1पुत्र! यदि तुम मेरे शब्दों पर ध्यान दोगे, मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, 2प्रज्ञा की बातें कान लगा कर सुनोगे और सत्य में मन लगाओगे; 3यदि तुम विवेक की शरण लोगे और सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करोगे; 4यदि तुम उसे चाँदी की तरह ढूँढ़ते रहोगे और खजाना खोजने वाले की तरह उसके लिए खुदाई करोगे, 5तो तुम प्रभु-भक्ति का मर्म समझोगे और तुम्हें ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होगा; 6क्योंकि प्रभु ही प्रज्ञा प्रदान करता और ज्ञान तथा विवेक की शिक्षा देता है। 7वह धर्मियों को सफलता दिलाता और ढाल की तरह सदाचारियों की रक्षा करता है। 8वह धर्ममार्ग पर पहरा देता और अपने भक्तों का पथ सुरक्षित रखता है। 9तुम धार्मिकता और न्याय, सच्चाई और सन्मार्ग का मर्म समझोगे। 10प्रज्ञा तुम्हारे हृदय में निवास करेगी और तुम्हें ज्ञान से आनन्द प्राप्त होगा। 11विवेक तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करेगा, समझदारी तुम्हारी रक्षा करेगी। 12प्रज्ञा तुम्हे दुष्टों के मार्ग पर चलने से रोकेगी-उन लोगों से, जो कपट पूर्ण बातें करते हैं; 13जो सन्मार्ग से भटक कर अन्धकार के मार्ग पर चलते; 14जो पाप करना पसन्द करते और बुराई की दुष्टता का रस लेते हैं; 15जिनके मार्ग टेढ़े-मेढे़ हैं; जो कपटपूर्ण व्यवहार करते हैं। 16प्रज्ञा तुम को परस्त्री के जाल से बचायेगी, उस व्यभिचारिणी के सम्मोहक वचनों से, 17जिसने अपनी युवावस्था के साथी का परित्याग किया और अपने ईश्वर का विधान भुला दिया। 18उसका घर मृत्यु की ओर, उसका पथ अधोलोक की ओर ले जाता है। 19जो उसके यहाँ अन्दर जाता है, वह लौट कर जीवन के मार्ग पर फिर पैर रहीं रखता। 20इसलिए तुम अच्छे लोगों के पथ पर चलोगे; तुम धार्मिकों के मार्ग से नहीं भटकोगे। 21निष्कपट लोग देश के अधिकारी होंगे; निर्दोष लोग उस में निवास करेंगे। 22किन्तु दुष्ट देश से निर्वासित होंगे; विधर्मी उस से निकाले जायेंगे।