1क्योंकि तेरा अविनाशी आत्मा सब में व्याप्त है। 2प्रभु! तू अपराधियों को थोड़ा-थोड़ा कर के दण्ड देता है। तू उन्हें चेतावनी देता और उन्हें उनके पापों का स्मरण दिलाता है, जिससे वे बुराई से दूर रहे और तुझ पर भरोसा रखें। 3तूने अपनी पवित्र भूमि के पुराने निवासियों के साथ ऐसा व्यवहार किया, 4जिन से उनके घृणित कार्यों के कारण तुझे बैर हुआ था: उनका जादू-टोना, उनकी निन्दनीय धर्मरीतियाँ, 5बच्चों की निर्मम हत्याएँ, मनुष्य के माँस और रक्त की वे दावतें, जिन में अँतड़ियाँ तक खायी जाती थी, दीक्षितों के रहस्यात्मक धर्मानुष्ठानों की रंगरलियाँ। 6तूने असहाय बच्चों के उन हत्यारों को हमारे पूर्वजों के हाथों द्वारा मिटाना चाहा, 7जिससे वह भूमि, जो तुझे सब से प्रिय है, योग्य लोगों से, ईश्वर के पुत्रों से बसायी जाये। 8किन्तु तूने उन पुराने निवासियों पर दया की; क्योंकि वे मनुष्य थे: तूने अपनी सेना के अग्रदूतों के रूप में उनके पास बर्रे भेजे, जिससे वे उनका धीरे-धीरे विनाश करें। 9तू उन अधर्मियों को एक ही युद्ध में धर्मियों के हाथ दे सकता था, या हिंसक जानवरों या एक ही कठोर शब्द द्वारा उनका क्षणमात्र में सर्वनाश कर सकता था, 10किन्तु तूने धीरे-धीरे दण्ड दे कर उन्हें पश्चात्ताप करने का अवसर दिया, हालाँकि तू उनका विकृत स्वभाव और जन्मजात दुष्टता जानता था और यह भी कि वे अपने विचार कभी भी नहीं बदलेंगे। 11क्योंकि यह जाति प्रारम्भ से ही अभिशप्त थी। तूने इसलिए उनके पापों का दण्ड नहीं दिया कि तू किसी से डरता था। 12क्योंकि कौन तुझ से कहेगा, "तूने यह क्या किया?" या कौन तेरे निर्णय का विरोध करेगा? जिन राष्ट्रों की तूने स्वयं सृष्टि की है, उनके विनाश के कारण तुझ पर कौन अभियोग लगायेगा? कौन अधर्मी लोगों का पक्ष ले कर तुझे चुनौती देगा? 13तुझे छोड़ कर और कोई ईश्वर नहीं। तू ही समस्त सृष्टि की रक्षा करता है। यह आवश्यक नहीं कि तू किसी को इसका प्रमाण दे कि तेरे निर्णय सही है। 14ऐसा कोई राजा या शासक नहीं है, जो तेरे द्वारा दण्डित लोगों के कारण तेरा विरोध कर सकता है। 15तू न्यायी है और न्याय से विश्व का शासन करता है। तू अपने सामर्थ्य के अयोग्य समझता है कि निर्दोष को दण्ड दिया जाये। 16तेरा न्याय तेरे सामर्थ्य पर आधारित है। तू सब का स्वामी है और इसलिए सब पर दया करता है। 17तू तभी अपना सामर्थ्य प्रकट करता है, जब तेरी सर्वशक्तिमत्ता पर सन्देह किया जाता है। तू उसी को दण्ड देता है, जो तेरी प्रभुता जान कर तुझे चुनौती देता है। 18तू शक्तिशाली होते हुए भी उदारतापूर्वक न्याय करता और बड़ी कृपालुता से हम पर शासन करता है, क्योंकि तू इच्छानुसार अपना सामर्थ्य दिखा सकता है। 19इस प्रकार तूने अपनी प्रजा को यह शिक्षा दी कि धर्मी को अपने भाइयों के प्रति सहृदय होना चाहिए और तूने अपने पुत्रों को यह भरोसा दिलाया कि पाप के बाद तू उन्हें पश्चात्ताप का अवसर देगा। 20यदि तूने अपने पुत्रों के शत्रुओं को, उन्हें प्राणदण्ड मिलने वाला था, इतनी सावधानी और नम्रता से दण्डित किया और उन्हें अपनी दुष्टता से विमुख होने का समय और अवसर दिया है, 21तो तूने अपने पुत्रों का कहीं अधिक सावधानी से न्याय किया है, जिनके पूर्वजों के लिए तूने शपथ खा कर विधान निर्धारित किया और उन से मंगलमय प्रतिज्ञाएँ की थी। 22इस प्रकार तूने हमें शिक्षा देने के लिए हमारे शत्रुओं को नरमी से दण्ड दिया, जिससे हम भी न्याय करते समय तेरी दया का स्मरण करें और जब तू हमारा न्याय करता है, तो हम तेरी दयालुता पर भरोसा रखे। 23जो लोग मूर्खतावष अधर्म का जीवन बिता चुके थे, तूने उन्हें उनके अपने घृणित कार्यों द्वारा दण्ड दिया। 24वे बहुत दूर तक भटक गये थे। वे नासमझ बच्चों की तरह धोखा खा कर सब से नीचे और घृणित जानवरों को देवता मानते थे। 25इसलिए तूने उन्हें नासमझ बच्चे मान कर दण्डस्वरूप हँसी के पात्र बना दिया। 26उपहास के इस दण्ड द्वारा जिनका सुधार नहीं हुआ, उन्हें ईश्वर के योग्य दण्ड दिया जायेगा। 27जिन प्राणियों को वे देवता मानते थे, उनके द्वारा उन्हें दण्ड दिया गया और कष्ट एवं यातनाएँ सहनी पड़ी। इस प्रकार वे उस सच्चे ईश्वर को पहचान गये, जिसका ज्ञान वे पहले अस्वीकार करते रहे। इस कारण उन्हें कठोर-से-कठोर दण्ड दिया गया।