सूक्ति

अध्याय 10

1बुद्धिमान् पुत्र अपने पिता को आनन्द देता, किन्तु मूर्ख पुत्र से माता को दुःख होता है। 2अन्याय की सम्पत्ति से लाभ नहीं, किन्तु धार्मिकता मृत्यु से रक्षा करती है। 3प्रभु धार्मिक मनुष्य को भूखा नहीं रहने देता, किन्तु पापियों की लालसा की पूर्ति में बाधा डालता है। 4आलसी हाथ गरीब और परिश्रमी हाथ अमीर बनाते हैं। 5जो उपयुक्त समय पर रसद एकत्र करता, वह बुद्धिमान् है। जो फसल के समय सोता रहता, वह घृणित है। 6धार्मिक मनुष्य को आशीर्वाद प्राप्त है, किन्तु विधर्मी के मुख में हिंसा भरी है। 7धार्मिक मनुष्य का स्मरण मंगलकारी है, किन्तु विधर्मी का नाम मिट जायेगा। 8जो बुद्धिमान् है, वह आज्ञाओें का पालन करता है; किन्तु बकवादी मूर्ख का विनाश होता है। 9जो धर्म के मार्ग पर चलता है, वह सुरक्षित है; किन्तु जो टेढ़े-मेढ़े मार्गों पर चलता है, वह दण्ड पायेगा। 10जो आँख मारता है, वह दुःख का कारण बनता है और बकवादी मूर्ख नष्ट होता है। 11सद्धर्मी का मुख जीवन का स्रोत है, किन्तु विधर्मी के मुख में हिंसा भरी है। 12बैर झगड़े को बढ़ावा देता है, किन्तु प्रे्रम सभी पाप ढाँक देता है। 13बुद्धिमान् के शब्दों में प्रज्ञा का निवास है, किन्तु लोग मूर्ख की पीठ पर लाठी मारते हैं। 14बुद्धिमान अपने ज्ञान का भण्डार भरता रहता है। मूर्ख का बकवाद उसके विनाश का कारण बनता है। 15धनी की सम्पत्ति उसके लिए किलाबन्द नगर है। कंगाल की गरीबी उसकी विपत्ति का कारण है। 16धर्मी की कमाई जीवन की ओर, किन्तु विधर्मी की आमदनी पाप की ओर ले जाती है। 17जो अनुशासन में रहता, वह जीवन की ओर आगे बढ़ता है; किन्तु जो चेतावनी की उपेक्षा करता, वह पथभ्रष्ट होता है। 18जो अपना बैर छिपाता, वह कपटपूर्ण बातें करता है। जो झूठा आरोप लगाता, वह निरा मूर्ख है। 19जो बहुत अधिक बोलता, वह पाप से नहीं बचता; किन्तु जो अपनी जिह्वा पर नियन्त्रण रखता, वह बुद्धिमान् है। 20धर्मी की जिह्वा शुद्ध चाँदी है, किन्तु पापियों के हृदय का कोई मूल्य नहीं। 21धर्मी की बातों से बहुतों को लाभ होता है, किन्तु मूर्ख अपने अविवेक के कारण नष्ट होते हैं। 22प्रभु के आशीर्वाद से ही कोई धनवान बनता है। इसकी तुलना में हमारा परिश्रम नगण्य है। 23मूर्ख पापकर्म में, किन्तु बुद्धिमान् प्रज्ञा में रस लेता है। 24दुर्जन जिस बात से डरता, वह उसके सिर पड़ती है; किन्तु धर्मियों की मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं। 25बवण्डर पापी को उड़ा ले जाता है, किन्तु धर्मी सदा दृढ़ बना रहता है। 26आलसी अपने को कार्य सौंपने वालों के लिए वैसा है, जैसा सिरका दाँतों के लिए और धुआँ आँखों के लिए। 27प्रभु पर श्रद्धा आयु बढ़ाती है, किन्तु दुष्टों के वर्ष घटाये जाते हैं। 28धर्मियों का भविष्य आनन्दमय है, किन्तु दुष्टों की आशा व्यर्थ हो जाती है। 29प्रभु का मार्ग धर्मी का गढ़ है, किन्तु वह कुकर्मियों का विनाश करता है। 30धर्मी कभी विचलित नहीं होगा, किन्तु विधर्मी देश में निवास नहीं करेंगे। 31धर्मी के मुख से प्रज्ञा के शब्द निकलते हैं, किन्तु कपटी जिह्वा काट दी जायेगी। 32धर्मी के होंठ प्रिय बातें करते हैं, किन्तु दुष्ट के मुख से कुटिल बातें निकलती हैं।