1सर्वेश्वर प्रभु बोलता है। वह उदयाचल से अस्ताचल तक समस्त पृथ्वी को सम्बोधित करता है। 2वह सौन्दर्यमय सियोन पर देदीप्यमान है। 3हमारा ईश्वर आयेगा और मौन नहीं रहेगा। भस्म करने वाली अग्नि उसके आगे-आगे चलती है और उसके चारों ओर प्रचण्ड आँधी। 4वह अपनी प्रजा का न्याय करने के लिए आकाश और पृथ्वी को सम्बोधित करता है: 5"मेरी प्रजा को मेरे सामने एकत्र करो, जिसने यज्ञ चढ़ा कर मेरा विधान स्वीकार किया"। 6आकाश प्रभु की न्यायप्रियता घोषित करता है। ईश्वर स्वयं न्यायकर्ता है। 7"मेरी प्रजा! सुनो , मैं बोलूँगा। इस्राएल! मैं तुम्हारे विरुद्ध साक्ष्य दूँगा। मैं ईश्वर, तुम्हारा ईश्वर हूँ। 8मैं तुम्हारे यज्ञों के कारण तुम पर दोष नहीं लगाता - तुम्हारे बलिदान तो सदा मरे सामने हैं। 9मुझे न तो तुम्हारे घरों के सांड चाहिए और न तुम्हारे बाड़ों के बकरे; 10क्योंकि जंगल के सभी जानवर और पहाड़ों पर चरने वाले हज़ारों चैपाये मेरे हैं। 11मैं आकाश के सभी पक्षियों को जानता हूँ। मैदान में विचरने वाले पशु मेरे हैं। 12यदि मैं भूखा होता, तो तुम से नहीं कहता; क्योंकि पृथ्वी और उसकी सभी वस्तुएँ मेरी हैं। 13क्या मैं सांड़ों का मांस खाता और बकरों का रक्त पीता हूँ? 14ईश्वर को धन्यवाद का बलिदान चढ़ाओ और उसके लिए अपनी मन्नतें पूरी करो। 15संकट के समय मेरी दुहाई दो। मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा और तुम मेरा सम्मान करोगे।" 16(16-17) ईश्वर विधर्मी से यह कहता है: "तुम मेरी संहिता का तिरस्कार करते और मेरी बातों पर ध्यान नहीं देते हो, तो तुम मेरी आज्ञाओं का पाठ और मेरे विधान की चरचा क्यों करते हो? 18चोर को देखने पर तुम उसका साथ देते हो और तुम व्यभिचारियों से मेल-जोल रखते हो। 19तुम्हारे मुँह से बुराई निकलती है और तुम्हारी जीभ कपटपूर्ण बातें करती है। 20तुम बैठ कर अपने भाई की निन्दा करते और अपनी माता के पुत्र की चुगली खाते हो। 21तुम यह सब करते हो और मैं चुप रहूँ? क्या तुम मुझे अपने जैसा समझते हो? मैं तुम्हारा एक-एक अपराध गिना कर तुम पर दोष लगाता हूँ। 22"तुम, जो ईश्वर को भूल जाते हो-सावधान रहो! कहीं ऐसा न हो कि मैं तुम्हारा विनाश करूँ और तुम्हारा उद्धार करने वाला कोई न हो। 23जो मुझे धन्यवाद का बलिदान चढ़ाता है, वही मेरा सम्मान करता है। जो सदाचारी है, मैं उसे ईश्वर के मुक्ति-विधान के दर्शन कराऊँगा।"