प्रज्ञा

अध्याय 13

1वे मनुष्य कितने मूर्ख है, जिन में ईश्वर का ज्ञान नहीं है! जो दृश्य जगत् को देख कर ‘सत्‘ नामक ईश्वर को नहीं जान सके, जो सृष्टि को देख कर सृष्टिकर्ता को पहचानने में असमर्थ रहे! 2किन्तु उन्होंने अग्नि, पवन, सूक्ष्म वायु, तारामण्डल, जल का तीव्र प्रवाह अथवा आकाश के ज्योति-पिण्डों को संसार का संचालन करने वाले देवता समझा है। 3यदि उन्होंने इन वस्तुओं के सौन्दर्य से मोहित हो कर इन्हें देवता समझ लिया है, तो वे यह जान जायें कि इन सब का स्वामी इन से कितना श्रेष्ठ है; क्योंकि समस्त सौन्दर्य के मूलस्त्रोत द्वारा उनकी सृष्टि हुई है 4और यदि वे इन वस्तुओं की शक्ति और क्रियाशीलता से प्रभावित हुए, तो वे इन वस्तुओं से अनुमान लगायें कि इनका निर्माता, कितना अधिक शक्तिशाली है; 5क्योंकि सृष्ट वस्तुओं की महानता और सौन्दर्य के आधार पर इनके निर्माता का अनुमान लगाया जा सकता है। 6किन्तु उन लोगों का दोष बड़ा नहीं है; क्योंकि वे ईश्वर को ढूँढ़ते और उसे पाने के इच्छुक थे, किन्तु वे भटक गये। 7वे ईश्वर के कार्यों के बीच जीवन बिता कर उनकी छानबीन करते और दृश्य वस्तुओं के सौन्दर्य के कारण भ्रम में फँस जाते हैं। 8फिर भी वे लोग क्षम्य नहीं है; 9क्योंकि यदि वे ज्ञान में इतना आगे बढ़ गये थे कि विश्व के विषय में चिन्तन कर सके, तो वे शीघ्र ही इसके स्वामी को क्यों नहीं पहचान सके? 10अभागे हैं वे लोग, जिनकी आशा निर्जीव वस्तुओं पर आधारित है! जिन्होंने मनुष्य के हाथों की कृतियों को देवता माना है: पशुओं की मूर्तियों को, सोने और चाँदी की कलाकृतियों को या प्राचीन काल के गढ़े हुए रद्दी पत्थर को। 11कोई बढ़ई उपयुक्त पेड़ चुन कर उसे गिराता, चतुराई से उसकी छाल उतारता और कौशल से उसे गढ़ कर कोई घरेलू सामान बनाता है। 12वह लकड़ी की काट-छाट से भोजन पकाता और खा कर तृप्त हो जाता है। 13जो रद्दी बच गयी, वह उस में से एक टेढ़ी गाँठदार लकड़ी उठाता और फुरसत के समय चतुराई से उसे काट-काट कर कोई रूप देता है। वह उस से मनुष्य की मूर्ति बनाता 14या किसी तुच्छ पशु की प्रतिमा। वह उस पर गेरू लगता, लाल रंग पोतता और उसका हर दोष छिपाता है। 15वह उसके लिए एक उपयुक्त निवास बनाता, उसे दीवार पर लगाता और कील से ठोंक देता है। 16वह सावधानी से उसे गिरने से बचाता है; क्योंकि वह जानता है, कि वह अपने को सँभाल नहीं पाती; वह मात्र मूर्ति है और उसे सहारे की आवश्यकता होती है। 17यदि वह सम्पत्ति, विवाह या सन्तान के लिए प्रार्थना करता है, तो उसे एक निर्जीव वस्तु को सम्बोधित करने में लज्जा का अनुभव नहीं होता। जो शक्तिहीन है, वह उस से स्वास्थ्य माँगता है; 18जो मृत है, वह उस से जीवन माँगता है; जो निस्सहाय है, वह उस से सहायता चाहता है; जो चल नहीं सकता, व उससे शुभ यात्रा चाहता है। 19वह अपनी जीविका, अपने परिश्रम और अपने हाथों की सफलता के लिए एक ऐसी वस्तु से सहायता माँगता है, जिसके हाथ नितान्त शक्तिहीन है।