मक्काबियों का दूसरा ग्रन्थ

अध्याय 15

1जब निकानोर को पता चला कि यूदाह के आदमी समारिया में एकत्र हैं, तो उसने सुरक्षा के विचार से विश्राम के दिन ही उन पर आक्रमण करने का निश्चय किया। 2दबाव के कारण जो यहूदी उसके साथ थे, उन्होंने उस से कहा, "आप क्रूर और बर्बर रीति से उनका वध न करें। आप उस दिन का आदर करें, जिसे सर्वज्ञ ईश्वर ने प्रारम्भ से सम्मानित और पवित्र किया है।" 3लेकिन उस अभिशप्त व्यक्ति ने पूछा, "क्या स्वर्ग में कोई प्रभु है, जिसने विश्राम का दिन मनाने का आदेश दिया है?" 4उन्होंने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया, "स्वयं जीवन्त प्रभु, स्वर्ग के सर्वशक्तिमान् शासक ने सातवाँ दिन पवित्र करने का आदेश दिया है"। 5इस पर उसने कहा, "तो मैं इस पृथ्वी का शासक हूँ और मैं यह आज्ञा देता हूँ कि तुम अस्त्र-शस्त्र धारण कर राजाज्ञा का पालन करो"। किन्तु वह दुष्ट अपनी योजना में सफल नहीं हुआ। 6निकानोर ने उत्कट घमण्ड में निश्चय किया कि वह यूदाह और उसके आदिमयों की लूट से एक भव्य स्मारक का निर्माण करेगा। 7किन्तु मक्काबी अटल विश्वास से प्रभु की सहायता की प्रतीक्षा करता रहा। 8उसने अपने आदमियों को समझाया कि वे विदेशियों के इस आक्रमण से नहीं डरें, बल्कि याद रखें कि उन्हें कितनी ही बार स्वर्ग की ओर से सहायता मिल चुकी है। इसलिए वे अब भी विश्वास करें कि सर्वशक्तिमान् उन्हें विजय दिलायेगा। 9उसने संहिता और नबियों का हवाला देते हुए हुए उन्हें उत्साहित किया। उसने उन्हें याद दिलाया कि वे कितनी लडाइयाँ लड़ चुके हैं। 10उसने उन में लडने का उत्साह भर कर यह भी बतलाया कि विदेशी कैसे विश्वासघाती है और कैसे अपनी शपथें भंग करते रहे हैं। 11इस प्रकार उसने ने केवल ढालों और भालों से, बल्कि अपनी प्रभावशाली बातों से प्रत्येक व्यक्ति को तैयार किया। इसके बाद उसने उन्हें एक विश्वास योग्य स्वप्न के विषय में भी बताया, जिससे सभी अत्याधिक आनन्दित हो उठे। 12उसका वह दर्शन इस प्रकार था: उसने देखा कि ओनियस, जो कभी प्रधानयाजक रह चुका था, जो कुलीन और विनम्र व्यक्ति था तथा जिसका व्यवहार बड़ा मधुर था, जो अच्छा वक्ता था और बचपन से ही सभी सद्गुणों से संपन्न था, हाथ उठा कर समस्त यहूदी प्रजा के लिए प्रार्थना कर रहा है। 13इसके बाद यूदाह को एक ऐसा पुरुष दिखाई पडा, जो उसी तरह प्रार्थना कर रहा था। वह वृद्ध था और उसका स्वरूप गौरव, ऐश्वर्य और प्रताप से समन्वित था। 14तब ओनियस ने यूदाह से कहा, "यह ईश्वर के नबी यिरमियाह हैं, जो अपने भाइयों को प्यार करते और अपने देश-भाइयों और पवित्र नगर के लिए बराबर प्रार्थना करते हैं"। 15इसके बाद यिरमियाह ने दाहिना हाथ बढ़ा कर यूदाह को सोने की एक तलवार देते हुए कहा, 16"यह पवित्र तलवार ले लो, यह ईश्वर का उपहार है। इस से तुम शत्रुओं को कुचल दोंगे।" 17यूदाह की प्रभावशाली बातों ने उन का साहस बँधाया और युवकों के हृदयों को उत्साह से भर दिया। इसलिए यहूदियों ने निश्चिय किया कि वे पड़ाव न डाल कर सीधे साहस के साथ आक्रमण करेंगे और पूरी शक्ति से लड़ कर निर्णयात्मक युद्ध करेंगे; क्योंकि नगर, स्वधर्म और मंदिर खतरे में थे। 18उन्हें अपनी पत्नियों, बाल-बच्चों और भाई-बंधुओं की भी चिंता थी, लेकिन यह चिंता उतनी नहीं थी, जितनी पवित्र मंदिर की। 19वे लोग भी बड़ी चिंता में थे, जो नगर में पड़े थे। वे इस बात से घबरा रहे थे कि लडाई खुले मैदान में होने जा रही थी। 20युद्ध का परिणाम जानने को सभी उत्सुक थे। इतने में शत्रु की सेना एकत्र हो गयी और व्यहूरचना कर चुकी। हाथियों को उपयुक्त स्थानों पर रखा गया और घुड़सवारों को पाश्र्वभागों में। 21जब मक्काबी ने शक्तिशाली शत्रु को निकट आते देखा और यह देखा कि उनके पास कितने प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हैं और उनके हाथी कितने डरावने हैं, तो वह स्वर्ग की ओर हाथ जोड़कर उस प्रभु की दुहाई देने लगा, जो चमत्कार दिखाता है। उसे पूरा विश्वास था कि विजय अस्त्र-शस्त्रों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उनकी होती है, जिन्हें प्रभु इसके योग्य मानता है। 22उसने यह प्रार्थना की, "प्रभु! तूने यूदा के राजा हिज़कीया को सहायता के लिए अपना दूत भेजा, जिसने सनहेरीब के पड़ाव में लगभग एक लाख पचासी हजार आदमियों का वध किया। 23स्वर्ग के प्रभु! अब फिर अपना एक उत्तम दूत भेज, जो हमारे आगे-आगे चल कर शत्रुओं में भय और आतंक उत्पन्न करे। 24जो लोग ईशनिंदा करते हुए अपनी पवित्र प्रजा पर आक्रमण करने आ रहे हैं, उन्हें अपने भुजबल से मार गिरा।" उसने इन शब्दों के साथ अपनी प्रार्थना समाप्त की। 25निकानोर के सैनिक नरसिंघे बजाते और गीत गाते आगे बढे। 26यूदाह के आदमी प्रार्थना करने के बाद प्रभु की दुहाई देते हुए शत्रुओं पर टूट पड़े। 27वे हाथों से लड़ रहे थे और हृदय से ईश्वर की प्रार्थना कर रहे थे। उन्होंने ईश्वर की सहायता का अनुभव करते हुए उल्लासित हो कर पैंतीस हजार आदमियों को मार गिराया। 28जब लडाई समाप्त हुई और वे आनन्द के साथ पीछे हटे तो उन्होंने देखा कि निकानोर कवच पहने मरा पड़ा है। 29इस पर वे गगनभेदी नारे लगाने और अपनी मातृभाषा में सर्वशक्तिमान् प्रभु को धन्य कहने लगे। 30तब यूदाह ने, जो अपनी सहनागरिकों के लिए सदा तन-मन से प्रथम पंक्ति में लडता रहा और बाल्यावस्था से अपने देश-भाइयों को प्यार करता आया, निकानोर का सिर और उसकी पूरी दाहिनी बाँह काट देने और उन्हें येरूसालेम ले जाने का आदेश दिया। 31वहाँ पहुँच पर उसने अपने देश-भाइयों और याजकों को एकत्र किया और स्वयं वेदी के सामने खड़ा रहा। उसने गढ़ के लोगों को बुला भेजा। 32और उन्हें दुष्ट निकानोर का सिर और उस ईशनिंदक का हाथ दिखाया, जिसे उसने घमण्ड के आवेश में सर्वेश्वर के मंदिर के विरुद्ध उठाया था। 33उसने विधर्मी निकानोर की जीभ काटवा कर उसके टुकडे पक्षियों को दे देने और उन्माद के पुरस्कार के रूप में उसका हाथ मंदिर के सामने लटकाने का आदेश दिया। 34तब सब ने स्वर्ग की ओर आँखें उठा कर प्रभु को धन्यवाद दिया, जिसने प्रकट रूप से उनकी सहायता की थी। उन्होंने कहा, "धन्य हैं वह, जिसने अपने निवास को दूषित होने से बचाया है!" 35यूदाह ने निकानोर का सिर गढ की दीवार पर लटकवा दिया, जिससे वह सब के लिए एक सुस्पष्ट प्रमाण हो कि प्रभु ने उनकी सहायता की थी। 36यह निर्णय सर्वसम्मति से किया गया कि उन दिन को नहीं भुलाया जाये, बल्कि (सीरिया की भाषा में) अदार नामक महीने के तेरहवें दिन, मोरदकय-दिवस के पूर्वदिन, समारोह के साथ उसका उत्सव मनाया जाये। 37ये हैं-निकानोर के समय की घटनाएँ। उस समय से नगर इब्रानियों के ही अधिकार में रहा। अब यहाँ मैं भी अपनी रचना समाप्त करता हूँ। 38यदि यह सुंदर और सुगठित है, तो मैं समझूँगा कि मेरा उद्देश्य सफल हुआ। किंतु यदि यह शिथिल और बहुत साधारण है, तो मैं इतना ही कर सकता था। 39जिस तरह केवल मदिरा या केवल पानी पीना हानिकर है, जब कि पानी-मिली मदिरा रूचिकार होती और मन प्रसन्न कर देती है, उसी तरह कोई रचना सुंदर वस्तु-विन्यास के कारण पाठकों के लिए श्रुतिमधुर हो जाती है। बस, यही मेरा वृतांत।