ही यहूदियों को निकानोर के आगमन और गैर-यहूदियों के आक्रमण की योजना का पता चला, वे अपने सिर पर राख डाल कर उस से प्रार्थना करने लगे, जिसने सदा के लिए अपनी प्रजा को बसाया था और जो सुस्पष्ट चमत्कारों से अपनी विरासत की सहायता करता रहता है। 16वे अपने सेनापति के आदेश पर तुरन्त वहाँ से चल कर दस्साव नामक गाँव के पास शत्रुओं पर टूट पड़े। 17यूदाह के भाई सिमोन ने निकानोर की सेना पर आक्रमण तो किया था, किन्तु शत्रु के अप्रत्याशित विरोध के कारण उसे पराजित हो कर धीरे-धीरे हट जाना पड़ा। 18फिर भी यह जानकर कि यूदाह के आदमियों में कितनी बहादुरी है और स्वदेश की रक्षा के लिए वे कितने उत्साह के साथ लड़ सकते हैं, निकानोर निर्णयात्मक युद्ध करने से डरता था। 19उसने पस्सिदोनियस, थेवदतस और मत्तथ्या को भेज कर सन्धि का प्रस्ताव किया। 20प्रस्ताव की शर्तों का अध्ययन करने के बाद सेनापति ने उन्हें सैनिकों को समझाया। उन्होंने सर्वसम्मति से प्रस्ताव स्वीकार किया 21और एक दिन निश्चित किया, जब दोनों सेनापति एक दूसरे से अकेले में मिलेंगे। दोनों सेनाओं की ओर से एक-एक रथ आगे बढ़ा और दोनों के बीच आसन रखे गये। 22उधर यूदाह ने उपयुक्त जगहों पर सशस्त्र सैनिक छोड़ रखे थे, जिससे शत्रु अचानक विश्वासघात न कर पाये। मामला पूरी तरह तय हो गया। 23बाद में निकानोर येरूसालेम में पड़ा रहा लेकिन उसने संहिता के प्रतिकूल कभी कदम नहीं उठाया। उसने उन लोगों को विदा किया, जो उसके साथ आये थे। 24वह प्रत्येक अवसर पर यूदाह को अपने साथ रखने लगा, क्योंकि वह उसे हृदय से चाहने लगा था। 25उसने उसे विवाह करने और गृहस्थ जीवन बिताने की सलाह दी। यूदाह ने विवाह कर लिया और वह शान्ति में जीवन का आनन्द उठाने लगा। 26जब अलकिमस ने उनकी मित्रता देखी, तो वह सन्धि की एक प्रति ले कर देमेत्रियस के पास गया। उसने उस से कहा कि निकानोर देशद्रोही बन गया है, क्योंकि उसने विद्रोही यूदाह को अपना साथी बना लिया है। 27राजा क्रुद्ध हुआ और उस दुष्ट के मिथ्या अभियोगों से उत्तेजित हो कर निकानोर को लिखा कि वह उस सन्धि से सहमत नहीं है और उसे आज्ञा देता है, कि वह मक्काबी को बँधवा कर अविलम्ब अन्ताकिया भेजे। 28जब निकानोर को यह आदेश मिला, तो उसे बड़ा दुःख हुआ। सन्धि रद्द करना उसे अच्छा नहीं लगा, क्योंकि यूदाह ने कोई अनुचित बात नहीं की थी। 29राजा के आदेश की अवज्ञा करना उसके लिए सम्भव नहीं था, इसलिए वह उसे कपटपूर्ण ढंग से पूरा करने का अवसर ढूँढ़ने लगा। 30इधर जब मक्काबी ने देखा कि निकानोर अब उस से कतराने-सा लगा है और उसकी घनिष्ठता अब रूखाई में बदल गयी है, तो वह समझने लगा कि इस रूखाई का परिणाम अच्छा नहीं होगा। उसने बड़ी संख्या में अपने आदमियों को अपने पास बुलाया और निकानोर से छिप कर रहने लगा। 31जब निकानोर को पता चला कि वह व्यक्ति बड़ी चालाकी से उसके हाथ से निकल भागा, तो वह परम-पावन मन्दिर जा कर याजकों को, जो नियमित बलियाँ चढ़ा रहे थे, यह आदेश दिया कि वे यूदाह को उसके हवाले कर दें। 32उन्होंने शपथ खा कर कहा कि वे नहीं जानते थे कि वह व्यक्ति कहाँ है, जिसे वह ढूँढ़ता है। 33इस पर उसने मन्दिर की ओर अपना दाहिना हाथ उठा कर यह शपथ खायी, "यदि तुम लोग यूदाह को बाँध कर मेरे हवाले नहीं करोगे, तो मैं यह मन्दिर ढा कर और बलि की वेदी गिरा कर इसी स्थान पर दियोनीसियस के लिए एक विशाल मन्दिर बनवाऊँगा।" 34यह कह कर वह वहाँ से चला गया। याजकों ने स्वर्ग की ओर हाथ जोड़ कर यह कहते हुए उस से प्रार्थना की, जो सदा हमारी प्रजा का सहायक रहा, 35"सर्वेश्वर प्रभु! तुझे किसी बात की कमी नहीं, फिर भी तूने हमारे बीच मन्दिर के रूप में अपना निवास बनवाना चाहा है। 36परमपावन प्रभु! समस्त पवित्रता के स्रोत! इस मन्दिर को कभी अपवित्र नहीं होने दे, जिसका अभी-अभी शुद्धीकरण हुआ है।" 37निकानोर के यहाँ राजिस पर अभियोग लगाया गया। वह येरूसालेम की परिषद् का सदस्य, नगर का शुभचिन्तक और जनता में सम्मानित था। वह अपने उपकारों के कारण यहूदियों का पिता कहलाता था। 38पहले विद्रोह में उसे यहूदी राष्ट्रवादी होने के कारण दण्ड दिया गया था और उसने यहूदी संस्कृति के लिए बहुत दृढ़तापूर्वक तन-मन से संघर्ष किया था। 39निकानोर ने यहूदियों के प्रति बैर का प्रमाण देने के उद्देश्य से पाँच सौ से अधिक आदमियों को उसे गिरफ्तार करने भेजा। 40उसका विचार था कि इस गिरफ्तारी से यहूदियों को भारी धक्का लगेगा। 41जब सैनिक बुर्ज पर अधिकार करने के लिए प्रवेश फाटक पर प्रहार करने लगे और उन्हें द्वारों में आग लगाने का आदेश मिला, तो यह देख कर कि अब उसके बचने का कोई उपाय नहीं है, राजिस ने स्वयं अपने पेट में तलवार भोंक ली। 42उन दुष्टों के हाथ पड़ने और अपनी कुलीनता के प्रतिकूल घोर अपमान का शिकार बनने की अपेक्षा उसने गौरव के साथ मरना उचित समझा। 43किन्तु उसने हड़बड़ी में अपने पर घातक प्रहार नहीं किया। जब उसने देखा कि वे लोग फाटक से घुस रहे हैं, तो वह शूरवीर की तरह दीवार पर चढ़ गया और वहाँ से साहसपूर्वक नीचे खड़े लोगों के बीच कूद पड़ा। 44वे लोग तुरन्त हट गये, जिससे वह एक खाली जगह आ गिरा। 45यद्यपि उसके भारी घावों से खून बह रहा था, फिर भी वह अभी जीवित था। वह क्रोध में उठा और भीड़ पार कर एक ऊँची चट्टान पर खड़ा हो गया। 46उसका रक्त बह गया था, तो उसने दोनों हाथों से अपनी अँतड़ियाँ निकाल कर लोगों के बीच फेंक दीं। उसने जीवन और जीव के प्रभु से प्रार्थना की कि वह उन्हें किसी दिन उसे लौटा दे और उसकी मृत्यु हो गयी।