1पुत्र! मेरी प्रज्ञा पर ध्यान दो, मेरी शिक्षा कान लगा कर सुनो, 2जिससे तुम विवेकशील बने रहो और तुम्हारे होंठ ज्ञान की बातें बोलें। 3व्यभिचारिणी के होंठों से मधु चूता है और उसकी वाणी तेल से भी चिकनी है। 4किन्तु अन्त में वह चिरायते-जैसी कड़वी और दुधारी तलवार-जैसी तेज होती है। 5उसके पैर मृत्यु की ओर बढ़ते हैं और उसके कदम अधोलोक की ओर। 6वह जीवन के मार्ग का ध्यान नहीं रखती, उसके पथ टेढ़े-मेढ़े हैं और उसे इसका पता नहीं। 7पुत्र! मेरी बात सुनो! मेरी शिक्षा की उपेक्षा मत करो। 8उस से दूर रहो, उसके घर की देहली पर पैर मत रखो। 9कहीं ऐसा न हो कि तुम अपनी मर्यादा खो बैठो और अपना जीवन उस निर्दय को अर्पित करो। 10ऐसा न हो कि पराये लोग तुम्हारी सम्पत्ति से तृत्त हों; अपरिचित का घर तुम्हारे परिश्रम से लाभ उठाये 11और जब तुम्हारा हाड़-मांस घुल गया हो, तो तुम्हें जीवन के अन्त में रोना पड़े। 12तब तुम कहोगे, "मैंने अनुशासन से घृणा क्यों की? मेरे हृदय ने परामर्श का तिरस्कार क्यों किया? 13मैंने अपने गुरुओं की वाणी पर ध्यान क्यों नहीं दिया? मैंने शिक्षकों की बातों पर कान क्यों नहीं दिया? 14मैं समस्त समुदाय की सभा के सामने सर्वनाश के कगार पर पहुँच गया हूँ।" 15अपने ही कुण्ड का पानी पियो, अपने ही कुएँ के बहते स्त्रोत से। 16क्यों तुम्हारे जलस्त्रोत घर के बाहर, तुम्हारी जलधाराएँ सड़को पर बहें? 17इन पर तुम्हारा ही अधिकार है। इन में तुम्हारे साथ किसी पराये की साझेदारी नहीं। 18तुम्हारे जलस्त्रोत को आशीर्वाद प्राप्त हो। तुम अपनी युवावस्था की पत्नी, 19उस सुन्दर हिरनी, उस रमणीय मृगी से सुखी रहो उसका प्रेमस्पर्श तुम को तृप्ति प्रदान करता रहे, उसका प्रेम तुम को मोहित करता रहे। 20पुत्र! क्यों तुम व्यभिचरिणी पर मोहित होते हो? क्यों तुम परस्त्री को गले लगाते हो? 21प्रभु प्रत्येक के आचरण का निरीक्षण करता और उसके सभी मार्गो की जाँच करता है। 22दुष्ट अपने ही कुकर्मो के जाल में फँसता है; वह अपने ही पापों के बन्धनों से बँधता है। 23वह अनुशासन की कमी से मर जायेगा, उसकी अपनी मूर्खता उसका विनाश कर देगी।