स्तोत्र

अध्याय 9

2(1-2) प्रभु! मैं सारे हृदय से तुझे धन्यवाद दूँगा। मैं तेरे सब अपूर्व कार्यों का बखान करूँगा। 3मैं उल्लसित हो कर आनन्द मनाता हूँ। सर्वोच्च ईश्वर! मैं तेरे नाम के आदर में भजन गाता हूँ। 4मेरे शत्रुओं को हट जाना पड़ा। वे तेरे सामने ठोकर खा कर नष्ट हो जाते हैं। 5निष्पक्ष न्यायकर्ता! तूने अपने सिंहासन पर बैठ कर मुझे न्याय दिलाया और मेरे पक्ष में निर्णय दिया। 6तूने राष्ट्रों को डाँटा, दुष्टों का विनाश किया और उनका नाम सदा के लिए मिटा दिया है। 7शत्रु असंख्य खंडहरो-जैसे हो गये, तूने उनके नगरों को उजाड़ा; उनकी स्मृति तक मिट गयी। 8प्रभु का राज्य सदा बना रहता है, उसने न्याय करने के लिए अपना सिंहासन स्थापित किया है। 9वह न्यायपूर्वक संसार का शासन और निष्पक्षता से राष्ट्रों का न्याय करता है। 10प्रभु पददलितों का आश्रय है, संकट के समय शरणस्थान। 11प्रभु! जो तेरा नाम जानते हैं, वे तुझ पर भरोसा रखें; क्योंकि तू उन लोगों का परित्याग नहीं करता, जो तेरी खोज में लगे रहते हैं। 12सियोन में निवास करने वाले प्रभु की स्तुति करो, राष्ट्रों में उसके अपूर्व कार्यों का बखान करो। 13वह रक्तपात का लेखा रखता है और दरिद्र की पुकार नहीं भुलाता। 14प्रभु! दया कर! यह देख कि मेरे शत्रुओं ने मुझे कितना नीचा दिखाया है। तू मुझे मृत्यु के द्वार से निकाल ले आता है, 15जिससे मैं सियोन की पुत्री के फाटकों पर तेरे समस्त गुणों का बखान करूँ और तेरे उद्धार के कारण आनन्द के गीत गाऊँ। 16राष्ट्र उस चोरगढ़े में गिरे, जिसे उन्होंने खोदा था; जो फन्दा उन्होने लगाया था, उस में उनके पैर फँस गये। 17प्रभु ने प्रकट हो कर न्याय किया, उसने दुष्ट को उसके अपने जाल में फँसाया। 18दुष्ट जन अधोलोक लौट जाये और वे सब राष्ट्र भी, जो ईश्वर की उपेक्षा करते हैं। 19दरिद्र को सदा के लिए नहीं भुलाया जायेगा और दीन-दुःखियों की आशा व्यर्थ नहीं होगी। 20प्रभु! उठ। मनुष्य की विजय न हो। तेरे सामने राष्ट्रों का न्याय हो। 21प्रभु! राष्ट्रों को आतंकित कर, जिससे वे समझें कि वे मात्र मनुष्य हैं।