प्रज्ञा

अध्याय 2

1विधर्मी कुतर्क करते हुए आपस में यह कहते थे: "हमारा जीवन अल्पकालिक और दुःखमय है। जब मनुष्य मरने को हो, तो कोई उपचार नहीं और हमारी जानकारी में कोई कभी अधोलोक से नहीं लौटा। 2हमने संयोग से जन्म लिया और बाद में ऐसा होगा, मानो हम कभी थे ही नहीं! हमारी साँस मात्र धुआँ है और हमारे विचार हमारे हृदय की धड़कन की चिनगारी! 3चिनगारी बुझ जाने पर शरीर राख बनेगा और प्राण शून्य आकाश में लुप्त हो जायेंगे। 4हमारा नाम समय पाकर भुला दिया जायेगा। हमारे कार्यों को कोई भी याद नहीं करेगा। हमारा जीवन बादल के मार्ग की तरह मिट जायेगा। वह कुहरे की तरह विलीन हो जायेगा, जो सूर्य की किरणोें से छितराया और उसकी गरमी से लुप्त हो जाता है। 5हमारा जीवनकाल छाया की तरह गुजरता है, हमारा अन्त टाला नहीं जा सकता: उस पर मुहर लग चुकी है और कोई नहीं लौटता। 6"इसलिए आओ, हम जब तक जवान है, उत्सुकता से वर्तमान की अच्छी चीजों का उपभोग करें। 7हम उत्तम अंगूरी और इत्र का पूरा-पूरा आनन्द उठाये; हम वसन्त के फूल हाथ से न जाने दें। 8इससे पहले कि गुलाब की कलियाँ मुरझायें , हम उनका मुकुट गूँथ कर पहन लें। 9कोई भी हमारे आनन्दोत्सव से अलग न रहे; हम सर्वत्र अपने आमोद-प्रमोद की निशानी छोड़े; क्योंकि यही हमारा हिस्सा है, यही हमारा भाग्य है। 10"हम दरिद्र धर्मात्मा पर अत्याचार करें। हम विधवा को भी नहीं छोड़ें और वृद्ध के पके बालों का आदर नहीं करें। 11हमारी शक्ति हमारे न्याय का मापदण्ड हो, क्योंकि दुर्बलता किसी काम की नहीं। 12"हम धर्मात्मा के लिए फन्दा लगायें, क्योंकि वह हमें परेशान करता और हमारे आचरण का विरोध करता है। वह हमें संहिता भंग करने के कारण फटकारता है और हम पर हमारी शिक्षा को त्यागने का अभियोग लगाता है। 13वह समझता है कि वह ईश्वर को जानता है और अपने को प्रभु का पुत्र कहता है। 14वह हमारे विचारों के लिए एक जीवित चुनौती है। उसे देखने मात्र से हमें अरूचि होती है। 15उसका आचरण दूसरों-जैसा नहीं और उसके मार्ग भिन्न हैं। 16वह हमें खोटा और अपवित्र समझ कर हमारे सम्पर्क से दूर रहता है। वह धर्मियों की अन्तगति को सौभाग्यशाली बताता और शेखी मारता है कि ईश्वर उसका पिता है। 17हम यह देखें कि उसका दावा कहाँ तक सच है; हम यह पता लगायें कि अन्त में उसका क्या होगा। 18यदि वह धर्मात्मा ईश्वर का पुत्र है, तो ईश्वर उसकी सहायता करेगा और उसे उसके विरोधियों के हाथ से छुड़ायेगा। 19हम अपमान और अत्याचार से उसकी परीक्षा ले, जिससे हम उसकी विनम्रता जानें और उसका धैर्य परख सकें। 20हम उसे घिनौनी मृत्यु का दण्ड दिलायें, क्योंकि उसका दावा है, कि ईश्वर उसकी रक्षा करेगा।" 21वे ऐसा सोचते थे, किन्तु यह उनकी भूल थी। उनकी दुष्टता ने उन्हें अन्धा बना दिया था। 22वे ईश्वर के रहस्य नहीं जानते थे। वे न तो धार्मिकता के प्रतिफल में विश्वास करते थे और न धर्मात्माओें के पुरस्कार में। 23ईश्वर ने मनुष्य को अमर बनाया; उसने उसे अपना ही प्रतिरूप बनाया। 24शैतान की ईर्ष्या के कारण ही मृत्यु संसार में आयी है। जो लोग शैतान का साथ देते हैं, वे अवश्य ही मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।