स्तोत्र

अध्याय 6

2(1-2) प्रभु! क्रुद्ध हुए बिना मुझे दण्ड दे, कोप किये बिना मेरा सुधार कर। 3प्रभु! दया कर, मैं कुम्हलाता जा रहा हूँ प्रभु! मुझे स्वस्थ कर। मेरी शक्ति शेष हो रही है। 4मेरी आत्मा बहुत घबरा रही है। लेकिन तू प्रभु! कब तक......? 5प्रभु! लौट कर मेरे प्राणों की रक्षा कर। अपनी सत्यप्रतिज्ञता के कारण मेरा उद्धार कर 6मृतकों में कोई तेरा नाम नहीं लेता, अधोलोक में कोई तुझे स्मरण नहीं करता। 7मैं आह भरते-भरते थक गया हूँ। मैं हर रात शय्या पर रोता रहता हूँ, मेरा बिछावन आँसुओं से तर हो जाता है। 8मेरी आँखें शोक से धुँधली हो गयी हैं, मेरे बहुत-से शत्रुओं के कारण वे क्षीण हो गयी हैं। 9कुकर्मियों! मुझ से दूर हटो; प्रभु ने मेरा विलाप सुन लिया है। 10प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुन ली है; प्रभु मेरा निवेदन स्वीकार करता है। 11मेरे शत्रु निराश और भयभीत हों। वे सब लज्जित हो कर हट जायें।