1मैं सभी अन्य लोगों की तरह नश्वर मनुष्य हूँ। मैं उसका वंशज हूँ, जो सब से पहले मिट्टी रचा गया। मेरा शरीर अपनी माता के गर्भ में गढ़ा गया। 2मैं संसर्ग के सुख के पश्चात् वीर्य द्वारा दस महीनों तक रक्त में बनता रहा। 3मैंने जन्म लेते ही सर्वसुलभ हवा में साँस ली, मैं सब के समान पृथ्वी पर गिरा और सब के समान पहली बार रोने लगा। 4मैं कपड़ो में लपेटा गया और बड़ी सावधानी से मेरा पालन-पोषण हुआ। 5सभी राजाओं का जीवन इसी तरह प्रारम्भ होता है। 6जीवन में प्रवेश सब के लिए एक-जैसा है और जीवन से प्रस्थान भी एक-जैसा। 7मैंने प्रार्थना की और मुझे विवेक मिला। मैंने विनती की और मुझ पर प्रज्ञा का आत्मा उतरा। 8मैंने उसे राजदण्ड और सिंहासन से ज्यादा पसन्द किया और उसकी तुलना में धन-दौलत को कुछ नहीं समझा। 9मैंने उसकी तुलना अमूल्य रत्न से भी नहीं करना चाहा; क्योंकि उसके सामने पृथ्वी का समस्त सोना मुट्ठी भर बालू के सदृश है और उसके सामने चाँदी कीच ही समझी जायेगी। 10मैंने उसे स्वास्थ्य और सौन्दर्य से अधिक प्यार किया और उसे अपनी ज्योति बनाने का निश्चय किया; क्योंकि उसकी दीप्ति कभी नहीं बुझती। 11मुझे उसके साथ-साथ सब उत्तम वस्तुएँ मिल गयी और उसके हाथों से अपार धन-सम्पत्ति। 12मैंने उन सब के साथ आनन्द मनाया, क्योंकि वे मुझे प्रज्ञा द्वारा मिली थी; यद्यपि मैं उस समय नहीं जानता कि प्रज्ञा ही उन सब की जन्मदात्री है। 13मैंने सरल हृदय से प्रज्ञा की शिक्षा ग्रहण की और मैं खुले हाथ से बाँटता हूँ, मैं उसकी समृद्धि नहीं छिपाता। 14वह मनुष्यों के लिए एक अक्षय भण्डार है। जो लोग उसे प्राप्त करते हैं, वे ईश्वर के मित्र बनते हैं; क्योंकि प्रज्ञा की शिक्षा द्वारा प्राप्त सद्गुण उसे प्रिय है। 15ईश्वर ने मुझे यह कृपा दी कि मैं सही बातें बोलूँ और उसके वरदानों का मूल्य समझूँ; क्योंकि वह प्रज्ञा का पथप्रदर्षक है और ज्ञानियों को मार्ग दिखाता है। 16हम उसी के हाथ में हैं- हम और हमारे शब्द, हमारी समस्त बुद्धि और शिल्प-विज्ञान भी। 17जो कुछ अस्तित्व में है, उसने मुझे उसका पूरा ज्ञान दिया: विश्व की संरचना और तत्वों की गतिविधियाँ, 18काल का आदि, मध्य और अन्त, सूर्य का प्रत्यावत्र्तन और ऋतुओें का परिवर्तन, 19वर्षों के चक्र और नक्षत्रों के स्थान, 20पशुओें की प्रकृति और जंगली जानवरों का हिंसक स्वभाव, आत्माओें की शक्ति और मनुष्यों के विचार, पौधो की विभिन्न जातियाँ और जड़ी-बूटियों के गुण। 21मैंने सब कुछ की जानकारी प्राप्त की चाहे वह गुप्त हो या प्रकट क्योंकि विश्व की रचना करने वाली प्रज्ञा ने मुझे शिक्षा प्रदान की। 22प्रज्ञा में एक आत्मा विद्यमान है, जो विवेकशील, पवित्र अद्वितीय, बहुविध, सूक्ष्म, गतिमय, प्रत्यक्ष, निष्कलंक, स्वच्छ, अपरिवर्तनीय, हितकारी, तत्पर, 23अदम्य, उपकारी, जनहितैषी, सुदृढ़, आश्वस्त, प्रशान्त, सर्वशक्तिमान् और सर्वनिरीक्षक है। वह सभी विवेकशील, शुद्ध तथा सूक्ष्म जीवात्माओें में व्याप्त है; 24क्योंकि प्रज्ञा किसी भी गति से अधिक गतिशील है। वह इतनी परिशुद्ध है कि वह सब कुछ में प्रवेश करती और व्याप्त रहती है। 25वह ईश्वर की शक्ति का प्रसव है, सर्वशक्तिमान् की महिमा की परिशुद्ध प्रदीप्ति है, इसलिए कोई अशुद्धता उस में प्रवेश नहीं कर पाती। 26वह शाश्वत ज्योति का प्रतिबिम्ब है, ईश्वर की सक्रियता का परिशुद्ध दर्पण और उसकी भलाई का प्रतिरूप है। 27वह अकेली होते हुए भी सब कुछ कर सकती है। वह अपरिवर्तनीय होते हुए भी सब कुछ को नवीन बनाती रहती है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी पवित्र जीवात्माओं में प्रवेश कर उन्हें ईश्वर के मित्र और नबी बनाती है; 28क्योंकि ईश्वर केवल उसी को प्यार करता है, जो प्रज्ञा के साथ निवास करता है। 29प्रज्ञा सूर्य से भी रमणीय है, सभी नक्षत्रों से श्रेष्ठ है और प्रकाश से भी बढ़ कर है; 30क्योंकि प्रकाश रात्रि के सामने दूर हो जाता है, किन्तु प्रज्ञा पर दुष्टता का वष नहीं चलता।