3(1-3) ईश्वर! तू दयालु है, मुझ पर दया कर। तू दयासागर है, मेरा अपराध क्षमा कर। 4मेरी दुष्टता पूर्ण रूप से धो डाल, मुझ पापी को शुद्ध कर। 5मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ। मेरा पाप निरन्तर मेरे सामने है। 6मैंने तेरे विरुद्ध पाप किया है। मैंने वही किया, जो तेरी दृष्टि में बुरा है; इसलिए तेरा निर्णय सही और तेरी दण्डाज्ञा न्यायसंगत है। 7मैं तो जन्म से ही अपराधी, अपनी माता के गर्भ से ही पापी हूँ। 8तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है। मेरे अन्तःकरण को ज्ञान की बातें सिखा। 9मुझ पर जूफ़ा से जल छिड़क दे और मैं शुद्ध हो जाऊँगा, मुझे धो और मैं हिम से भी अधिक स्वच्छ हो जाऊँगा 10मुझे आनन्द और उल्लास का सन्देश सुना और तुझ से रौंदी हुई हड्डियाँ फिर खिल उठेंगी। 11मेरे पापों पर दृष्टि न डाल, मेरा अपराध मिटाने की कृपा कर। 12ईश्वर! मेरा हृदय फिर शुद्ध कर और मेरा मन फिर सुदृढ़ बना। 13अपने सान्निध्य से मुझे दूर न कर, अपने पवित्र आत्मा से मुझे वंचित न कर। 14मुक्ति का आनन्द मुझे फिर प्रदान कर, उदारता में मेरा मन सुदृढ़ बना। 15मैं अपराधियों को तेरे मार्ग की शिक्षा दूँगा और पापी तेरे पास लौट आयेंगे। 16ईश्वर! तू मेरे मुक्तिदाता! मेरा उद्धार कर और मैं तेरी भलाई का बखान करूँगा। 17प्रभु! मेरे होंठ खोल दे और मेरा कण्ठ तेरा गुणगान करेगा। 18तू बलिदान से प्रसन्न नहीं होता। यदि मैं होम चढ़ाता, तो तू उसे अस्वीकार करता। 19मेरा पश्चाताप ही मेरा बलिदान होगा। तू पश्चातापी दीन-हीन हृदय का तिरस्कार नहीं करेगा। 20प्रभु! सियोन पर दयादृष्टि कर, येरूसालेम की चारदीवारी फिर उठा। 21तब तू योग्य बलिदान - होम तथा पूर्णाहुति - स्वीकार करेगा और तेरी वेदी पर बछड़े चढ़ाये जायेंगे।