1पुत्र! मेरी शिक्षा को मत भुलाओ; मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में सँजोये रखो; 2क्योंकि वे तुम्हें लम्बी आयु और बड़ी शान्ति प्रदान करेंगी। 3प्यार और ईमानदारी को अपने से अलग नहीं करो। उन्हें अपने गले में बाँध लो, अपने हृदय के पटल पर अंकित कर लो। 4इस प्रकार तुम ईश्वर और मनुष्यों की दृष्टि में कृपा और सुयष के पात्र बनोगे। 5तुम सारे हृदय से प्रभु का भरोसा करो; अपनी बुद्धि पर निर्भर मत रहो। 6अपने सब कार्यों में उसका ध्यान रखो। वह तुम्हारा मार्ग प्रशस्त कर देगा। 7अपने को बुद्धिमान मत समझो। प्रभु पर श्रद्धा रखो और बुराई से दूर रहो; 8इस से तुम्हारे शरीर को स्वास्थ्य और तुम्हारी हड्डियों को नवजीवन मिलेगा। 9अपनी सम्पत्ति से प्रभु का सम्मान करो; उसे अपनी उपज का दशमांश चढ़ाओ। 10इस से तुम्हारे बखार अनाज से भरे रहेंगे और तुम्हारे कोल्हुओं से अंगूरी छलकेगी। 11पुत्र! प्रभु के अनुशासन की अपेक्षा मत करो और उसकी फटकार का बुरा मत मानो; 12क्योंकि जिस प्रकार पिता अपने प्रिय पुत्र को दण्ड देता है, उसी प्रकार प्रभु जिसे प्यार करता है, उसे दण्ड देता है। 13धन्य है वह मनुष्य, जिसे प्रज्ञा मिलती है, जिसने विवेक पा लिया है! 14उसकी प्राप्ति चाँदी की प्राप्ति से श्रेष्ठ है। सोने की अपेक्षा उस से अधिक लाभ होता है। 15उसका मूल्य मोतियों से भी बढ़कर है। तुम्हारी कोई अनमोल वस्तु उसकी बराबरी नहीं कर सकती। 16उसके दाहिने हाथ में लम्बी आयु और उसके बायें हाथ में सम्पत्ति और सुयष हैं। 17उसके मार्ग रमणीय हैं और उसके सभी पथ शान्तिमय। 18जो उसे प्राप्त करते हैं, उनके लिए वह जीवन-वृक्ष है। धन्य हैं वे लोग, जो उसे सँजोये रखते हैं! 19प्रभु ने प्रज्ञा से पृथ्वी को स्थापित किया; उसने विवेक से आकाश को सुदृढ़ किया। 20उसके ज्ञान से पानी महागत्र्त से फूट निकला और ओस बादलों से टपकने लगी। 21पुत्र! समझदारी और विवेक सुरक्षित रखों, उन्हें अपनी आँखों से ओेझल न करो, 22जिससे वे तुम को जीवन प्रदान करें और तुम्हारे कण्ठ की माला बनें। 23इस प्रकार तुम अपने मार्ग पर निरापद आगे बढ़ोगे और तुम्हारे पैर को ठोकर नहीं लगेगी। 24तुम निर्भय हो कर लेटोगे और लेटने पर तुम्हें सुख की नींद आयेगी। 25तुम ने तो अचानक आ पड़ने वाले आतंक से और न दुष्टों के आक्रमण से डरोगे; 26क्योंकि प्रभु तुम्हारा साथ देगा और जाल से तुम्हारे पैरों की रक्षा करेगा। 27पुत्र! यदि यह तुम्हारी शक्ति के बाहर न हो, तो जिसके आभारी हो, उसका उपकार करो। 28यदि तुम दे सकते हो, तो अपने पड़ोसी से यह न कहो, "चले जाओ! फिर आना! मैं तुम्हे कल दूँगा।" 29जो पड़ोसी तुम पर विश्वास रखता है, उसके विरुद्ध षड्यन्त्र मत रचो। 30जिसने तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं किया, उस मनुष्य से अकारण झगड़ा मत करो। 31विधर्मी से ईर्ष्या मत करो और उसके किसी मार्ग पर पैर न रखों; 32क्योंकि प्रभु दुष्टों से घृणा करता और सदाचारियों को अपना मित्र बना लेता है। 33दुष्ट के घर पर प्रभु का अभिशाप पड़ता है, किन्तु वह धर्मी के घर को आशीर्वाद देता है। 34प्रभु घमण्डियों को नीचा दिखाता और दीनों को अपना कृपापात्र बना लेता है। 35बुद्धिमान् लोगों को सम्मान मिलेगा ओैर मूर्खों का तिरस्कार किया जायेगा।