1प्रभु! तू क्यों दूर रहता और संकट के समय छिप जाता है? 2दुष्ट के घमण्ड के कारण दरिद्र दुःखी हैं, वे उसके कपट के शिकार बनते हैं। 3दुष्ट अपनी सफलता की डींग मारता है, लोभी प्रभु की निन्दा और तिरस्कार करता है। 4वह अपने घमण्ड में किसी की परवाह नहीं करता और सोचता है, ईश्वर है ही नहीं। 5उसके सब कार्य फलते-फूलते हैं, वह तेरे निर्णयों की चिन्ता नहीं करता और अपने विरोधियों का तिरस्कार करता है। 6वह अपने मन में कहता है, "जैसा हूँ, वैसा ही रहूँगा, मेरा कभी अनर्थ नहीं होगा"। 7उसका मुख निन्दा, कपट और अत्याचार से भरा है। वह बुराई और दुष्टता की बातें करता है। 8वह गांवों के पास घात लगा कर बैठता और निर्दोष को छिप कर मारता है, उसकी आँखें असहाय पर लगी रहती है। 9वह झाड़ी में सिंह की तरह छिप कर घात कर बैठा है; वह दीन-हीन की घात में बैठा है। वह उसे पकड़ कर अपने जाल में फँसाता है। 10वह झुक कर छिपा रहता और दरिद्रों पर टूट पड़ता है। 11वह अपने मन में कहता है: "ईश्वर लेखा नहीं रखता; उसका मुख छिपा हुआ है और वह कभी कुछ नहीं देखता"। 12प्रभु! उठ कर अपना बाहुबल प्रदर्शित कर। ईश्वर! दरिद्र को न भुला। 13दुष्ट क्यों ईश्वर का तिरस्कार करता है? वह क्यों अपने मन में कहता है कि वह लेखा नहीं लेगा? 14किन्तु, तू कष्ट और दुःख देखता है। दीन-हीन अपने को तुझ पर छोड़ देता है। तू अनाथ की सहायता करता है। 15दुष्ट और कुकर्मी का बाहुबल तोड़, उसकी दुष्टता का लेखा ले और उसे समाप्त कर। 16प्रभु सदा के लिए राज्य करता है, राष्ट्र उसके देश से लुप्त हो गये हैं। 17प्रभु! तूने दरिद्रों का मनोरथ पूरा किया; तू उन्हें ढारस बंधाता और उनकी प्रार्थना सुनता है। 18तू अनाथ और पददलित को न्याय दिलाता है, जिससे कोई निरा मनुष्य उन पर अत्याचार न करे।