स्तोत्र

अध्याय 7

2(1-2) प्रभु! मेरे ईश्वर! मैं तेरी शरण आया हूँ। पीछा करने वालों से मेरी रक्षा कर, मेरा उद्धार कर। 3कहीं ऐसा न हो कि वे सिंह की तरह मुझे फाड़ डाले, मुझे घसीट ले जायें और मुझे कोई नहीं बचाये। 4प्रभु! मेरे ईश्वर! यदि मैंने यह किया है- यदि मेरे हाथों ने अन्याय किया है, 5यदि मैंने अपने उपकारक के साथ बुराई की है, यदि मैंने अपने शत्रु को अकारण लूटा है, 6तो मेरा शुत्र मेरा पीछा करे, मुझे पकड़े, मुझे अपने पैरों तले मिट्टी में रौंदे और मेरी मर्यादा धूल में मिला दे। 7प्रभु! क्रोध में आ कर उठ खड़ा हो, मेरे विरोधियों के प्रकोप का दमन कर। मेरे ईश्वर! सचेत हो! तू ही न्याय की व्यवस्था करता है। 8राष्ट्र तेरे चारों ओर एकत्र हों, तू उच्च न्यायासन पर विराजमान हो। 9प्रभु! राष्ट्रों का न्याय करता है। प्रभु! मेरी धार्मिकता और निर्दोषता के अनुसार, तू मेरा न्याय कर। 10विधर्मियों की दुष्टता मिट जाये। तू धर्मी को प्रतिष्ठित कर। न्यायप्रिय ईश्वर! तू मनुष्य के हृदय की थाह लेता है। 11ईश्वर ही मेरी ढाल है। वह निष्कपट लोगों का उद्धार करता है। 12ईश्वर निष्पक्ष न्यायकर्ता है। वह प्रतिदिन बुराई के कारण क्रोध में आता है। 13यदि लोग पश्चाताप नहीं करते, तो वह अपनी तलवार पर सान देता है और अपना धनुष चढ़ा कर निशाना बाँधता है। 14वह अपने घातक शस्त्र तैयार करता और अपने बाणों को अग्निमय बनाता है। 15जो पाप करने का निश्चय करता है, जिसका मन अपराध से भरा है, उसे निराश होना पडे़गा। 16जो गड्ढ़ा गहरा खोदता है, वह स्वयं उसमें गिरता है। 17उसका अपराध उसी के सिर लौटेगा, उसकी हिंसा उसी के सिर पड़ेगी। 18मैं उसकी न्यायप्रियता के कारण प्रभु को धन्य कहूँगा। मैं सर्वोच्च प्रभु के नाम का स्तुतिगान करूँगा।