प्रज्ञा

अध्याय 3

1धर्मियों की आत्माएँ ईश्वर के हाथ में हैं। उन्हें कभी कोई कष्ट नहीं होगा। 2मूर्ख लोगों को लगा कि वे मर गये हैं। वे उनका संसार से उठ जाना घोर विपत्ति मानते थे। 3और यह समझते थे कि हमारे बीच से चले जाने के बाद उनका सर्वनाश हो गया है; किन्तु धर्मियों को शान्ति का निवास मिला है। 4मनुष्यों को लगा कि विधर्मियों को दण्ड मिल रहा है, किन्तु वे अमरत्व की आशा करते थे। 6ईश्वर ने घरिया में सोने की तरह उन्हें परखा और होम-बलि की तरह उन्हें स्वीकार किया। 7ईश्वर के आगमन के दिन वे ठूँठी के खेत में धधकती चिनगारियों की तरह चमकेंगे। 8वे राष्ट्रों का शासन करेंगे; वे देशों पर राज्य करेंगे, किन्तु प्रभु सदा-सर्वदा उनका राजा बना रहेगा। 9जो ईश्वर पर भरोसा रखते हैं, वे सत्य को जान जायेंगे; जो प्रेम में दृढ़ रहते हैं, वे उसके पास रहेंगे; क्योंकि जिन्हें ईश्वर ने चुना है, वे कृपा तथा दया प्राप्त करेंगे। 10किन्तु अधर्मियों को उनके विचारों के योग्य दण्ड दिया जायेगा; क्योंकि उन्होंने धर्मी का तिरस्कार और प्रभु का परित्याग किया। 11जो प्रज्ञा और अनुशासन को तुच्छ समझते, वे अभागे हैं; उनकी आशा निराधार है, उनका परिश्रम व्यर्थ है और उनके कार्य निष्फल है। 12उनकी पत्नियाँ मूर्ख, उनके बच्चे दुष्ट, उनके वंशज अभिशप्त हैं। 13धन्य है बाँझ स्त्री, जो अशुद्ध नहीं हुई, जिसने व्यभिचार नहीं किया! आत्माओं के विचार के दिन वह फलवती होगी। 14धन्य है नपुंसक, जिसके हाथ ने बुराई नहीं की, जिसने प्रभु के विरुद्ध दुष्ट विचार नहीं पाले! उसे अपनी ईमानदारी का विशिष्ट पुरस्कार और प्रभु के मन्दिर मेें सुखद भाग प्राप्त होगा; 15क्योंकि भले कामों का फल महिमामय है और उनकी जड़, प्रज्ञा अविनश्वर है। 16व्यभिचारियों की सन्तान प्रौढ़ता तक नहीं पहुँचेगी। अवैध संसर्ग से उत्पन्न वंशज नष्ट हो जायेंगे। 17यदि उन्हें लम्बी आयु मिली, तो उन्हें सम्मान नहीं मिलेगा और वे अन्त तक, बुढ़ापे तक तिरस्कृत होंगे। 18यदि वे शीघ्र ही मर जायेंगे, तो विचार के दिन उन्हें न आशा होगी और न सान्त्वना मिलेगी ; 19क्योंकि दुष्ट वंश का अन्त दुःखद है।