प्रज्ञा

अध्याय 17

1तेरे निर्णय महान् और अनिर्वचनीय है; इसलिए तेरी शिक्षा अस्वीकार करने वाले भटक गये। 2पापी लोग एक पवित्र राष्ट्र को अपने अधीन करना चाहते थे, किन्तु वे अन्धकार के कैदी बने और लम्बी रात्रि की बेड़ियों से बाँधे गये। वे शाश्वत विधाता द्वारा बहिष्कृत होकर अपने घरों में बन्द थे। 3वे अपने गुप्त पापों के साथ विस्मृति के काले परदे के पीछे छिप जाना चाहते थे, किन्तु वे भयभीत होकर तितर-बितर कर दिये गये और मृगमरीचिकाओें से आतंकित किये गये; 4क्योंकि वे जिस स्थान में छिप गये थे, वह उन्हें भय से मुक्त नहीं करता था। डरावनी आवाजें चारों ओर से आती थीं और उन्हें डरावने दृश्य दिखाई पड़ते थे। 5धधकती आग भी उन्हे प्रकाश देने में असमर्थ थी और नक्षत्रों की चमकती ज्योति को इस भयानक रात को प्रकाशमान करने का साहस नहीं था। 6उन्हे केवल एक अग्निपुंज दिखाई देता था, जो अपने आप प्रज्वलित होकर उन्हें भयभीत करता था। जब वह दृश्य उनकी आँखों के सामने ओझल हो जाता था, तो उन पर आतंक छाया रहता और वे उस दृश्य को वास्तविकता से अधिक भयानक समझते थे। 7इस प्रकार उनके जादू-टोने के तन्त्र-मन्त्र व्यर्थ सिद्ध हुए और उस ज्ञान की कटु भत्र्सना की गयी, जिसका उन्हें गर्व था। 8जो लोग दावा करते थे कि हम त्रस्त आत्माओें को डर और उलझन से मुक्त करने में समर्थ है, वे स्वयं एक हास्यास्पद भय के शिकर बन गये। 9जब कोई भीषण दृश्य उन्हें नहीं डराता, तो वे अपने पास जन्तुओं के गुजरने और साँपों की फुफकार से आतंकित हो जाते थे। वे डर के मारे मर रहे थे और उस अन्धकार पर आँख गड़ाना नहीं चाहते थे, जो उन्हें घेरे रहता था। 10दुष्टता तो स्वाभाव से भीरू है और अपने विरुद्ध साक्ष्य देती है। जब अन्तःकरण उसे दोषी ठहराता है, तो वह विपत्तियों को बढ़ा कर देखती है; 11क्योंकि भय इसके सिवा और कुछ नहीं कि मनुष्य विवेक द्वारा प्रस्तुत उपायों का परित्याग करता है। 12मन में सहायता की जितनी कम आशा है, यन्त्रणा के कारण का अज्ञान उतना ही दुःखदायी है। 13वे सब-के-सब उस असह्य रात्रि में सो गये, जो अशक्त अधोलोक की गहराइयों से निकली थी। 14वो कभी भयानक दृष्यों से सताये जाते और कभी निराशा से निष्प्राण पड़े रहते थे; क्योंकि एक अप्रत्याशित भय उनको अचानक घेरे रहता था। 15इस प्रकार प्रत्येक जहाँ गिर पड़ा, वहाँ रोका गया, मानों वह बिना बेड़ियों के कैद में बन्द हो: 16चाहे वह किसान हो या चरवाहा या उजाड़स्थान के बेगार का मज़दूर, वह अचानक पकड़ा गया और अदम्य बलप्रयोग का शिकार बना; क्योंकि सभी एक ही जंजीर अर्थात् अन्धकार से जकड़े हुए थे। 17(17-19) हर एक आवाज उन्हें भयभीत और निष्प्राण बनाती थीः चाहे वह हवा की सरसराहट हो, या घनी झाड़ियों में चिड़ियों की चहचहाहट, या तेज जलधाराओं की घरघराहट, या गिरने वाले पत्थरों की गड़गड़ाहट, या कूदने वाले पशुओें की धपधप या हिंसक जानवरों की दहाड़ या पहाड़ों की गुफा की प्रतिध्वनि; क्योंकि सारी पृथ्वी तेज प्रकाष से आलोकित थी और कार्यकलाप सर्वत्र निर्बाध चल रहा था। 20केवल उन पर ही एक गहरी रात छायी हुई थी, जो उस अन्धकार की प्रतीक थी, जो उन्हें समेट लेने वाली थी। किन्तु वे अन्धकार से भी अधिक अपने आप के लिए भारस्वरूप थे।