1प्रभु! मुझे न्याय दिला। मेरी दुहाई पर ध्यान दे। मैं निष्कपट हृदय से जो प्रार्थना कर रहा हूँ, उसे तू सुनने की कृपा कर। 2तेरे द्वारा मेरा न्याय हो, तेरी आँखे देख लें कि सत्य कहाँ है। 3तूने मेरे हृदय की परीक्षा ली और रात को मेरा निरीक्षण किया; तूने मुझे परखा और मुझ में कोई दोष नहीं पाया। 4मैंने मनुष्यों की तरह अपने मुख के शब्दों द्वारा पाप नहीं किया। मैं तेरी शिक्षा के अनुसार सन्मार्ग पर चलता रहा। 5मैं तेरे मार्ग पर चलता रहा, मेरे पैर विचलित नहीं हुए। 6मेरे ईश्वर! मैं तुझे पुकारता हूँ; क्योंकि तू मुझे उत्तर देता है। मेरी सुन, मेरी प्रार्थना स्वीकार कर। 7अपनी सत्यप्रतिज्ञता प्रदर्शित कर। जो तेरी शरण जाते हैं, तू उन्हें उनके अत्याचारियों से छुड़ाता है। 8तू आँख की पुतली की तरह मेरी रक्षा कर। मुझे अपने पंखों की छाया में छिपा- 9उन दुष्टों से दूर, जिन्होंने मुझे लूटा, उन घातक शत्रुओं से, जो मुझे घेरते हैं। 10उनकी बुद्धि जड़ और कुण्ठित है, उनका मुख डींग मारता है। 11वे मेरी घात में बैठे हैं, अब वे मुझे घेरते हैं। मुझे भूमि पर पटकने के लिए उनकी आँखें मुझ पर टिकी हुई हैं। 12वे सिंह की तरह मुझे फाड़ने के लिए उत्सुक है, घात में बैठे हुए हिंसक पशु की तरह। 13प्रभु ! उठ कर उनका सामना कर और मार गिरा। मुझे अपनी तलवार से दुष्टों से छुड़ा। 14प्रभु! तेरा हाथ मनुष्यों में से और पृथ्वी पर से उन्हें निकाल दे; जीवन में यही उनका भाग्य है। जो दण्ड तूने उनके लिए रख छोड़ा है, उसे उन से पूरा-पूरा चुका, उनके पुत्र दण्ड से तृप्त हो जायें और अपनी सन्तति के लिए भी कुछ छोड़ जायें। 15मैं न्याय के अनुसार तेरे दर्शन करूँगा। मैं जागने पर तेरा स्वरूप देख कर तृप्त होऊँगा।