1दुष्टों को देख कर मत झुँझलाओ, कुकर्मियों से ईर्ष्या मत करो; 2क्योंकि वे घास की तरह जल्दी मुरझायेंगे और हरियाली की तरह कुम्हलायेंगे। 3प्रभु पर भरोसा रखो और भलाई करो; तुम स्वदेश में सुरक्षित रह सकोगे। 4यदि तुम प्रभु में अपना आनन्द पाओगे, तो वह तुम्हारा मनोरथ पूरा करेगा। 5प्रभु को अपना जीवन अर्पित करो, उस पर भरोसा रखो और वह तुम्हारी रक्षा करेगा। 6वह तुम्हारी धार्मिकता को उषा की तरह प्रकट करेगा और तुम्हारे न्याय को दोपहर के प्रकाश की तरह। 7प्रभु के सामने मौन रह कर उसकी प्रतीक्षा करो। जो फलता-फूलता है, उस पर मत झुँझलाओ और न उस मनुष्य पर, जो षड्यन्त्र रचता है। 8क्रोध मत करो, आवेश छोड़ो, मत झुँझलाओ। यह बुराई की ओर ले जाता है; 9क्योंकि दुष्टों का विनाश होगा, किन्तु प्रभु की प्रतीक्षा करने वाले देश के अधिकारी होंगे। 10थोड़े ही समय बाद दुष्ट नहीं रहेगा। तुम उसके स्थान का पता करोगे और वह वहाँ नहीं होगा; 11किन्तु विनीत देश के अधिकारी होंगे और पूर्ण शान्ति में आनन्द मनायेंगे। 12दुष्ट धर्मी के विरुद्ध षड्यन्त्र रचता और उस पर दाँत पीसता है। 13किन्तु प्रभु उस पर हँसता है; क्योंकि वह देखता है कि उसके दिन पूरे हो रहे हैं। 14दीन-हीन लोगों को समाप्त करने और धर्मियों को मारने के लिए दुष्टों ने तलवार खींची और धनुष चढ़ाया है। 15किन्तु उनकी तलवार उनका अपना हृदय भेदेगी और उनके धनुष टूट जायेंगे। 16दुष्टों की अपार सम्पत्ति की अपेक्षा धर्मी का थोड़ा सामान अच्छा है; 17क्योंकि दुष्टों की बाहें तोड़ी जायेंगी, किन्तु प्रभु धर्मियों को संभालता है। 18प्रभु धर्मियों के जीवन की रक्षा करता है। उनकी विरासत सदा बनी रहेगी। 19उन्हें संकट के समय निराश नहीं होना पड़ेगा। अकाल के समय वे तृप्त किये जायेंगे। 20दुष्टों का विनाश होगा। प्रभु के बैरी चरागाह की हरियाली की तरह मिट जायेंगे। वे धुएँ की तरह विलीन हो जायेंगे। 21दुष्ट उधार लेता है और लौटाता नहीं। धर्मी दयालु है और देता है। 22जिन को प्रभु आशीर्वाद देता है, वे देश के अधिकारी होंगे। जिन को वह अभिशाप देता है, उनका विनाश होगा। 23प्रभु की कृपा से मनुष्य दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ता है। उसका आचरण प्रभु को प्रिय है। 24वह मनुष्य ठोकर खाने पर भी नहीं गिरता, क्योंकि प्रभु उसका हाथ थामता है। 25मैं जवान था और अब बूढ़ा हो चला हूँ, किन्तु मैंने न तो धर्मी को निस्सहाय पाया और न उसकी सन्तान को भीख माँगते देखा। 26धर्मी सदा दयालु हो कर उधार देता है और उसकी संतान को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। 27बुराई से बचते रहो, भलाई करो और तुम्हारा निवास सदा बना रहेगा; 28क्योंकि प्रभु को धार्मिकता प्रिय है। वह अपने भक्तों को कभी नहीं त्यागता। वह सदा उनकी रक्षा करता है, किन्तु दुष्टों का वंश नहीं बना रहेगा। 29धर्मी देश के अधिकारी होंगे और वहाँ सदा के लिए बस जायेंगे। 30धर्मी विवेकपूर्ण बातें करता है। उसकी जिह्वा न्याय की चरचा करती है। 31ईश्वर की संहिता उसके हृदय में घर कर गयी है, उसके पैर कभी नहीं फिसलते। 32दुष्ट धर्मी की घात में बैठे हैं और उसे मारना चाहते हैं। 33प्रभु उसे उनके हाथों में नहीं छोड़ता और न्यायालय में उसे दोषी नहीं बनने देता। 34प्रभु की प्रतीक्षा करो, उसके मार्ग पर चलो। वह तुम्हें देश का अधिकारी बनायेगा और तुम दुष्टों का विनाश देखोगे। 35मैंने दुष्ट को अत्याचार करते और लेबानोन के देवदार की तरह बढ़ते देखा। 36जब फिर उधर गया, तो वह नहीं रहा। मैंने उसका पता लगाया और उसे नहीं पाया। 37सच्चरत्रि को देखो, निष्कपट पर ध्यान दो। शान्तिप्रिय मनुष्य को सन्तति होती है; 38किन्तु विद्रोहियों का सर्वथा विनाश होता है, दुष्टों की सन्तति उखाड़ दी जाती है। 39प्रभु धर्मियों का उद्धार करता और संकट के समय उनकी रक्षा करता है। 40प्रभु उनकी सहायता करता और उन्हें मुक्त करता है। वह उन्हें दुष्टों से छुड़ाता और उनका उद्धार करता है; क्योंकि वे उसकी शरण आये हैं।