1अय्यूब ने उत्तर देते हुए कहा: 2तुम निर्बल की कैसी सहायता करते हो! तुम अशक्त बाँह को कैसे सँभालते हो! 3तुमने अज्ञानी को कैसा परामर्श दिया! तुमने विवेक का कितना अच्छा प्रदर्शन किया! 4तुमने किस को सम्बोधित किया? तुम को यह ज्ञान किस से प्राप्त हुआ? 5मृतक और समुद्र के नीचे के निवासी ईश्वर के सामने थरथर काँपते हैं। 6अधोलोक उसके सामने खुला है, महागत्र्त उसके सामने अनावृत है। 7वह उत्तरी आकाश में फैलाता और पृथ्वी को शून्य में लटकाता है। 8वह बादलों में पानी जमा करता है और बादल उसके बोझ से नहीं फटते। 9वह पूर्ण चन्द्रमा का मुँह छिपाता और उस पर अपने बादल तान देता है। 10वह समुद्र की सतह के ऊपर एक वृत खींच कर प्रकाश और अंधकार की सीमाएँ निर्धारित करता है। 11उसकी डाँट पर आकाश के खम्भे भयभीत हो कर हिलते हैं। 12उसने अपनी शक्ति से समुद्र को दण्ड दिया और अपने ज्ञान से रहब को पराजित किया। 13उसने अपनी साँस से आकाश को साफ किया और उसके हाथ ने भागते सर्प को छेदा है। 14यह उसके कार्यों का आभास मात्र है, हम उनकी झलक मात्र देख पाते हैं। कौन उनकी थाह ले सकता है।