प्रज्ञा

अध्याय 8

1प्रज्ञा की शक्ति पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक सक्रिय है और वह सुचारू रूप से विश्वका संचालन करती है। 2मैंने उस को प्यार किया और युवावस्था से उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहा। मैंने उसे अपनी दुलहन बना कर अपने घर में लाना चाहा, क्योंकि मैं उसके सौन्दर्य का उपासक बन गया था। 3वह अपनी कुलीनता पर गर्व करती है, क्योंकि वह ईश्वर के यहाँ निवास करती है और सर्वेश्वर उस को प्यार करता है। 4वह ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान में दीक्षित हो चुकी है और ईश्वर के कार्य निर्धारित करती है। 5यदि जीवन मेंं सम्पत्ति वांछनीय है, तो प्रज्ञा से बड़ी सम्पत्ति क्या है, जो सब कार्य सम्पन्न करती है? 6यदि हमारी बुद्धि कार्यकुशल है, तो प्रज्ञा कहीं अधिक कार्यकुशल है, क्योंकि वह सब कुछ की जन्मदात्री है। 7यदि कोई धार्मिकता को प्यार करता है, तो सद्गुण प्रज्ञा के परिश्रम से उत्पन्न होते हैं; क्योंकि वह संयम, विवेक, न्याय और धैर्य की शिक्षा देती है और मानव जीवन में इन से लाभदायक कुछ नहीं हो सकता। 8और यदि कोई प्रचुर मात्रा में अनुभव प्राप्त करना चाहता है, तो प्रज्ञा अतीत जानती और भविष्य का अनुमान लगाती है। वह सूक्तियों की व्याख्या करती और पहेलियाँ सुलझाती है। उसे चिन्हों चमत्कारों, कालों और युगों का पूर्वज्ञान है। 9इसलिए मैंने उसे अपनी जीवन-संगिनी बनाने का संकल्प किया; क्योंकि मैं जानता था कि इस प्रकार मुझे उस से कल्याणकारी परामर्श और चिन्ताओें एवं दुःख में सान्त्वना मिलती। 10उसी के कारण मुझे जनता में यश और युवक होते हुए भी बड़ों का सम्मान प्राप्त होता। 11मैं निर्णय देने में प्रवीण बनता और मुझे शासकों की प्रशंसा प्राप्त होती। 12यदि मैं मौन रहता, तो लोग प्रतीक्षा करते, यदि मैं बोलता, तो वे ध्यान से सुनते। यदि मैं बहुत देर तक भाषण देता, तो वे दाँत तले उँगली दबाते। 13मैं प्रज्ञा द्वारा, अमरत्व प्राप्त करता और आने वाली पीढ़ियों में मेरी स्मृति सदा बनी रहती। 14मैं जातियों पर राज्य करता और राष्ट्र मेरे अधीन हो जाते। 15मेरा नाम सुनते ही दुर्जेय राजा काँपते। मैं जनता के बीच भला और युद्ध में वीर दिखता। 16अपने यहाँ लौटने पर मैं उसके पास विश्राम करता; क्योंकि उसकी संगति में न तो कोई कटुता है और न उसके सान्निध्य में कोई क्लान्ति वहाँ केवल सुख और आनन्द मिलता है। 17मन-ही-मन विचार कर और हृदय में यह सोच कर कि प्रज्ञा के रिष्ते से अमरता प्राप्त होती है, 18उसकी मित्रता से शुभ आनन्द, उसके हाथ के कार्यों से अक्षय सम्पत्ति, उसके साहचर्य से विवेक और उसके साथ वार्तालाप से सुयष मिलता है। मैं उसे चारों ओर ढूँढ़ता रहा, जिससे मैं उसे अपनाऊँ। 19मैं उस समय एक प्रतिभाशाली और सहृदय नवयुवक था; 20सद्गुणी होने के कारण मुझे एक अदोष शरीर मिला, 21किन्तु यह ज्ञान कर कि यदि ईश्वर मुझे प्रज्ञा प्रदान नहीं करेगा, तो मैं उसे प्राप्त नहीं कर पाऊँगा हालाँकि यह जानना भी प्रज्ञा था कि वह किसका वरदान है। मैंने प्रभु की ओर अभिमुख हो कर सारे हृदय से यह कहते हुए प्रार्थना की: