स्तोत्र

अध्याय 18

2(1-2) प्रभु! मेरे बल! मैं तुझे प्यार करता हूँ। प्रभु मेरी चट्टान है, मेरा गढ़ और मेरा उद्धारक। 3ईश्वर ही मेरी चट्टान है, जहाँ मुझे शरण मिलती है। वही मेरी ढाल है, मेरा शक्तिशाली उद्धारकर्ता और आश्रयदाता। 4प्रभु धन्य है! मैंने उसकी दुहाई दी और मैं अपने शत्रुओं पर वियजी हुआ। 5मैं मृत्यु के पाश में पड़ गया था, विनाश की प्रचण्ड धारा में बह रहा था। 6मैं अधोलोक के जाल में फँस गया था, मेरे लिए मृत्यु का फन्दा बिछाया गया था। 7मैंने अपने संकट में प्रभु को पुकारा, मैंने अपने ईश्वर की दुहाई दी। उसने अपने मन्दिर में मेरी वाणी सुनी, मेरी दुहाई उसके कान तक पहुँची। 8तब पृथ्वी विचलित हो कर काँपने लगी और पर्वतों की नींव हिलने लगी। उसका क्रोध भड़क उठा और वे काँपने लगे। 9उसके नथनों से धुआँ उठा, भस्मकारी अग्नि और दहकते अंगारे उसके मुख से निकल पड़े। 10वह आकाश खोल कर उतरा; उसके चरणों तले घोर अन्धकार था। 11वह केरूब पर सवार हो कर उड़ गया; पवन के पंख उसे ले चले। 12वह अन्धकार ओढ़े था। वह काले घने बादलों से घिरा था। 13उसके मुखमण्डल के तेज से बादल हटते जा रहे थे- औले और दहकते अंगारे झरने लगे। 14प्रभु आकाश में गरज उठा, सर्वोच्च ईश्वर की वाणी सुनाई पड़ी-ओले और दहकते अंगारे झरने लगे। 15उसने बाण चला कर शत्रुओं को तितर-बितर कर दिया, बिजली चमका कर उन्हें भगा दिया। 16प्रभु! तेरी धमकी के गर्जन से, तेरी क्रोधभरी फुंकार से महासागर का तल दिखाई पड़ा, पृथ्वी की नींव प्रकट हो गयी। 17वह ऊपर से हाथ बढ़ा कर मुझे संभालता और महासागर से मुझे निकाल लेता है, 18मुझे मेरे शक्तिशाली शत्रुओं से छुड़ाता है, उन विरोधियों से, जो मुझ से प्रबल है। 19वे संकट के समय मुझ पर आक्रमण करते थे, परन्तु प्रभु मेरा सहायक बना। 20वह मुझे संकट में से निकाल लाया, उसने मुझे छुड़ाया, क्योंकि वह मुझे प्यार करता है। 21प्रभु मेरी धार्मिकता के अनुसार मेरे साथ व्यवहार करता है, मेरे हाथों की निर्दोषता के अनुरूप; 22क्योंकि मैं प्रभु के मार्ग पर चलता रहा। मैंने अपने ईश्वर के साथ विश्वासघात नहीं किया। 23मैंने उसके सब नियमों को अपने सामने रखा, मैंने उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन नहीं किया। 24मैं उसकी दृष्टि में धर्माचरण करता रहा; मैंने किसी प्रकार का अपराध नहीं किया। 25प्रभु ने मेरी धार्मिकता के अनुसार मेरे साथ व्यवहार किया, उसने मेरे हाथों की निर्दोषता का ध्यान रखा। 26तू निष्ठावान् के लिए निष्ठावान् है और अनिन्द्य के लिए अनिन्द्य। 27तू शुद्ध के लिए शुद्ध है और टेढ़े के लिए टेढ़ा। 28तू अपमानित प्रजा को विजय दिलाता और घमण्डियों को नीचा दिखाता है। 29प्रभु! तू ही मेरा दीपक जलाता है, मेरा ईश्वर मेरे अन्धकार को आलोकित करता है। 30मैं तेरे बल पर शत्रुओं के दल में कूद पड़ता हूँ। मैं ईश्वर के बल पर चारदीवारी लाँघ जाता हूँ। 31ईश्वर का मार्ग अदोष है, प्रभु की वाणी विश्वसनीय है। वह उन सब लोगों की ढाल है, जो उसकी शरण जाते हैं। 32प्रभु के सिवा और कौन ईश्वर है? हमारे ईश्वर के सिवा और कौन चट्टान है? 33वही ईश्वर मुझे शान्ति प्रदान करता और मार्ग प्रशस्त कर देता है। 34वह मेरे पैरों को हिरनी की गति देता और मुझे पर्वतों पर बनाये रखता है। 35वह मेरे हाथों को युद्ध का प्रशिक्षण देता और मेरी बाँहों को काँसे का धनुष चढ़ाना सिखाता है। 36तू मुझे अपनी विजय ढाल देता है। तेरा दाहिना हाथ मुझे संभालता और स्वयं झुक कर मुझे महान् बनाता है। 37तू मेरा मार्ग प्रशस्त करता है; इसलिए मैरे पैर नहीं फिसलते। 38मैं अपने शत्रुओं का पीछा कर उन को पकड़ लेता हूँ और उनका संहार किये बिना नहीं लौटता। 39मैं उन्हें मारता हूँ और वे फिर नहीं उठते, वे गिर कर मेरे पैरों तले पड़े रहते हैं। 40तू युद्ध के लिए मुझे शक्ति सम्पन्न बनाता और मेरे विरोधियों को मेरे सामने झुकाता है। 41तू मेरे शत्रुओं को भागने को विवश करता है और मैं अपने विरोधियों का विनाश करता हूँ। 42वे पुकारते तो हैं, किन्तु कोई नहीं सुनता; वे प्रभु की दुहाई देते हैं, किन्तु वह मौन रहता है। 43मैं उन्हें आंधी की धूल की तरह चूर-चूर करता और सड़कों के कीचड़ की तरह रौंद देता हूँ। 44तू मुझे अपनी प्रजा के विद्रोह से मुक्त करता और मुझे राष्ट्रों का अधिपति बनाता है। जिन को मैं नहीं जानता था, वे मेरे अधीन हो जाते हैं। 45विदेशी मेरे दरबारी बनते हैं, वे मेरा आदेश सुनते ही उसका पालन करते हैं। 46विदेशी योद्धाओं का साहस टूट जाता है; वे काँपते हुए अपने किलों से निकलते हैं। 47प्रभु की जय! मेरी चट्टान धन्य है! मेरे मुक्तिदाता ईश्वर की स्तुति हो। 48वही ईश्वर मुझे प्रतिशोध लेने देता और राष्ट्रों को मेरे अधीन करता है। 49तू मुझे मेरे शत्रुओं से मुक्त करता, मुझे विरोधियों पर विजय दिलाता और मुझे हिंसा करने वालों से छुड़ाता है। 50प्रभु! मैं राष्ट्रों के बीच तुझे धन्यवाद दूँगा और तेरे नाम का स्तुतिगान करूँगा। 51वह अपने राजा को विजय दिलाता रहता है। उसकी सत्यप्रतिज्ञता उसके अभिषिक्त के लिए- दाऊद और उसके वंश के लिए-सदा सर्वदा बनी रहती है।