1उन्हें इस प्रकार के जन्तुओं के माध्यम से दण्ड मिला और कीड़ों के दलों द्वारा कष्ट दिया गया। 2उस दण्ड के विपरीत तूने अपनी प्रजा का उपकार किया। तूने उसकी लालसा शान्त करने के लिए उसे बटेरों का स्वादिष्ट भोजन प्रदान किया। 3इसके विपरीत जब वे भूखे थे, तो उन्हें अपने पर भेजे हुए घृणित जन्तु देख कर सब प्रकार के भोजन से वितृष्णा हुई, जब कि तेरी प्रजा को थोड़े समय के अभाव के बाद उत्तम व्यंजनों का स्वाद मिला। 4उन अत्याचारियों को एक विकट भुखमरी सहनी पड़ी, जब कि तेरी प्रजा को दिखाया गया कि उसके शत्रुओं को किस प्रकार की यन्त्रणा दी गयी थी। 5जब तेरी प्रजा पर जन्तुओं का प्रकोप भड़क उठा और वह कुटिल साँपों के दंश से नष्ट हो रही थी, तो तेरा क्रोध बहुत समय तक नहीं बना रहा। 6उसे चेतावनी के रूप में कुछ समय तक डराया गया और संहिता की आज्ञाओें का स्मरण दिलाने के लिए उसे मुक्ति का चिह्न दिखाया गया। 7जो उस चिह्न की ओर अभिमुख हुआ, उसकी उस दृश्य द्वारा नहीं, बल्कि तेरे, सब के मुक्तिदाता द्वारा रक्षा हुई। 8इस प्रकार तूने हमारे शत्रुओं को यह प्रमाण दिया कि तू ही सब बुराई से मुक्त करता है। 9वे टिड्डों और डाँसों के काटने से मर गये और उनके जीवन की रक्षा का कोई उपाय नहीं था, क्योंकि वे उस प्रकार के जानवरों द्वारा दण्ड पाने योग्य थे। 10किन्तु विषैले साँपों के दाँत भी तेरी प्रजा पर विजयी नहीं हुए, क्योंकि तेरी दया ने आ कर उसे चंगा किया। 11वह तेरी आज्ञाओें का स्मरण दिलाने के लिए डँसी गयी, किन्तु उसे शीघ्र ही बचाया गया। कहीं ऐसा न हो कि वह उन आज्ञाओें को इस प्रकार भुला दे कि वह तेरे उपकारों के प्रति उदासीन बन जाये! 12क्योंकि उसे किसी जड़ी-बूटी या लेप से स्वास्थ्य लाभ नहीं हुआ, बल्कि प्रभु! तेरे शब्द ने उसे चंगा किया था। 13जीवन और मृत्यु पर तेरा ही अधिकार है। तू अधोलोक के फाटकों तक पहुँचाता और फिर ऊपर उठाता है। 14मनुष्य अपनी दुष्टता के कारण वध कर सकता है, किन्तु वह न तो छूटे हुए प्राणों को वापस लाने में समर्थ है और न (अधोलोक में) बन्द आत्मा का उद्धार करने में। 15कोई तेरे हाथ से भाग कर निकल नहीं सकता। 16जो अधर्मी तुझे स्वीकार करना नहीं चाहते थे, वे तेरे बाहुबल द्वारा मारे गये: वे असाधारण वर्षा, ओलों और भीषण आँधी से सताये और बिजली की आग से नष्ट किये गये। 17सब से आश्चर्यजनक बात यह थी कि पानी में, जो सब कुछ बुझाता है, आग बल पकड़ रही थी; क्योंकि सृष्टि धर्मियों की ओर से युद्ध करती है। 18ज्वाला कभी-कभी शान्त हो जाती थी, जिससे दुष्टों के विनाश के लिए भेजे जन्तु नहीं मरें और वे स्वयं यह देख कर समझे कि ईश्वर का न्याय उनका पीछा कर रहा है। 19कभी-कभी पानी के बीच में ही ज्वाला धधक उठती थी और आग की स्वाभाविक शक्ति से भी अधिक तेज जलती थी, जिससे वह दुष्ट भूमि की फ़सल नष्ट कर दे। 20इसके विपरीत, तूने अपनी प्रजा को स्वर्ग दूतों का भोजन खिलाया, बिना परिश्रम किये उन्हें तेरी ओर से पकी-पकायी रोटी मिली, जिसमें हर प्रकार की मिठास थी और जो सब को रूचिकर लगी। 21तेरा दिया हुआ पदार्थ तेरी प्रजा के प्रति तेरा वात्सल्य प्रकट करता था, फिर भी वह खाने वाले की इच्छा के अनुसार अपने को हर एक की रूचि के अनुकूल बनाता था। 22हिम और पाला आग में नहीं पिघलता था, जिससे लोग जान जायें कि शत्रुओें की फसल तो ओले में जलती और वर्षा की चमकती बिजली में आग द्वारा नष्ट हो गयी थी; 23किन्तु दूसरी और वही आग अपनी शक्ति भूल जाती थी, जिससे धर्मियों को भोजन मिले। 24प्रकृति तेरे अधीन है, जिसने उसे बनाया है, इसलिए वह अधर्मियों को दण्ड देने के लिए अपनी शक्ति बढ़ाती और तुझ पर भरोसा रखने वालों का कल्याण करने के लिए उसे मन्द कर देती है। 25इस कारण वह अपने को बदलते हुए तेरे उस वरदान की सेवा करती है, जो अभाव में रहने वालों की इच्छा के अनुसार भोजन-सम्बन्धी उनकी सब आवश्यकताओं को पूरा करता था। 26प्रभु! इस प्रकार तेरे प्रिय पुत्रों को अनुभव हुआ कि मनुष्यों का पोषण विभिन्न फलों द्वारा नहीं होता, बल्कि तेरा वचन उन सब को सँभालता है, जो तुझ पर विश्वास करते हैं। 27जो चीज आग द्वारा नष्ट नहीं होती थी, वह सूर्य की किरण के स्पर्श मात्र से पिघलती थी, 28जिससे लोग जान जायें कि सूर्योदय से पहले तुझे धन्यवाद देना और प्रभात के समय तेरे सामने उपस्थित होना चाहिए। 29जो धन्यवाद नहीं देता, उसकी आशा शीतकालीन पाले की तरह नष्ट होती है और अप्रयोज्य जलधारा की तरह वह जाती है।