1तब अय्यूब ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा: 2जीवंत ईश्वर की शपथ, जो मुझे न्याय नहीं दिलाता! सर्वशक्तिमान् की शपथ, जिसने मेरा मन कटु बना दिया है! 3जब तक मैं जीवित रहूँगा, जब तक ईश्वर का श्वास मुझे अनुप्राणित करेगा, 4तब तक मेरे होंठ झूठ नहीं बोलेंगे, तब तक मेरी जीभ असत्य नहीं कहेगी। 5धिक्कार मुझे! यदि मैं तुम से सहमत होऊँ! मैं मरते दम तक अपनी निर्दोषता का दावा करूँगा। 6मैं अपनी धार्मिकता पर दृढ़ रहूँगा और इसका त्याग नहीं करूँगा। मेरा अंतःकरण मेरे किसी भी दिन के कारण मुझे दोषी नहीं ठहराता। 7मेरे शत्रु को दुष्ट का भाग्य प्राप्त हो! मेरे विरोधी को अपराधी का दण्ड मिले! 8जब ईश्वर दुष्ट का अंत कर देता है, तो उसे किस लाभ की आशा रह जाती है? 9जब उस पर विपत्ति आ पड़ती है, तो क्या ईश्वर उसकी पुकार सुनेगा? 10यदि वह सर्वशक्तिमान् को अपना आनंद मानता, तो उसने ईश्वर से हर समय प्रार्थना की होती। 11मैं तुम लोगों को ईश्वर के सामर्थ्य की शिक्षा दूँगा। मैं सर्वशक्तिमान् के विचार नहीं छिपाऊँगा। 12जब तुम लोगों ने यह सब देखा है, तो क्यों इस प्रकार बकवाद करते हो? 13ईश्वर दुष्ट के लिए यह भाग्य निर्धारित करता है, अत्याचारी को सर्वशाक्तिमान् की ओर से यह विरासत प्राप्त होगी: 14उसके बहुसंख्यक पुत्रों को तलवार के घाट उतारा जायेगा, उसे वंशजों को भूखा रहना होगा। 15जो बच जाते हैं, वे महामारी के शिकार बनेंगे और उनकी विधवाएँ उनका शोक नहीं मनायेगी। 16चाहे वह धूल की तरह चाँदी एकत्र करे और मिट्टी के ढेर की तरह वस्त्र जमा करे, 17किंतु धर्मी उन्हें पहन लेगा और निर्दोष को उसकी चाँदी मिल जायेगी। 18जो घर बनाता हैं, वह मकडी के जाले की तरह, चैकीदार द्वारा बनायी झोपड़़ी की तरह है। 19वह सोने जाते समय अमीर और जागते समय कंगाल है। 20विभीशिकाएँ उसे बाढ की तरह घेरती हैं और बवण्डर उसे रात में उड़ा देता है। 21पूर्वी हवा उसे उठा कर ले जाती और अपने स्थान से उखाड़ कर फेंकती है। 22लोग उस पर निर्दयता से टूट पडते हैं और वह मारने वालों से भागने का प्रयत्न करता है। 23उसकी दुर्गति पर लोग तालियाँ पीटते हैं और उसके अपने घर वाले उस पर सीटी बजाते हैं।